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शहर बना रहे हैं या कब्र खोद रहे हैं!

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नई दिल्ली, 08 अक्टूबर। ड्रिलिंग मशीनों का कान फाड़ता और आरियों का चीरता हुआ शोर, काम में देरी पर देरी और धूल और मलबे का गुबार- निर्माण स्थलों का नजारा अक्सर ऐसा ही भयानक होता है. लेकिन अगर आप पड़ोस में न रह रहे हों तो तो आपको इस सब की चिंता करने की जरूरत नहीं. है ना?

Provided by Deutsche Welle

ये तो है लेकिन शायद आपको भी इस बारे में चिंता करने की पूरी जरूरत है. पर्यावरण का अच्छाखासा नुकसान इस निर्माण से होता है.

बताया जाता है कि निर्माण उद्योग में हर साल कोई तीन अरब टन कच्चे माल की खपत होती है- इसमें रेत, लकड़ी, कच्चा लोहा भी शामिल है. ये वैश्विक इस्तेमाल का 40 प्रतिशत है. मलबा भी है. इतना सारा मलबा. निर्माण करने और इमारतों को ढहाने के दौरान मलबे के ऊंचे पहाड़ बन जाते हैं. मिसाल के लिए, बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में हर साल शहर के कुल मलबे का 30 प्रतिशत वहां होने वाले निर्माण कार्यों से जमा हो जाता है.

और फिर कार्बन उत्सर्जनों की तो पूछिए मत.

कंक्रीट, कांच और लकड़ी से सीओटू?

ये सही है कि जब हम घरों के अंदर रहते हैं तो खिड़कियां और दीवारें, धुआं नहीं उगल रही होती हैं. वास्तव में, अपनी इमारतों को बनाने में जो सामग्री हम इस्तेमाल करते हैं वो अपने आप में निरापद है यानी नुकसान नहीं पहुंचाती.

लेकिन एक नयी इमारत को बनाने में जो भी काम होता है उसमें बड़ी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत पड़ती है और उसमें टनों कार्बन निकलती है. पर्यावरण की लागत की गणना के आधार पर, कहा जा सकता है कि दुनिया भर में कुल सीओटू उत्सर्जन का करीब 10 से 15 प्रतिशत उत्सर्जन यकीनन निर्माण उद्योग से ही होता है.

इसमें से ज्यादातर सीओटू- लोहा, इस्पात और सीमेंट के उत्पादन में निकलती है. जी हां, सीमेंट. दिखता तो ऐसा है कि ये महज एक दानेदार, सख्त, स्लेटी लोथड़ा ही तो है जिसमें से बस हवा के बुलबुले छूटते हैं. लेकिन सीमेंट उद्योग एक बड़ा और पुराना प्रदूषक है. जैसा कि इन दिनों तुलनात्मक लिहाज से कहने का चलन है, अगर ये एक देश होता तो दुनिया में चीन और अमेरिका के बाद तीसरा सबसे बड़ा प्रदूषक देश होता. उत्सर्जन के मामले में वैसे ये दोनों देश अब भी सबसे अव्वल हैं.

चीन की बात करें तो उसने 2011 से 2014 के दरमियान अमेरिका के मुकाबले ज्यादा सीमेंट उत्पादन किया. इतना तो अमेरिका ने पूरी 20वीं सदी में भी नहीं किया था. इस्पात का भी चीन प्रमुखता से इस्तेमाल करने वाला देश है. पूरी दुनिया में करीब आधा इस्पात उत्पादन वहीं होता है.

लेकिन निर्माण सेक्टर एशिया के दूसरे हिस्सों और अफ्रीका के तेजी से बढ़ते हुए शहरों में भी फलफूल रहा है. कोविड की वजह से रफ्तार मंद पड़ी है लेकिन इंडस्ट्री फिर से उठ खड़ी हुई है. सरकारें भी उद्योग को गति देने को उतावली नजर आती हैं. ऐसे में जानकारों के मुताबिक उद्योग जल्द ही बहाल हो जाएगा.

मुझे मत देखो, मैंने कुछ नहीं किया

हो सकता है कि ऐसा न हो लेकिन हम सब अपनी अधिकांश जिंदगी, इमारतों में रहते और काम करते हुए बिता देते हैं. हम बेशक खुद हथौड़ा या घन या ड्रिलिंग मशीन नहीं उठाते या चलाते हैं लेकिन कोई और तो ये काम कर ही रहा है. क्योंकि इमारतें तो ऊंची उठती ही जा रही हैं. काम लगातार जारी है. हर वक्त. रात और दिन. कुछ अनुमानों के मुताबिक हर साल पूरी दुनिया में 11 हजार नये ढांचे बनकर तैयार हो जाते हैं. सोचिए, 11000!

दुनिया के सबसे बड़े बिल्डरों में नाम आता है दुबई का- बुर्ज खलीफा का घर. ये दुनिया की सबसे ऊंची इमारत है. 828 मीटर यानी 2716.5 फुट ऊंची. दुबई में 2020 के दौरान हर रोज औसतन साढ़े दस इमारतें बन कर तैयार हुई थीं.

वैसे तो ज्यादा दिमाग खपाने वाली बात नहीं, लेकिन इतना द्रुत विकास, और ज्यादा कच्चे माल की मांग का लोभ बढ़ाता रहता है. और वो मांग रिहाइशों को बर्बाद और जिंदगियों को तबाह कर रही है. मिसाल के लिए रेत को लीजिए. ये कांच और कंक्रीट के उत्पादन में प्रमुखता से इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल है. इसकी सप्लाई अंतहीन और निर्बाध नहीं है. कम से कम उस किस्म की रेत जिसकी जरूरत निर्माण उद्योग को रहती है, जो नदियों के तल से आती है, समुद्रतटों से और समन्दर के तल से. रेत की खदानें नदियों को प्रदूषित कर रही हैं, मछलियों और दूसरे जलचरों को मार रही हैं, भूधंसाव की जिम्मेदार हैं और लोगों की जिंदगियों और आजीविका को जोखिम में डाल रही हैं.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की 2019 में आए एक मोटे आकलन के मुताबिक करीब 50 अरब टन रेत हर साल इस्तेमाल होती है और ये धरती पर सबसे ज्यादा मांग में रहने वाला कच्चा माल है.

और रेगिस्तान? वे भी तो हैं

बदकिस्मती से उनका भुरभुरा और दानेदार भूदृश्य काम लायक नहीं. रेगिस्तानों की रेत के कणों का आकार इतना ज्यादा गोल है कि उनसे कंक्रीट नहीं बनाया जा सकता. और इसीलिए निर्मांण कार्यों में इसके इस्तेमाल की तकनीकी अभी चलन में नहीं आई है.

रेत नहीं तो क्या लकड़ी?

आह. लकड़ी.. क्या कहने. सुनते ही टिकाऊपन की घंटी कानों में बजने लगती है. वृक्षों की खेती का एक पूरा उद्योग है जो इमारती लकड़ी के उत्पादन में काम आता है. (क्रिसमस ट्री भी हैं, लेकिन वो कहानी फिर कभी.)

बात ये है कि लकड़ी के प्रति हमारी भूख, इस काम के लिए उगाए जाने वाले पेड़ों की क्षमता से भी ज्यादा फैल चुकी है. इसका पता, पुराने जंगलों की वैद्य और अवैद्य कटान से चल जाता है जिसमें पिछले 20 साल के दौरान बहुत अधिक तेजी आई है. ये कटान इतना अधिक है हम हर साल अंदाजन ब्रिटेन के आकार का वृक्ष आवरण क्षेत्र गंवा रहे हैं. और इसका अर्थ है रिहाइशों और जमीनों की बर्बादी. और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में हमारे सबसे अच्छे हथियारों- यानी पेड़ों की तबाही.

तो क्या उपाय बचाहै- लेगो अपनाए?

नहीं. लेगो तो बिल्कुल नहीं.

एक पल के लिए जरा लकड़ी के सवाल पर फिर से लौटें. सामग्री में कुछ फेरबदल के साथ तैयार एक नया उत्पाद जिसे क्रॉस लैमिनेटड टिंबर यानी सीएलटी कह जाता है और जो बुनियादी रूप से लकड़ी और गोंद की परतों से बना है- एक विकल्प हो सकता है. ये कार्बन को छोड़ने के बजाय सोखता है, आग निरोधी है और इसका ढांचा मजबूत होता है. इसीलिए ऊंची इमारतों में स्टील के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. वैंकूवर, मेलबर्न और नॉर्वे के बेरगेन जैसे शहरों में ऐसे प्रोजेक्ट चालू हो चुके हैं. बर्लिन में 29 मंजिला रिहाइशी इमारत बनाई जाने की तैयारी है जो दुनिया की सबसे ऊंची सीएलटी इमारत होगी.

शोधकर्ता सीमेंट, इस्पात और दूसरी निर्माण सामग्री के उत्पादन से होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करने के तरीके खोजने में जुटे हैं. चूना पत्थर और रेत जैसे सिकुड़ते-घटते संसाधनों से सीमेंट बनाने के बजाय एक तरीका है फ्लाई-ऐश यानी कोयले की राख (कम से कम जब तक कोयले का इस्तेमाल न छोड़ दें) और वेस्ट ग्लास यानी कांच के कचरे से सीमेंट बनाने का.

समाधान हैं तो सही, लेकिन...

समाधान तो निकल सकते हैं. ये तो शुरुआत है और नई तकनीकें अभी मुख्यधारा में जगह नहीं बना पाई हैं.

दूसरे, ये महंगी भी हो सकती हैं, निर्माण सेक्टर में तो महंगा सामान किसी हाल में स्वीकार्य नहीं है, जहां लागत को लेकर हाय हाय मची रहती है.

दूसरा सस्ता विकल्प, ध्वस्त किए गए ठिकानों से निकले पुराने कंक्रीट का चूरा है. वह निर्माण में भरान के काम आ सकता है और नये कंक्रीट में मिलाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले माल की जगह ले सकता है.

स्टील यानी इस्पात 100 फीसदी रिसाईकिल हो जाता है, तो नये प्रोजेक्टो में इसका दोबारा इस्तेमाल हो सकता है. कुछ तो हो ही सकता है. सिर्फ पुनर्द्देशित सामग्री यानी फिर से इस्तेमाल लायक बनाई गई सामग्री की दुनिया भर में भारी मांग है.

इस बीच, सामग्री की लागत देखने के बजाय उसका इस्तेमाल ध्यान में रखते हुए तैयार की जाने वाली और ज्यादा प्रभावशाली निर्माण योजनाएं, बड़ी हद तक उत्सर्जनों में कटौती कर सकती हैं.

इससे भी अच्छा ये है कि हम निर्माण कार्य तभी करें जब कतई जरूरी हो. दशकों तक खड़ा रहने के लिहाज से डिजाइन की गई पुरानी इमारतों को गिराते रहने और हमेशा नया बनाते रहने की जरूरत नहीं हैं. उन्हें नये मकसद में, नये जीवन में ढाला जा सकता है. जैसे फैक्ट्रियों को अपार्टमेंटों में बदला जा सकता है और छोड़े हुए शॉपिंग सेंटरों को कम्युनिटी सेंटर या स्कूल में तब्दील किया जा सकता है.

संभावनाएं बेशक अपार हैं लेकिन संसाधन नहीं.

रिपोर्टः मार्टिन क्युअब्लर

Source: DW

English summary
building whats the big deal for the environment
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