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Big Buildings: भारत की प्रगति के सूचक हैं बड़े भवन

Big Buildings: भारत की भवन निर्माण कला, शताब्दियों से विश्‍व भर के लिए विस्‍मय और ईर्ष्‍या का विषय रही है। आज भी है, बस अंतर यही आया है कि पहले हमारी इमारतें हमारी सांस्‍कृतिक पहचान को स्‍थापित किया करती थीं, अब हमारे मजबूत आर्थिक इरादों और विकास को अभिव्‍यक्ति देती हैं।

हाल ही में हमने दो ऐसी इमारतें पूर्ण की हैं, जिन्‍होंने स्‍थापत्‍य के क्षेत्र में भारत का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। एक है, प्रगति मैदान स्थित इंटरनेशनल एग्‍जीबिशन-कम-कन्‍वेंशन सेंटर (आईईसीसी) 'भारत मंडपम', जिसका उद्घाटन हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है और दूसरी है, सूरत डायमंड बॉर्स (एसडीबी), जिसका लोकार्पण वह आगामी 21 नवंबर को कर सकते हैं।

construction of Big buildings are indicators of Indias progress

ये दोनों भवन, न सिर्फ भव्‍यता व विशालता की वजह से सराहे जा रहे हैं, बल्कि इनके निर्माण के माध्‍यम से हमने दो कीर्तिमान भी बनाए हैं। करीब 123 एकड़ में फैले और सात हजार लोगों के बैठने की क्षमता वाला भारत मंडपम, सिडनी ओपेरा हाउस से काफी बड़ा है। वहीं सूरत डायमंड बॉर्स पेंटागन को पीछे छोड़, विश्‍व का सबसे बड़ा ऑफिस कॉम्प्लेक्स बन गया है।

डायमंड सिटी के तौर पर प्रसिद्ध सूरत में स्थित एसडीबी का निर्माण कार्य आठ साल पहले 2015 में शुरू हुआ था। इसे 2022 में ही पूर्ण हो जाना था, लेकिन कोविड के चलते इसका कार्य बीच में ही रुक गया था। यह 14.38 हेक्‍टेअर में विस्‍तृत है और इसमें देश-विदेश के कारोबारियों के लिए 28 वर्गमीटर से 700 वर्गमीटर तक, अलग-अलग आकारों वाले चार हजार से अधिक ऑफिसों की व्‍यवस्‍था की गई है। इसमें नौ टॉवर हैं और प्रत्‍येक में 15 फ्लोर। दूसरी सुविधाओं के साथ इसमें 131 लिफ्ट हैं, कॉन्‍फ्रेंस हॉल हैं, रेस्‍तरां है। यहॉ एक स्‍काई वॉक भी निर्माणाधीन है, जिसके अगले साल पूरा होने की उम्‍मीद की जा रही है। हो सकता है कि आगे मुंबई के हीरा कारोबार को भी इसी बॉर्स में शिफ्ट कर दिया जाए।

जहॉं तक भारत मंडपम का प्रश्‍न है, यह प्रगति मैदान स्थित पुरानी संरचना का आधुनिक संस्‍करण है, जिसका काम 2017 में आरंभ हुआ था। इसके निर्माण पर कुल 2,254 करोड़ रुपए की लागत आई है। 'बॉर्स' के विपरीत, इसका निर्माण कार्य कोविड के दौरान भी चलता रहा, जिससे यह समय रहते पूरा हो सका। सितंबर में होने जा रहा जी20 नेताओं का सम्‍मेलन, शायद यहॉं होने वाला पहला बड़ा कार्यक्रम होगा। इससे सेंटर को एक वैश्विक प्रतिष्‍ठा मिलने की उम्‍मीद की जा रही है।

यह सिर्फ संयोग ही नहीं है कि दोनों भवन मुख्‍यत: व्‍यावसायिक उद्देश्‍यों को लेकर तैयार किए गए हैं। ऐसी इमारतों की आर्थिक व कूटनीतिक महत्‍ता को प्रधानमंत्री के उन उद्गारों से भी समझा जा सकता है, जो उन्‍होंने भारत मंडपम को देश को सौंपते हुए व्‍यक्‍त किए। उनका कहना था कि जब यह जी 20 की मेजबानी करेगा तो पूरा विश्‍व भारत के उदय का साक्षी बनेगा। उन्‍होंने यह भी विश्‍वास दिलाया कि उनके तीसरे कार्यकाल में भारत दुनिया की तीन शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होगा। भारत मंडपम पर हर भारतीय को गर्व है। यह भारत की इच्छाशक्ति का प्रतीक है और नए भारत का प्रतिबिंब है।

दरअसल इमारतों के माध्‍यम से अपनी इच्‍छाशक्ति और लक्ष्‍यों को लेकर प्रतिबद्धता प्रदर्शित करना बहुत लंबे समय से चली आ रही परंपरा है। ऊंचे व विशाल भवनों का निर्माण 19 वीं शताब्‍दी में ही शुरू हो गया था, जब न्यूयॉर्क व शिकागों जैसे महानगरों में इन शहरों की बढ़ती आर्थिक शक्ति के प्रतीक के रूप में गगनचुंबी इमारतों का निर्माण शुरू हुआ। आज भी सबसे ज्‍यादा ऊंची इमारतें उन शहरों में पाई जाती हैं, जो सबसे बड़े वित्‍तीय केंद्र हैं। फिल्मकार बासु भट्टाचार्य अपने साक्षात्‍कारों में अक्‍सर यह कहा करते थे कि जब वह पहली बार मुंबई आए तो यूनिवर्सिटी की बिल्डिंग सबसे बड़ी होती थी, आज स्‍टॉक एक्‍सचेंज की बिल्‍ड‍िंग सबसे ऊंची है। इसे वे समाज और सरकार की बदलती प्राथमिकताओं के एक प्रतीक के रूप में देखते थे।

बहुत सारी वजहे हैं, जिनकी वजह से विशाल इमारतें वित्‍तीय दृष्टि से महत्‍वपूर्ण मानी जाती हैं। एक, वे ज्‍यादा लोगों को और व्‍यावसायिक गतिवि‍धियों को अपेक्षाकृत कम जगह में समाहित करने में सक्षम होती हैं। जगह की कमी और बढ़ती कीमतों वाले शहरों में ये काफी फायदेमंद होती हैं। इनके किराए या स्‍पेस सेलिंग से होने वाली आय से दूसरे विकास कार्यों में मदद‍ मिलती है। ऐसी इमारतें लोगों का ध्‍यान खींचती हैं, जिससे नए निवेशक और व्‍यवसाय इनमें जगह पाना चाहते हैं। इससे शहरों की अर्थव्‍यवस्‍था को गति मिलती है।

विशाल व्‍यावसायिक भवन शहरों की ही नहीं, बल्कि देश की आर्थिक सुदृढ़ता और विकास के भी प्रतीक हैं। इनसे किसी राष्‍ट्र की समृद्धि का पता चलता है, जिससे दूसरे देशों के निवेशकों की उसमें दिलचस्‍पी और भरोसा बढ़ता है। हर बड़ी इमारत के साथ ऐसा हो, जरूरी नहीं है। इमारतों के आकार के साथ-साथ, वहॉं होने वाली गतिविधियॉं भी महत्‍वपूर्ण हैं। कई बार ये महज अपनी हैसियत दिखाने का जरिया भर बनकर रह जाती हैं। मिसाल के तौर पर, पाकिस्‍तान जैसे देश अगर अपने यहॉं कुछ भव्‍य और विशाल इमारतें बनवा भी लें तो इनसे उनके आर्थिक लक्ष्‍यों की पूर्ति में शायद ही कोई मदद मिलेगी। इसके अलावा, इनकी लोकेशन भी मायने रखती है। एक अवकिसित देश में इसे मूर्खता के रूप में देखा जा सकता है, जबकि विकासशील देश में इसे प्रगति का प्रतीक माना जाएगा और विकसित देश में प्रचुरता का।

भवन के इस्‍तेमाल के उद्देश्‍य, उसकी कूटनीतिक और सांस्‍कृतिक आइडेंटिटी को भी स्‍थापित करते हैं। जैसे पेंटागन, अमेरिका की सामरिक क्षमता के शक्तिशाली प्रतीक के रूप में देखी जाने वाली इमारत है। इसका नाम ही शत्रु देशों को हतोत्‍साहित करने के लिए काफी है। वहीं सिडनी ओपेरा हाउस, आस्‍ट्रेलिया के खुलेपन और बहु संस्‍कृतिवाद को प्रदर्शित करता है। ऐसे ही दुबई का बुर्ज खलीफा शहर को एक वैश्विक वित्‍तीय केंद्र के रूप में प्रस्‍तुत करता है।

इस तरह की इमारतों को लेकर समाज में एक स्‍पष्‍ट मत विभाजन है। बेशक, एक बड़ा वर्ग इन्‍हें समाज के लिए लाभदायक मानता है, क्‍योंकि इनसे अर्थव्‍यवस्‍था को प्रोत्‍साहन मिलता है, इनसे शहर का सौंदर्य बढ़ता है और रहने व काम करने के लिए कम जमीन की जरूरत होती है। वहीं एक वर्ग ऐसा भी है, जो यह मानता है कि भव्‍य इमारतें, सिर्फ अपने वैभव को प्रदर्शित करने का एक माध्‍यम हैं। ये अनावश्‍यक हैं और अवांछनीय भी, क्‍योंकि ये उपभोक्‍तावाद को बढ़ाती हैं और पर्यावरण को प्रदूषित करती हैं।

बड़े भवनों की लागत सामान्य भवनों से 20 से 30 प्रतिशत अधिक आती है और आपदा के समय में नुकसान ज्यादा होने की संभावना रहती है। फिर भी बड़े और ऊंचे भवनों का क्रेज कम नहीं हो रहा। मुंबई का रॉयल पैलाइश बिल्डिंग हो या फिर वर्ल्ड वन, दिल्ली में बना नया भारत मंडपम हो कि सूरत का डॉयमन्ड बॉर्स। ऊंचे और बड़े रिहाइशी व व्यावसायिक भवनों की लिस्ट में धीरे धीरे भारत भी शामिल होता जा रहा है जिसकी चर्चा दुनियाभर में हो रही है। यह नये भारत के उदय का संकेत भी है।

बड़ी इमारतों की आलोचना चाहे जो हो लेकिन इनके बिना अर्बन लैंडस्‍केप की कल्‍पना नहीं की जा सकती। कोई इन्‍हें पसंद करे या न करे, लेकिन इनकी लगातार बढ़ती संख्‍या, इन इमारतों की अपरिहार्यता का प्रमाण है। इनके बिना शहरों की व्‍यवस्‍था चरमरा जाएगी। इसके अलावा, इनकी मौजूदगी हमारे चारों तरफ की दुनिया पर एक उल्‍लेखनीय असर डालती है, राजनीतिक रूप से भी और आर्थिक रूप से भी।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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