Amravati Lok Sabha Chunav 2024: बीजेपी के लिए क्यों मुश्किल है अमरावती? कभी नहीं चखा जीत का स्वाद
Maharashtra Lok Sabha Chunav 2024: महाराष्ट्र की अमरावती लोकसभा सीट पर दूसरे चरण में 26 अप्रैल को मतदान है। 2019 के चुनाव की तुलना में इस बार इस सीट पर चुनावी समीकरण पूरी तरह उलट चुका है।
अमरावती की मौजूदा सांसद नवनीत राणा पिछली बार निर्दलीय चुनाव जीती थीं। तब उन्हें कांग्रेस और तत्कालीन संयुक्त एनसीपी का समर्थन हासिल था। इस बार वह बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं और उनका मुख्य मुकाबला कांग्रेस पार्टी के बलवंत वानखेड़े के साथ है।

अमरावती बीजेपी के लिए क्यों मुश्किल है?
महाराष्ट्र की अमरावती सीट बीजेपी अबतक कभी नहीं जीती है। बीजेपी में शामिल होने के बाद पार्टी ने मौजूदा निर्दलीय सांसद नवनीत राणा को टिकट दिया है, लेकिन इससे उसकी राह आसान होने की जगह और भी कठिन होती नजर आ रही है।
बीजेपी के कैडर में निराशा
नवनीत राणा ने पिछला चुनाव करीब 3% के अंतर से बीजेपी और मोदी विरोधी स्टैंड पर जीता था। इस बार वह मोदी के नाम और बीजेपी के विकास वाले काम पर चुनाव मैदान में हैं। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती ये है कि उसके अपने कार्यकर्ता ही राणा की उम्मीदवारी से बहुत ही ज्यादा निराश रहे हैं।
सहयोगी भी बन गए विरोधी
दूसरी चुनौती ये है कि प्रहार जनशक्ति पार्टी के नेता बच्चू काडु ने बीजेपी उम्मीदवार के खिलाफ बहुत तगड़ा प्रचार किया है। जबकि, वह महाराष्ट्र में सत्ताधारी महायुति गठबंधन में शामिल हैं। उन्होंने अपनी पार्टी के दिनेश बुब को उतारा है और बीजेपी के स्थानीय नेताओं को भी उसमें कोई आपत्ति नहीं रही है। राणा और काडु एक-दूसरे के कट्टर-विरोधी रहे हैं।
तीसरी बात पूर्व सांसद और पिछली बार इस सीट से शिवसेना के उम्मीदवार रहे आनंदराव अदसुल भी बीजेपी के फैसले को 'राजनीतिक आत्महत्या' बता चुके हैं। बताया जाता है कि पूरे चुनाव अभियान में बीजेपी के कैडर आमतौर पर निष्क्रिय ही नजर आए हैं और पूरा कैंपेन एक तरह से राणा की अपनी टीम ने ही चलाया है।
कांग्रेस को अमरावती में मिला है गोल्डन चांस
कांग्रेस के लिए अमरावती उसका पुराना गढ़ रहा है। पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल भी यहां से पार्टी की सांसद रह चुकी हैं। कांग्रेस के पक्ष में सबसे ज्यादा यहां का जातिगत और धार्मिक समीकरण काम करता हुआ नजर आ रहा है। यह एक सुरक्षित सीट है और यहां 18% से ज्यादा मुस्लिम आबादी का उसके पक्ष में रुझान स्पष्ट है।
कांग्रेस के साथ शिवसेना (यूबीटी) और एनसपी शरदचंद्र पवार का भी समर्थन है, लिहाजा विदर्भ की इस सीट पर समीकरण उसके पक्ष में ज्यादा मबजूत बताई जा रहा है।
कांग्रेस के सामने भी कम नहीं है चुनौतियां
लेकिन, ऐसा भी नहीं है कि कांग्रेस उम्मीदवार को यहां किसी तरह से वॉकओवर मिलने जा रहा है। सबसे पहली मुसीबत ये है कि बलवंत वानखेड़े नाम के एक निर्दलीय उम्मीदवार भी हैं, जिससे पार्टी को वोट कटने का डर सता रहा है।
आनंदराज अंबेडकर की उम्मीदवारी का भी संकट
लेकिन, उससे बड़ी चुनौती आनंदराज अंबेडकर की उम्मीदवारी है, जो निर्दलीय दावा ठोक रहे हैं। ये वंचित बहुजन अघाड़ी के प्रमुख प्रकाश अंबेडकर के भाई हैं और उन्हें वीबीए और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम का भी समर्थन प्राप्त है। पिछले चुनाव में इस सीट पर वीबीए को 5.85% वोट मिले थे।
अमरावती का जातीय और धार्मिक समीकरण
अमरावती सीट पर करीब 18,62,104 वोटर हैं। यहां 19.2% अनुसूचित जाति और 13.5% अनुसूचित जनजाति के लोग हैं। अगर धार्मिक आधार पर देखें तो हिंदू 67.4%, मुसलमान 18.5% और बौद्ध 13.29% हैं।
बीजेपी की आखिरी उम्मीद
बीजेपी की आखिरी उम्मीद गैर-मुस्लिम मतदाताओं की गोलबंदी पर टिकी है। क्योंकि, नवनीत राणा ने उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली महा विकास अघाड़ी (एमवीए) के खिलाफ जिस तरह से खुद को हिंदुत्व के चेहरे के तौर पर उभारा था, पार्टी नेतृत्व को कहीं न कहीं वही सिक्का चलने की उम्मीद है।












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