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New Parliament Building: ज्ञान, शक्ति और कर्म का संगम है नया संसद भवन

नया संसद भवन अपने वास्तु और व्यवहार में ज्ञान, शक्ति और कर्म का संगम है इसीलिए इसके तीन प्रवेश द्वारों का नामकरण ज्ञान, शक्ति और कर्म द्वार के रूप में किया गया है। यह भारत की सनातन लोकतांत्रिक परंपरा को परिभाषित करता है।

New Parliament Building a symbol of knowledge, power and action

New Parliament Building: संसद का शाब्दिक अर्थ है, जहां सभी बराबर होकर बैठते हैं। सम्+ सद् = संसद। सम् का मतलब बराबर और सद् का मतलब बैठना, आसीन होना या वास करना। संसद एक समूहवाची शब्द है, जिसके मूल में साथ बैठने का भाव निहित है। समूह की उपस्थिति बहुधा रचनात्मक उद्देश्य के लिए होती है। इसीलिए हमारे यहां पार्लियामेन्ट को परिभाषित करना हुआ तो संसद शब्द को चुना गया। दुनिया की अन्य लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सर्वोच्च सभा के लिए जो नाम मिलते हैं, वे इस प्रकार हैं - सीनेट (अमेरिका), पार्लियामेंट (ब्रिटेन), ड्यूमा (रूस)। उसी तरह भारतीय जनप्रतिनिधियों की सर्वोच्च सभा के लिए संसद नाम रखा गया।

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    New Parliament Building का सामने आया First Video, Watch Exclusive Video | वनइंडिया हिंदी

    भारत लोकतंत्र की जननी है। इसलिए भारत के प्राचीन गणराज्यों में इससे मिलते जुलते शब्दों का प्रयोग भी श्रुति, स्मृति, पुराण, महाकाव्य आदि ग्रंथों में मिलता है। विश, जन, प्रजा, गण, कुल, ग्राम, जनपद, सभा, समिति, परिषद, संघ, निकाय जैसे अनेक शब्दों एवं संस्थाओं के उल्लेख मिलते हैं, जिनसे पुष्टि होती है कि उस समय भी भारत में लोकतंत्र का अस्तित्व था। वैदिक वाङ्गमय पर दृष्टि डालने से दो प्रकार की गणतंत्रात्मक व्यवस्थाएँ सामने आती हैं। एक जिसमें राजा निर्वाचित किया जाता था और दूसरा जिसमें राज्य की शक्ति सभा या परिषद में निहित होती थी। इसे राजाधीन एवं गणाधीन शासन-तंत्र कहा जा सकता है।

    वैदिक राजा का निर्वाचन समिति में एकत्रित होने वाले लोगों द्वारा किया जाता था। समिति सार्वजनिक कार्यों को संपादित करने वाली संस्थाओं में सर्वप्रमुख थी। यह जनसामान्य का प्रतिनिधित्व करती थी। परिचर्चा और पारस्परिक सम्मति से निर्णय लिए जाते थे। वहीं सभा समिति के अधीन कार्य करती थी। इसमें वृद्ध एवं अनुभवी लोगों का विशेष स्थान प्राप्त होता था। यह चयनित लोगों की स्थायी संस्था थी। ब्राह्मण ग्रंथों में वर्णित राज्याभिषेक के आरंभ से अंत तक के कार्यव्यवहार से स्पष्ट होता है कि राजा को राजपद प्राप्त करने से पूर्व राष्ट्र के विभिन्न अंगों की अनुमति प्राप्त करनी पड़ती थी। वह राष्ट्र के भिन्न-भिन्न स्थानों की मिट्टी, जल, वर्ण, वायु, पर्वत और संपूर्ण प्रजा का प्रतिनिधित्व करता था। इसलिए उसके राज्याभिषेक में सबको सम्मिलित किया जाता था।

    उसे मंत्रिपरिषद के परामर्श, स्वीकृति और प्रजा के कल्याण की भावना से कार्य संपादित करना होता था। यहां तक कि उसके पुनर्निर्वाचन की भी निश्चित प्रक्रिया और व्यवस्था थी। उल्लेखनीय है कि समिति और सभा की सदस्यता जन्म के बजाय कर्म पर आधारित थी। नीति, सैन्य एवं सार्वजनिक हितों से जुड़े महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर विमर्श एवं नियमन हेतु विदथ-सभा का भी उल्लेख मिलता है, जिसका प्रयोग ऋग्वेद में सौ से अधिक बार किया गया है।

    कहने का आशय यह है कि लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था यह भारतीय मानस में निहित है। हम स्वभाव से लोकतांत्रिक है इसलिए बीते 75 सालों में कुछ एक अपवादों को छोड़ दें तो भारत में लोकतंत्र उत्तरोत्तर प्रबल और परिस्कृत हुआ है। लेकिन इस लोकतंत्र के मुख्य केन्द्र संसद का काम काज एक ऐसे भवन से चल रहा था जो ब्रिटिश काल में निर्मित किया गया था। हालांकि यह भारत के ही 64 योगिनी मंदिर की वास्तुकला से प्रेरित बताया जाता है लेकिन बीतते समय के साथ यह न सिर्फ कमजोर होने लगा था बल्कि बढ़ती आवश्यकता को पूरा करने में भी अक्षम हो चला था। ऐसे में स्वतंत्र भारत के अमृतकाल में नयी संसद भवन का निर्माण निश्चित रूप से भारतीय लोक मानस के लिए गौरव की बात है।

    आजादी के अमृत-काल की स्वर्णिम बेला में, आगामी 28 मई को प्रधानमंत्री मोदी देश को नए संसद-भवन की सौग़ात देने जा रहे हैं। यह लगभग 28 महीने के रिकॉर्ड समय में बनकर तैयार हुआ है। 10 दिसंबर, 2020 को प्रधानमंत्री मोदी ने नए संसद-भवन का शिलान्यास किया था। लोकतंत्र के इस महान मंदिर को भव्य, अद्भुत एवं अलौकिक स्वरूप में देखना भला किस भारतीय को सुंदर व सुखद नहीं लगेगा! नए संसद-भवन की छतों और दीवारों पर देश की कला एवं संस्कृति के विविध रंग उकेरे गए हैं। यह विविधता में एकता को सही स्वरूप में प्रतिबिंबित करते हैं। 200 से भी अधिक कलाकर्मी एवं शिल्पकार इससे सीधे तौर पर जुड़े रहे।

    दिल्ली भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में आता है, इसलिए इसमें भूकंपरोधी तकनीक के इस्तेमाल के साथ-साथ सुरक्षा के सभी सर्वोच्च मानकों का भी ध्यान रखा गया है। इस नए भवन में लोकसभा सांसदों के लिए लगभग 888 और राज्यसभा सांसदों के लिए 384 से अधिक सीटें हैं। इसमें दोनों सदनों के साझा सत्र में 1272 सांसदों से भी अधिक के बैठने की व्यवस्था है। दर्शक दीर्घा एवं गणमान्य अतिथियों के बैठने के लिए भी सीटों की संख्या बढ़ाई गई है। दर्शक दीर्घा गैलरी में 336 लोगों के बैठने का प्रबंध किया गया है।

    नए संसद भवन को त्रिकोण के आकार में डिजाइन किया गया है। इसे मौजूदा परिसर के पास ही बनाया गया है। 64,500 वर्गमीटर में बनने वाले इस नए संसद-भवन की लागत पहले लगभग 971 करोड़ रुपए आंकी गई थी, परंतु लोकार्पण तक इसकी कीमत 1250 करोड़ रुपए तक पहुँचने का अनुमान है। इसे चार मंजिला रखा गया है। इसमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा सभापति, प्रधानमंत्री एवं सांसदों के आने-जाने हेतु सुगमता की दृष्टि से तीन मुख्य प्रवेश-द्वार हैं। इनके नाम - ज्ञान-द्वार, शक्ति-द्वार एवं कर्म-द्वार रखे गए हैं। इसे पेपरलेस और प्रदूषणमुक्त रखे जाने का प्रयास किया गया है। इसमें बिजली की 30 प्रतिशत कम खपत होगी। नए संसद-भवन में हर सांसद के लिए उनका एक कार्यालय भी होगा।

    विदित हो कि मौजूदा संसद-भवन का निर्माण ब्रिटिश भारत में एड्विन लैंडसियर लूट्यन्स और सर हर्बर्ट बेकर ने किया था। इसे 1921 में प्रारंभ कर 1927 में पूरा किया गया था। नए संसद-भवन के निर्माण के पश्चात मौजूदा भवन को पुरातात्विक धरोहर एवं संग्रहालय के रूप में संजोए-सहेजे जाने की योजना है। वहीं नए संसद-भवन के निर्माण में भारत के वास्तुकार, भारत का धन और भारत का श्रम लगा है। इसके वास्तुकार (आर्किटेक्ट) बिमल पटेल हैं, जो इस समय के मशहूर एवं जाने-माने आर्किटेक्ट हैं। इसके निर्माण में प्रत्यक्ष रूप से लगभग 2000 इंजीनियर एवं कामगार तथा परोक्ष रूप से लगभग 9000 कामगार संबद्ध एवं सक्रिय रहे हैं।

    इसमें कोई दो राय नहीं कि नया संसद-भवन भारत की शताब्दियों पुरानी लोकतांत्रिक यात्रा का गौरवशाली कीर्त्तिस्तंभ है। निःसंदेह वह देश की लोकतांत्रिक यात्रा में मील का पत्थर साबित होगा। वह नूतन और पुरातन के सह-अस्तित्व का उदाहरण बनकर देशवासियों को प्रेरित करता रहेगा। परंतु यहाँ यह भी स्मरण रहे कि इस भवन की वास्तविक प्रतिष्ठा इसकी ऊंचाई, भव्यता या विशालता से नहीं, अपितु इसमें चुनकर आए जनप्रतिनिधियों के आचार, विचार एवं व्यवहार से सुनिश्चित होगी। इसकी महत्ता एवं सार्थकता इसके आकार-प्रकार से कहीं अधिक जन-मन की आशाओं एवं आकांक्षाओं की पूर्त्ति पर निर्भर करेगी।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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