Rajasthan Congress: भारत जोड़ने से पहले राजस्थान की कांग्रेस जोड़ें राहुल गांधी
Rajasthan Congress: सोनिया गांधी हों, राहुल गांधी हों या फिर प्रियंका गांधी कांग्रेस के तीनों गांधियों के लिए राजस्थान की राजनीति निरंतर परेशानी का कारण बनी हुई है। गांधी परिवार जान रहा है कि मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने की अखंड अभिलाषा में सचिन पायलट के सियासी पैतरे, कांग्रेस के लिए नई मुसीबतों का ताना बाना बुन रहे हैं।

उसी कड़ी में ताजा मुसीबत यह है कि दक्षिण भारत से सफलता का परचम लहराते हुए राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा पर राजस्थान में आने से पहले ही विवाद के बादल मंडरा रहे हैं। पायलट जिस गुर्जर जाति के हैं, उस गुर्जर समाज के नेता ही राहुल की यात्रा को रोकने की धमकी दे रहे हैं।
भारत जोड़ो यात्रा को लेकर राजस्थान में जो नया बखेड़ा खडा हो रहा है, उसके केंद्र में भी सचिन पायलट हैं। हालांकि, पायलट स्वयं यात्रा की सफलता की बात कर रहे हैं। लेकिन उनके अपने गुर्जर समाज के नेता धमकी दे रहे हैं कि एमबीसी वर्ग के लिए आरक्षण समझौते को लागू करें नहीं तो वे राहुल की यात्रा को रोकेंगे।
पायलट के चुनाव क्षेत्र टोंक के पास के उनियारा में शिक्षक नेताओं ने भी भारत जोड़ो यात्रा के विरोध में काले गुब्बारे दिखाने की बात कही, तो लाठीचार्ज तक हुआ। उधर, युवक कांग्रेस उपाध्यक्ष राकेश मीणा ने पायलट के साथ नाइंसाफी का आरोप लगाते हुए इस्तीफा दिया, तो उनके बाद युवक कांग्रेस के पायलट समर्थक 41 पदाधिकारियों को पद से हटा दिया गया है।
राजस्थान में राहुल की यह यात्रा झालावाड़, कोटा, बूंदी, टौंक, सवाई माधोपुर, दौसा और अलवर जिलों की 18 विधानसभा क्षेत्रों से गुजरेगी, जिनमें से 12 पर कांग्रेस का कब्जा है। सात जिलों में सिर्फ कोटा उत्तर और अलवर शहर विधानसभा क्षेत्र को छोड़ दिया जाए तो अन्य सभी 16 सीटों पर गुर्जर - मीणा जातियां प्रभावी है, और गुर्जर नेता के रूप में पायलट की पहचान है।
उनका विधानसभा क्षेत्र टौंक भी यात्रा के रूट में है, इसलिए भी पायलट का इस यात्रा में ज्यादा सक्रिय रहना जरूरी भी है और मजबूरी भी। लेकिन, पायलट के मूल वोट बैंक गुर्जर समुदाय के नेता विजय बैंसला ने अपनी आरक्षण की पुरानी मांगों को लेकर राहुल की यात्रा को रोकने की धमकी दी है, तो बीजेपी भी राहुल की यात्रा के दौरान ही राजस्थान में जन आक्रोश यात्रा निकाल रही है।
उधर, पायलट खेमे के विधायक भी सत्ता में भागीदारी के आलाकमान के आश्वासन और अन्य लंबित मांगों को लेकर मुखर हैं, क्योंकि वे भी मान रहे हैं कि यह यात्रा उनके लिए आलाकमान पर दबाव का अवसर लेकर आई है।
पता नहीं, जीवन के किस मोड़ पर अशोक गहलोत सियासत के इस सनातन सत्य को सहज ही समझ गए थे कि राजनीति अनंत संभावनाओं का अखंड खेल है और इस खेल में वही विजयी होता है, जो भविष्य की संभावनाओं को समय से पहले ही साध लेता है।
इसीलिए, गहलोत ने समय रहते अपनी अहमियत के जरिए गांधी परिवार को साध लिया, तो गांधी परिवार ने पायलट को दरकिनार करके 2018 के दिसंबर महीने में राजस्थान के सीएम की कुर्सी तीसरी बार गहलोत को सौप दी। कम उम्र में मुख्यमंत्री बनने की हसरत पाले पायलट को उप मुख्यमंत्री बनाया गया और साथ में प्रदेश अध्यक्ष का पद भी उन्हीं के पास रखा गया। लेकिन फिर भी पायलट असंतुष्ट हो गए और तब से गहलोत को कमजोर करने की कोशिश में लगातार जुटे हुए हैं।
लेकिन राजनीति के धुरंधर गहलोत यह सब गहराई से बूझ रहे थे, इसीलिए वे सतर्क भी थे, सावधान भी और कमजोर तो खैर वे कभी नहीं थे। इसीलिए, बगावत के अंदाज में मई 2020 में पायलट जब अपने साथी विधायकों के साथ मानेसर जाकर बैठ गए, तो भी गहलोत ने बड़ी समझदारी व सूझबूझ से इस बगावत को फुस्स कर दिया। परिणामस्वरूप, पायलट को उपमुख्यमंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दोनों पदों से बर्खास्त कर दिया गया।
पांच दशक के सियासी अनुभवी गहलोत अपने विधायक दल में इस संभावित टूट के खतरों के प्रति पहले दिन से ही सतर्क थे, लेकिन कभी भी रक्षात्मक रुख नहीं दर्शाया, बल्कि उल्टे पलटवार करते रहे। भारत के राजनीतिक इतिहास में संभवत: यह पहला मामला था जब किसी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा अपनी ही पार्टी की सरकार गिराने की कोशिश की गई।
वैसे, कांग्रेस के लिए यह कोई शुभ सूचना नहीं है कि कभी देश में सर्वाधिक प्रदेशों में राज करने वाली कांग्रेस के हाथ में अब केवल दो ही राज्य बचे हैं, और दोनों ही राज्यों में बड़े कद के दो नेताओं के बीच उनके कद से भी बड़ा बवाल स्थायी हकीकत है।
छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के बीच मामला फिलहाल तो युद्धकाल से निकलकर शांतिकाल में है। लेकिन राजस्थान में मुख्यमंत्री पद पाने की कोशिश में पायलट के तीखे तेवर और गहलोत के जादुई कमाल के दौर में राजस्थान कांग्रेस की मजबूत राजनीति, अब मजबूरियों के उस मुश्किल मुकाम पर पहुंच गई हैं, जहां शीर्ष नेतृत्व लाचार है, विपक्ष हमलावर और कार्यकर्ता हैरान।
समझा जा सकता है कि शीर्ष नेतृत्व लगातार ललक दिखाते पायलट को पटाने में हर तरह से नाकाम है, तो गहलोत विधायकों के बहुमत के सहारे राजनीति के हर खेल को पलटने की काबिलियत से सत्ता पर आसीन।
अब राहुल की यात्रा के विरोध से अपने समाज को कैसे रोकें, इस सवाल से पायलट परेशान हैं और उधर, अशोक गहलोत निश्चिंत होकर गुजरात में विधानसभा चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं। इसीलिए पायलट गुट यह प्रचारित कर रहा है कि गुर्जरों को भड़काने के पीछे गहलोत का हाथ है।
इस समूचे राजनीतिक परिदृश्य में कार्यकर्ता अपनी पार्टी की पतली होती हालत से हैरान हैं और हत्तप्रभ भी। अब जब चुनाव में एक साल से भी कम वक्त रह गया है, तो पायलट की मुख्यमंत्री बनने की इच्छा नए सिरे से जोर मारने लगी है।
उनके समर्थक राजस्थान में फिर से कांग्रेस की सरकार लाने के लिए पायलट को मुख्यमंत्री प्रतिष्ठित करने का राग आलाप रहे हैं। लेकिन इस सारे सियासी समीकरण का जो सात्विक सत्य और ताकतवर तथ्य सामने आ रहा है, वह यही है कि राजस्थान में कांग्रेस का जो नुकसान हो रहा है, उसकी भरपाई करना कांग्रेस के लिए बेहद मुश्किल है।
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ऐसे में राहुल गांधी हों या कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे। इनके लिए भारत जोड़ने से ज्यादा जरूरी है कि वह राजस्थान में कांग्रेस को जोड़ें। देशभर में कांग्रेस के ढहते किलों के बीच राजस्थान के किले की मजबूत दीवार भी दरक रही है।
यह भी पढ़ें: Gehlot vs Pilot: गहलोत को हटाने में लगे कांग्रेसी नेताओं में बढ़ती कुंठा
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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