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गोवा विधानभा चुनाव : एक थे बाल ठाकरे, एक हैं उद्धव

नई दिल्ली, 11 दिसंबर। क्या उद्धव ठाकरे की शिवसेना कांग्रेस की बी टीम बन कर रह जाएगी ? गोवा विधानसभा चुनाव में शिवसेना, कांग्रेस से गठबंधन कर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। क्या शिवसेना अपने सिद्धांतों की तिलांजलि दे कर कांग्रेस की पिछलग्गू पार्टी बनना चाहती है ? गोवा में शिवसेना का कोई आधार नहीं है। तो क्या वह भाजपा का वोट काट कर कांग्रेस को फायदा पहुंचाने के लिए ऐसा करेगी? 2017 और 2012 में शिवसेना गोवा में तीन-तीन सीटों पर चुनाव लड़ कर बुरी तरह हार चुकी है।

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किसी सीट पर उसे हजार वोट भी नहीं मिले थे। फिर वह गोवा में क्यों चुनाव लड़ना चाहती है ? क्या अब वह कांग्रेस के सहारे राजनीति करेगी ? हाल ही में शिवसेना ने यह भी कहा है कि कांग्रेस के बिना राष्ट्रीय विकल्प की बात सोची भी नहीं जा सकती। आखिर शिवसेना कांग्रेस की इतनी बड़ी हमदर्द कैसे हो गयी जिसकी कभी बाला साहेब धज्जियां उड़ाया करते थे?

एक थे बाल ठाकरे

एक थे बाल ठाकरे

एक थे बाल ठाकरे। एक थी शिवसेना। आज हैं उद्धव ठाकरे। आज भी शिवसेना है। लेकिन पहले वाली बात नहीं। नाम वही है लेकिन रूप बदल गया है। बाला साहेब ने अपनी शर्तों पर राजनीति की। उन्हें किंग नहीं किंगमेकर बनना पंसद था। चाहते तो 1995 में सीएम बन सकते थे। लेकिन पद का मोह नहीं था। मराठी मानुस और हिंदुत्व की राजनीति की। सोनिया गांधी के कट्टरक विरोधी रहे। लेकिन अब उनके पुत्र उद्धव आज उन्हीं सोनिया गांधी की शरण में हैं। कुर्सी के मोह में उन्होंने अपने पिता के उसूलों की बलि चढ़ा दी है। कुछ लोग शिवसेना और कांग्रेस की दोस्ती का इस आधार पर समर्थन करना चाहते हैं कि बाल ठाकरे ने इंदिरा गांधी के आपातकाल का समर्थन किया था। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। उन्होंने इमरजेंसी के उस प्रभाव को ठीक कहा था जब महंगाई कम हो गयी थी, दफ्तर समय पर खुलने लगे थे, रेल गाड़ियां समय पर चलने लगीं थीं। नागरिक अधिकारों के छीने जाने का उन्होंने कभी समर्थन नहीं किया था। ये बात उनके कार्टून से भी प्रमाणित होती है।

कांग्रेस के विरोधी थे बाल ठाकरे

कांग्रेस के विरोधी थे बाल ठाकरे

1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो उसने इमरजेंसी की ज्यादतियों की जांच के लिए शाह आयोग का गठन किया। तब पराजित इंदिरा गांधी ने कहा था कि यह आयोग उन्हें बदनाम करने के लिए बनाया गया है। इस विषय पर बाल ठाकरे ने एक कार्टून बनाया था। इसमें दिखाया गया था, इंदिरा गांधी सत्ता के सिंहसान पर बैठी हैं और उनकी गोद में संजय गांधी काला पेंट और ब्रश लेकर खड़े हैं। इंदिरा गांधी के सामने शाह आयोग के अध्यक्ष खड़ा हैं। संजय गांधी इंदिरा गांधी के चेहरे पर काला पेंट पोत रहे हैं और इंदिरा गांधी की उंगली शाह आयोग की तरफ उठी हुई है। यानी बाल ठाकरे ने अपने कार्टून के जरिये कहा था कि इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी ने इंदिरा गांधी को बदनाम किया लेकिन वे बेवजह शाह आयोग पर उंगली उठा रही हैं।

सोनिया- राहुल के खिलाफ तीखे बोल

सोनिया- राहुल के खिलाफ तीखे बोल

बाला साहेब के मित्रों में विरोधी दलों के नेता भी थे। लेकिन उन्होंने कभी किसी से राजनीतिक समझौता नहीं किया। रिश्तों को व्यक्तिगत रूप से निभाते थे। जैसे की उन्होंने कांग्रेस के सुनील दत्त और एनसीपी के शरद पवार के लिए किया। उन्होने राजनीति और निजी रिश्तों में कभी घालमेल नहीं किया। जब शिवसेना की बात आयी तो उन्होंने शरद पवार पर जोरदार हमला भी बोला। मराठी मानुस और हिंदुत्व की अवधारणा के कारण उनकी राजनीति हरदम कांग्रेस के खिलाफ रही। उन्होंने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा बहुत मजबूती से उठाया था। 2010 में उन्होंने 'सामना' में लिखा था, मुम्बई सभी की हो सकती है लेकिन इटैलियन मम्मी की कभी नहीं हो सकती। एक बार तो उन्होंने बहुत ही विवादास्पद बयान दे दिया था। दशहरा की एक रैली में बाल ठाकरे ने कहा था, सोनिया गांधी के कदमों में तो शिखंडी झुकते हैं। उन्होंने राहुल गांधी का भी खूब मजाक उड़ाया था। 2011 में राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश की फूलपुर रैली में कहा था, यूपी के लोग कब तक महाराष्ट्र में जा कर भीख मांगेंगे ? इस बयान पर बहुत बबाल हुआ था। तब बाल ठाकरे ने राहुल गांधी की बुद्धि पर तंज कसते हुए लिखा था, "राहुल के नाम पर दे दे बाबा।"

गोवा में शिवसेना और कांग्रेस का मेल होगा ?

गोवा में शिवसेना और कांग्रेस का मेल होगा ?

शिवसेना का महाराष्ट्र में तो मजबूत आधार रहा है लेकिन पड़ोसी राज्य गोवा में उसका कोई प्रभाव नहीं रहा। महाराष्ट्र में गठबंधन की सरकार चला रही शिवसेना की नजर अब गोवा पर है। वह कांग्रेस के सहयोग से यहां भी सत्ता की कुर्सी तक पहुंचना चाहती है। इसलिए शिवसेना के नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी के दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना ने महाराष्ट्र गोमांतक पार्टी और गोवा सुरक्षा मंच के साथ समझौता कर चुनाव लड़ा था। महाराष्ट्र गोमांतक पार्टी को तीन सीटों पर जीत मिली लेकिन शिवसेना और गोवा सुरक्षा मंच का खाता नहीं खुला। दो महीना पहले शिवसेना ने गोवा में 22 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की थी। तब वह अकेल लड़ने की बात सोच रही थी। लेकिन जमीनी हकीकत उसे मालूम है। चूंकि कांग्रेस का गोवा में मजबूत आधार रहा है और वह कई बार सरकार बना चुकी। इसलिए शिवसेना कांग्रेस की तरफ याचना भरी नजरों से देख रही है।

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