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कांग्रेस में ही उठी संविधान के खिलाफ आवाज

Goa Congress: मौजूदा चुनाव अभियान में कांग्रेस नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर एक आरोप हर जगह लगा रहा है। राहुल गांधी समेत पूरी कांग्रेस का दावा है कि अगर मोदी सरकार को एक बार फिर बहुमत मिला तो वे संविधान को बदलकर रख देंगे। कांग्रेस चुनाव में संविधान पर संकट को बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश में है। कांग्रेस देश को भरोसा दिलाने की कोशिश कर रही है कि वह संविधान की रक्षा करेगी। लेकिन उसके ही एक नेता ने संविधान को लेकर गलत बयान दे दिया है।

दक्षिण गोवा से कांग्रेस के उम्मीदवार विरियाटो फर्नांडिस ने एक चुनावी सभा में कह दिया कि गोवा पर भारतीय संविधान थोपा गया। जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि गोवा के लोग अपने भाग्य का फैसला खुद करेंगे। विरियाटो का यह बयान एक तरह से अलगाववाद को बढ़ावा देता नजर आ रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि उम्मीदवारी का पर्चा दाखिल करते वक्त हर व्यक्ति भारतीय संविधान के प्रति शपथ लेता है। लेकिन विरियाटो यह शपथ भी भूल गए। विरियाटो यह भी भूल गए हैं कि संविधान को लेकर उनके नेतृत्व का रूख क्या है?

Goa Congress

कांग्रेसी नेतृत्व बीजेपी से संविधान को खतरे का नैरेटिव गढ़ने की कोशिश कर रहा है। विरियाटो तो इससे भी आगे निकल गए हैं। वे एक तरह से गोवा में अलगाववाद को ही बढ़ावा दे रहे हैं। विरियाटो के बयान का संदेश साफ है। अगर उनकी बात स्वीकार कर ली जाए या गोवा का युवा इस तथ्य को मान ही ले तो इसका मतलब है कि गोवा के लोगों को भारत से अपने रिश्ते पर विचार करना चाहिए।

भारत की एकता और अखंडता को चुनौती देने वाले कांग्रेसी उम्मीदवार के इस बयान का गोवा के मुख्यमंत्री डॉक्टर प्रमोद सावंत ने तीखा जवाब दिया है। सावंत ने इस बयान को भयावह करार दिया है। सावंत ने इस बयान पर हैरत जताते हुए कहा है कि वे इस तरह के गैर जिम्मेदाराना बयान से स्तब्ध हैं। कांग्रेस की कथनी और करनी में कितना अंतर है, विरियाटो के बयान को इस संदर्भ में केस स्टडी के रूप में देखा जाना चाहिए। विरियाटो से अब तक कांग्रेस नेतृत्व ने कोई सवाल-जवाब नहीं किया है। इससे इस विवाद को और हवा मिलना स्वाभाविक है।

यह सर्वविदित है कि 15 अगस्त 1947 को देश को लंबी गुलामी से आजादी मिली। लेकिन यह भी सच है कि तब गोवा पुर्तगाल का उपनिवेश था। गोवा की आजादी की लड़ाई तो पिछली सदी के तीस के दशक में गोवा कांग्रेस की स्थापना के साथ ही शुरू हो गया था। जब देश की आजादी की पूर्व पीठिका तैयार हो रही थी, तब समाजवादी धुरंधर डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने 1946 में गोवा का दौरा किया था। वहां उन्होंने पाया कि पुर्तगाली शासन के अधीन गोवा की स्थिति अंग्रेजों के गुलाम हिंदुस्तान से भी बदतर है।

इसके खिलाफ डॉ लोहिया ने वहां भाषण दिया और धरने पर बैठ गए थे, जिसमें उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद से मधु लिमये जैसे समाजवादी गोवा जाकर धरना देते रहे। गोवा मुक्ति संग्राम के सेनानी भी संघर्षरत रहे। तब भारत में भी गोवा की आजादी को लेकर सवाल उठे। एक बार संसद में एक चर्चा के दौरान पंडित नेहरू ने गोवा के सवाल पर ऐसा जवाब दिया था, जिससे देश सन्न रह गया था। तब पंडित नेहरू ने कहा था कि भारत के खूबसूरत चेहरे पर गोवा एक मस्सा जैसा है, जिसे उंगलियों से भी थामा जा सकता है।

विरियाटो के बयान से लगता है कि उन्हें या तो गोवा के इस इतिहास का पता नहीं है या फिर उसे जानने में उनकी दिलचस्पी नहीं है। तो क्या यह मान लिया जाए कि गोवा के मुक्ति संग्राम में देशभर से आए सेनानियों का संघर्ष बेकार गया? यह सच है कि गोवा मुक्ति संग्राम में शामिल स्वतंत्रता सेनानी तो यही मानते थे कि गोवा भी वैसे ही भारत का अभिन्न अंग है, जिस तरह यूपी है, बिहार है या महाराष्ट्र है। इसलिए उन्होंने उसकी मुक्ति का संघर्ष किया।

दिलचस्प यह है कि अपने चुनावी भाषण में विरियाटो फर्नांडिस ने यह भी दावा किया है कि साल 2019 के चुनाव के दौरान उन्होंने अपना यह विचार तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के सामने भी व्यक्त किया था। ऐसा कहकर उन्होंने एक तरह से राहुल गांधी की सोच को भी कठघरे में खड़ा कर दिया गया है।

भारत में एक विचारधारा ऐसी भी है, जो जम्मू-कश्मीर के विलय पर भी सवाल उठाते हुए उसकी स्वतंत्रता तक का पक्षधर रही है। ऐसी वैचारिकी वाले वर्ग में सबसे ज्यादा लोग वामपंथी सोच वाले हैं। विरियाटो का बयान भी उसी वैचारिकी से मेल खाता है। वैसे आज राजसत्ता इतनी ताकतवर है कि ऐसे विचारों को मूर्त रूप देना संभव नहीं है।

आज राज्य इतना ताकतवर है कि वह ऐसी सोच को जब चाहे तब कुचल सकता है। लेकिन लोकतांत्रिक समाज होने की वजह से ऐसे विचार जब उठते हैं तो अलगाववादी सोच को बढ़ावा मिलता है। इससे छोटा ही सही, एक वर्ग प्रेरित भी होता है। इस बहाने अशांति और अराजकता को बढ़ावा मिलता है। स्वाधीनता आंदोलन की प्रतिनिधि पार्टी कांग्रेस के सदस्य विरियाटो को इसकी समझ तो होनी ही चाहिए।

कांग्रेस नेतृत्व को भी चाहिए था कि वह विरियाटो को चेतावनी देता। लेकिन ऐसा लग रहा है कि गोवा की आजादी को 14 साल तक टालने वाली कांग्रेस एक बार फिर उसी राह पर है। कांग्रेस अगर विरियाटो से सवाल-जवाब नहीं करती तो यही माना जाएगा कि एक बार फिर कांग्रेस छह दशक पुराने मानस पर ही कायम है, जो गोवा को हिंदुस्तान के खूबसूरत चेहरे पर मस्सा मानता था और उसे उंगली से ही ढंकने के जुगत में रहता है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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