"जो राष्ट्र शास्त्र पढ़ना छोड़ देते हैं, वे समाप्त हो जाते हैं"
भारत की संस्कृति ज्ञान और प्रज्ञा के संवर्धन की जननी है। भारत के कण-कण में लोक निहित है और लोक का मंथन ही भविष्य की दिशा तय करने का सामर्थ्य रखता है। इस वैचारिक मंथन का सामूहिक निष्कर्ष राष्ट्र के अंतस को सुदृढ़ रखने का मार्ग प्रशस्त करेगा।
इसी भाव के साथ गुवाहाटी में 21 से 24 सितंबर के बीच लोकमंथन का आयोजन हुआ जिसने लोक विमर्श को राष्ट्रीय आयाम दिये तथा लोक परंपरा को जीवित रखने का संकल्प लिया गया।

प्रत्येक दो वर्ष के अंतराल में होने वाले इस वैचारिक विमर्श "लोकमंथन" का उद्देश्य जन गण मन में भारत बोध की अनुभूति का संचार करना है। राष्ट्रीयता का सार राजनीतिक अथवा प्रशासनिक तंत्र में नहीं होता। यह तो एक सांस्कृतिक विरासत है, अपरिवर्तनीय संस्कृति है जो देशवासियों को एक सूत्र में बांधकर रखती है। "राष्ट्र प्रथम" की अवधारणा को स्थापित करना ही लोकमंथन का मूल है। मूर्धन्य साहित्यकार स्व. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, "लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है, बल्कि नगरों और गाँवों में फैली हुई वह समूची जनता है, जिनके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं हैं। ये लोग नगर में रहने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त होते हैं।"
इसी लोक शब्द को आधार मानकर वैचारिक अनुष्ठान से विविध समूहों को जोड़ना और मंथन से अमृत चुनकर उसे समाज को देना, यही लोकमंथन का सार है। "वसुधैव कुटुंबकम्" हमारा मूल है और बंधुत्व भाव ने हमें सदा उच्च प्रतिमान पर प्रतिष्ठित किया है। दुनिया को शांति का संदेश इसी भूमि से मिला तो धर्म रक्षार्थ अपने रक्त-संबंधियों से युद्ध का शौर्य भी इसी भूमि की देन है। सभ्यताओं के उत्थान-पतन की साक्षी यह भारत भूमि इतनी पवित्र है कि देवता भी मोक्ष हेतु यहाँ जन्म लेना चाहते हैं।
प्रज्ञा प्रवाह की अगुवाई में आयोजित उक्त लोक मंथन में कई विषयों पर परिचर्चा हुई। उद्घाटन सत्र में भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि संवाद, वाद-विवाद और चर्चा शासन की आत्मा हैं। इस मामले में समसामयिक परिदृश्य, विशेष रूप से विधायिका में, चिंताजनक है। चर्चा और संवाद के लिए संपन्न स्थान को खतरों से बचाया जाना चाहिए। मीडिया- कर्कश लड़ाई के मैदानों में बदल रहे हैं। मीडिया को यहां पहल करनी चाहिए। उन्हें आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। अनूठी, मूल और हाशिए की आवाजों को मुख्यधारा में आने देना चाहिए।
असम के राज्यपाल प्रोफेसर जगदीश मुखी ने कहा कि लोकमंथन हमारे देश के विभिन्न हिस्सों में छिपे सांस्कृतिक और पारंपरिक खजाने को खोजने और संजोने की एक यात्रा है। इससे भारत को अपना गौरव पुनः प्राप्त करने में मदद मिलेगी। असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि भारत 1947 में स्वतंत्रता के बाद बना देश नहीं है बल्कि यह पांच हजार साल से अधिक वर्षों से चल रही सभ्यता है। भारतवर्ष केवल एक राष्ट्र नहीं है जो 19वीं सदी में अस्तित्व में आया था। यह एक जीवित इकाई है। उत्तर पूर्व ने महान प्राचीन भारतीय सभ्यता को गहराई से समृद्ध किया था। 15वीं शताब्दी के प्रख्यात वैष्णव संत महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव भारतवर्ष को असम के साथ जोड़ने वाले पहले व्यक्ति थे और उन्होंने भारत को अपनी मातृभूमि कहा था।
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लोक परंपरा में पर्यावरण एवं जैव विविधता पर आयोजित संभाषण में वक्ता अनंत हेगडे ने कहा कि तुलसी चौरा बनाकर पूजा करना हमारी संस्कृति है। पीपल और बरगद के पेड़ों की पूजा हमारी धार्मिक मान्यतायें हैं। हम पर्यावरण प्रहरी रहे हैं। इसका रक्षा के लिये पौधारोपण अत्यंत आवश्यक है। वक्ता प्रो. परिमल भट्टाचार्य ने भारत में जंगलों पर बात करते हुये जैव विविधता पर प्रकाश डाला। भारतीय समाज में औद्योगिक जातियों के संदर्भ पर आयोजित संभाषण समारोह में वक्ता के रूप में बनवारी ने कहा कि कर्त्तव्य की जानकारी परंपरा से मिलती है लेकिन शास्त्रों के अनुसार हमें संस्कार से कर्त्तव्य की जानकारी मिलती है। मर्यादा का उल्लंघन करने से जाति चली जाती है। प्रो. भागवती प्रकाश शर्मा ने कहा कि प्रतिदिन के व्यवहार में भी शास्त्र परिलक्षित होता है। आज शास्त्र के विधान लोक जीवन में नहीं मिलते लेकिन प्राचीन काल में शास्त्र के विधान लोक जीवन में मिलते थे। हमारी लोक परंपरा में ऐतिहासिक मान्यताएं विद्यमान हैं।
नगालैंड के उच्च शिक्षा एवं जनजाति मामलों के मंत्री तेमजेन इम्ना ने कहा कि नगालैंड में 17 जनजातियां हैं लेकिन उनकी भाषा की कोई लिपि नहीं है। हमारी ऐतिहासिक शक्ति खो चुकी है। हम अपने अस्तित्व को पूरी तरह से खोज नहीं पाए हैं। यदि हम अपने मूल को खोज लें और सत्य विचारों पर चलें तो हम बहुत बड़े उत्पादक हो जाएँगे। केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि भारतवर्ष के कण-कण में लोक निहित है। भारतीय सभ्यता का सबसे बड़ा महत्व यह है कि जैसा व्यवहार आपके लिए पीड़ादायक है, आप वैसा व्यवहार दूसरे के लिए न करें। भारतीयता के आदर्श ऋषि-मुनि रहे हैं। भारत की संस्कृति ज्ञान और प्रज्ञा के संवर्द्धन के लिए जानी जाती है। ज्ञान की प्राप्ति करना और उसे दूसरे के साथ साझा करना ही तप है। लोक परंपरा में शक्ति की अवधारणा में मनोज श्रीवास्तव ने कहा लोक शब्द मात्र देशज ही नहीं, शक्ति का भी प्रतिनिधित्व करता है अतः शक्ति भी तीनों लोकों में व्याप्त है। सोनल मानसिंह ने कहा कि समाज में शक्ति की अलग-अलग अवधारणाएं हैं जो कहीं न कहीं मिलकर एकाकार हो जाती हैं।
"लोक" शब्द में समाहित भारतीय दृष्टि व्यापक और विविधवर्णी है। जीवन की वास्तविकता से लेकर व्यवहार की सहज-सरल प्रवृति और पद्धति है जिसे विकसित करने में भारतीय समाज को सदियों का समय लगा है। यह पीढ़ियों तक हस्तांतरित होती है जिसकी प्रक्रिया का एक छोटा सा प्रयास है "लोकमंथन" जहाँ भारत के कोने-कोने से विविधता से युक्त लोग आकर संस्कृति, सभ्यता, साहित्य, शिक्षा, संस्कार आदि का आदान-प्रदान करते हैं जो भारत में परंपरा के रूप में "प्रवाहवान" है। यह ऐसा सदानीरा प्रवाह है जो जीवंत है, प्रासंगिक है, नूतन है। लोक और शास्त्र मिलकर राष्ट्र बनाते हैं। आचार्य चाणक्य ने कहा है, "जो राष्ट्र शास्त्र पढ़ना छोड़ देते हैं, वे राष्ट्र समाप्त हो जाते हैं। अतीत को जाने बिना भविष्य निर्माण की संभावना है ही नहीं।"
राष्ट्र का अस्तित्व उसके शास्त्र तथा संस्कृति को जानने, उसके संरक्षण पर निर्भर करता है। चिंतन, मनन और दृष्टिकोण की विशेषता ही सनातन को सिद्धांत प्रामाणिक तथा मानव स्वभाव के अनुकूल बनाती है। भारत की लोक संस्कृति शास्त्र और शस्त्र का अनूठा संगम है। सनातन और संस्कृति मिलकर भारत को विश्व का सिरमौर बनाते हैं और इसकी गति सदा अक्षुण्ण रहे यह हमारी जवाबदेही है। इसी के निर्वहन हेतु यह आवश्यक है कि हम अपनी धार्मिक मान्यताओं को जीवित रखें, ज्ञान-विज्ञान को पीढ़ियों में हस्तांतरित करें तथा जातीय जीवन परंपरा को बहुरंगीय रूप में समाज में समाहित करें। यदि हम ऐसा कर पाने में सफल हुये तो हमारी सामूहिक चेतना समूचे विश्व का मार्ग प्रशस्त करेगी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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