इंडिया गेट से: संघ प्रमुख मोहन भागवत का कौम जोड़ो अभियान
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पिछले महीने 22 अगस्त को सरसंघचालक मोहन भागवत ने पांच मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मुलाकात की थी। उसके ठीक एक महीने बाद 22 सितंबर को वह दिल्ली की एक मस्जिद में गए और वहां मजार पर फूल चढाए। यह मस्जिद दिल्ली के कस्तूरबा गांधी मार्ग पर है और इस मस्जिद में मौलाना जमील अहमद इलयासी की मजार है, जिन्हें वह श्रद्धांजलि देने गए थे।

यह जानना जरूरी है कि मौलाना जमील इलियासी थे कौन जिनकी मजार पर फूल चढाना सरसंघचालक ने इतना महत्वपूर्ण माना। मौलाना इलियासी खुले विचारों के मुस्लिम स्कॉलर थे। उन्होंने दुनिया भर के अनेक धर्मों के बुद्धिजीवियों के साथ मेल मुलाकात करके धार्मिक सौहार्द के लिए काम किया था। यहाँ तक कि वह यहूदी धर्म गुरुओं से मिलने इजराइल भी गए थे।
भारत में उनकी भूमिका कौमी एकता की थी। कौमी एकता और हिन्दू मुस्लिम सौहार्द्र के लिए उनकी इंदिरा गांधी से लेकर अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों से मुलाकातें होती रही हैं, जिनमें राजीव गांधी, नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल थे। यहाँ तक कि कट्टर हिंदूवादी माने जाने वाले मुरली मनोहर जोशी जब एच.आर.डी मिनिस्टर थे तो मुस्लिम शिक्षा में सुधारों के लिए उनके साथ कई मुलाकातें हुई थीं।
मौलाना जमील अहमद के प्रयासों से वक्फ की सम्पत्ति के प्रबन्धन के लिए वक्फ बोर्ड ट्रिब्यूनल का गठन हुआ था। भारत में उनकी सबसे बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका यह रही कि उन्होंने मस्जिदों के इमामों का अखिल भारतीय संगठन खड़ा किया जिसका अध्यक्ष अब उनका बेटा इमाम उमर इलियासी है। इस संगठन का देशभर की सभी मस्जिदों के इमामों के साथ नेटवर्क है। इसलिए मोहन भागवत का उनकी मजार पर फूल चढाना और संगठन के मौजूदा अध्यक्ष उमर इलियासी से मुलाक़ात करना हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रयासों हेतु विशेष मायने रखता है।
उमर इलियासी से मुलाक़ात करने सरसंघचालक अकेले नहीं गए थे। संघ के तीन बड़े नेता नेता कृष्ण गोपाल, इन्द्रेश कुमार और रामलाल भी उनके साथ थे। तीनों संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और पदाधिकारी हैं। इन्द्रेश कुमार तो कई सालों से मुस्लिमों के बीच ही काम कर रहे हैं। उन्होंने मस्लिम राष्ट्रीय मंच का गठन किया था, जिसकी ब्रांच सारे देश में खुल चुकी हैं। इस संगठन में हजारों राष्ट्रवादी मुस्लिम शामिल हुए हैं। संघ नेतृत्व को मुस्लिमों के नजदीक लाने में इन्द्रेश कुमार अहम भूमिका निभा रहे हैं।
यहाँ संघ के इतिहास में सबसे बड़ी घटना यह हुई है कि किसी मुस्लिम की मजार पर सरसंघचालक ने फूल चढाए हैं। इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी और नरेद्र मोदी की ओर से अजमेर शरीफ पर चादर भेजने को भी संघ में अच्छा नहीं माना जाता था।
आप सब को याद होगा कि 2006 में जब लाल कृष्ण आडवाणी ने पाकिस्तान में जाकर जिन्ना की मजार पर फूल चढाए थे तो भाजपा और संघ परिवार में कितना बवाल खड़ा हो गया था। आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया था। बाद में एक तरह से संघ परिवार में वे पूरी तरह से दरकिनार हो गए। लेकिन अब मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा और संघ की सोच में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। मोदी सबका साथ सबका विकास की बात कर रहे हैं तो मोहन भागवत भी सबके मिलजुल कर रहने और कौमी एकता की बात कर रहे हैं।
सितंबर 2019 में भागवत ने दिल्ली में आरएसएस कार्यालय में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना सैयद अरशद मदनी से मुलाकात की थी। पिछले साल भी मोहन भागवत ने मुम्बई में मुस्लिम बुद्धिजीवियों से बातचीत की थी। इसी 30 जुलाई को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार अजीत डोभाल ने भी दिल्ली में मुस्लिम धर्म गुरुओं की एक बैठक में हिस्सा लिया था।
अजीत डोभाल भी मोहन भागवत से लगातार सम्पर्क में रहते हैं। मुस्लिम धर्म गुरुओं की जिस बैठक में अजीत डोभाल गए थे, उसमें पीएफआई पर परिबंध लगाने की मांग की गई थी। यह संयोग ही था कि जिस समय मोहन भागवत अपने पदाधिकारियों के साथ मस्जिद में थे, उस समय देश भर में पीएफआई के दफ्तरों पर छापेमारी हो रही थी और पीएफआई के नेताओं की धरपकड़ शुरू हो चुकी थी।
स्पष्ट है कि आरएसएस, भाजपा और मोदी सरकार उदारवादी मुसलमानों और कट्टरवादी मुसलमानों के साथ अलग अलग तरीके से व्यवहार कर रही है, ताकि उसके बारे में बनी मुस्लिम विरोधी धारणा को तोड़ा जा सके। हाल ही में ज्ञानवापी का मामला कोर्ट में शुरू होने पर मोहन भागवत का यह बयान हिन्दुओं को आश्चर्यचकित कर देने वाला था कि हिन्दुओं को हर मस्जिद में शिवलिंग नहीं ढूंढना चाहिए।
हाल ही के वर्षों में देश का हिन्दू जागृत और उग्र हुआ है। वह संघ से इस तरह के बयानों की कल्पना नहीं करता। इससे हिन्दुओं के एक वर्ग में संघ के प्रति गुस्सा भी पनपा लेकिन एक अन्य वर्ग में उनके इस बयान को हिन्दुओं और मुसलमानों में सौर्हाद्र बढाने वाला कदम भी माना गया। उसी कड़ी में संघ प्रमुख ने मस्जिद में जा कर इमामों के आल इंडिया संगठन के साथ बातचीत का दरवाजा खोला है।
मोहन भागवत और संघ के अन्य पदाधिकारी एक घंटे तक मस्जिद में रहे और मौलाना जमील अहमद इलियासी के दोनों बेटों इमाम उमर इलियासी और शोएब इलियासी से लंबी बातचीत की। संघ उमर इलियासी के माध्यम से पूरे मुस्लिम समाज के साथ बातचीत का रास्ता खोलने की कोशिश कर रहा है।
बंद कमरे में हुई इस बैठक के बाद शोएब इलियासी ने कहा कि मोहन भागवत का मस्जिद में आना मुल्क के लिए बड़ा संदेश हैं। यह मुसलमानों के लिए मोहब्बतों का पैगाम है। इसे इतना ही देखा जाना चाहिए। इसमें नहीं पड़ना चाहिए कि मोहन भागवत मस्जिद क्यों गए। मुल्क के लिए ये सुखद परिस्थिति है। इससे मोहब्बत का एक पैगाम जाता है। शोएब ने यह भी कहा कि मोहन भागवत ऐसे नहीं हैं, जैसी कि उनकी छवि पेश की जाती है। उन्होंने श्रीमदभागवत गीता पर लिखी उनकी किताब को देखा और सराहा।
स्वाभाविक है कि इससे कट्टरपंथी मुसलमानों और तथाकथित सेक्युलर दलों में खलबली मचेगी, जो मुसलमानों को आरएसएस का डर दिखा कर अब तक राजनीतिक रोटियाँ सेंकते रहे हैं। एक तरफ भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कांग्रेस ने संघ के स्वयंसेवकों की यूनिफार्म की निक्कर में आग लगाकर हिन्दू मुस्लिम के बीच दरार को चौड़ा करने का काम किया है, वहीं आरएसएस बिना किसी शोर शराबे के मुस्लिम समुदाय से मिलकर भारतीय एकता और अखंडता को मजबूत करने में लगा हुआ है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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