क्या हम नारी जागरण की अग्रदूत यशोदा देवी को जानते हैं?
इंटरनेट पर अगर आप यशोदा देवी के बारे में जानना चाहें तो प्रमुख रूप से जिनका परिचय सामने आता है वो राजस्थान की यशोदा देवी हैं, जिन्होंने स्वतंत्र भारत में पहली बार 1953 में चुनाव लड़ा और विधानसभा पहुंची।
लेकिन एक और यशोदा देवी हैं जिनके बारे में लोग बिल्कुल जानते नहीं। वो यशोदा देवी वर्तमान उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर से संबंध रखती हैं। आजादी से पहले इलाहाबाद की यशोदा देवी ने स्त्री चिकित्सा क्षेत्र में ऐसा उल्लेखनीय योगदान किया था, जिसे समय के साथ भुला दिया गया।

स्वतंत्रता के बाद हमारी पीढियां इस बहस में उलझा दी गयीं कि भारत का पितृसत्तात्मक समाज लड़कियों को लड़कों के बराबर अधिकार नहीं देता। बाप की परिवार में इतनी अधिक प्रधानता बताई जाती है कि वह बेटे बेटी में भेदभाव करता है। असल में बहस करने वालों ने बेटे बेटी का जो भेद खोज निकाला वह व्यवस्था थी या व्यवस्था में बाहरी हस्तक्षेप, इसे समझने की कोशिश नहीं की गयी। सीधे सीधे मर्दवादी व्यवस्था का आरोप पूरे भारतीय समाज पर थोप दिया गया। वरना यशोदा देवी के पिता जो कि स्वयं एक वैद्य थे, वे अपना वैद्यकीय उत्तराधिकार अपनी बेटी यशोदा देवी को क्यों सौंपते?
भारत में प्राचीन काल से ही नहीं बल्कि समकालीन समय में भी एक पिता ने जितना अवसर एक पुत्र को दिया उतना ही महत्व अपनी पुत्री को भी दिया है। राजा जनक से लेकर मद्र नरेश, महर्षि अत्रि तक तमाम ऐसे नाम हैं, जो पिता की उस धारणा को तोड़ते हैं, जो आधुनिक फेमिनिस्टों ने बना रखी है।
समकालीन भारत में यशोदा देवी का नाम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने अपने पिता की बौद्धिक संपदा को ही आगे बढ़ाया था। उन्होंने जो किया, वह सहज नहीं था। उस समय अंग्रेजी सरकार में हर ओर से यूरोपीयकरण का जोर था, फिर चाहे वह खानपान हो, जीवनशैली हो, वस्त्र हों या चिकित्सा जगत।
ऐसे समय में यशोदा देवी आयुर्वेदिक वैद्य बनीं। वह इलाहाबाद (प्रयागराज) की निवासी थीं एवं उन्होंने मात्र 16 वर्ष की आयु से चिकित्सकीय परामर्श आरम्भ कर दिया था। उन्होंने वर्ष 1908 में 'स्त्री औषधालय' की स्थापना की तथा एक 'महिला आयुर्वेदिक फार्मेसी' भी आरम्भ की। उनका अपना एक प्रकाशन था। वह इतनी लोकप्रिय थीं कि मात्र 'देवी, इलाहाबाद' के नाम से ही उनके यहाँ पत्र पहुँच जाया करते थे।
उन्होंने पचास के लगभग पुस्तकें लिखीं थीं, जिनमें से अभी कुछ ही प्राप्त हो पाती हैं। इन्टरनेट पर उनकी तीन पुस्तकें प्राप्त होती हैं, एवं तीनों ही पुस्तकें ऐसी हैं, जिनका बहिष्कार ही वाम जगत करेगा क्योंकि तीनों ही पुस्तकें वामपंथी एजेंडे को ध्वस्त करती हैं।
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इंटरनेट पर उपलब्ध उनकी तीन पुस्तकों के नाम हैं: आनंद मंदिर, गृहणी कर्तव्य शास्त्र अथवा पाक शास्त्र और संसार के स्त्री रत्न। इन तीन पुस्तकों में पहली पुस्तक में भारत की महान स्त्रियों का वर्णन है, दूसरी दांपत्य जीवन के सुख पर आधारित है और तीसरी पुस्तक आहार और स्वास्थ्य पर केन्द्रित है।
अपनी पुस्तक आनंद मंदिर में उन्होंने दांपत्य सुख को आयुर्वेद, आहार एवं धर्म से जोड़ा एवं स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को लेकर मुखरता से बात की। उन्होंने स्त्री के सौन्दर्य पर बात की है, एवं उससे बढ़कर स्वास्थ्य पर बात की है। वो इतनी प्रगतिशील और वैज्ञानिक सोच की धनी थीं कि उन्होंने यौन सुख को स्वास्थ्य से जोड़ा। यहां तक कि यौन संतुष्टि को उन्होंने शुभकर्मों के साथ जोड़ा।
अर्थात जिस देह की संतुष्टि को वामपंथ ने परिवार तोड़ने का माध्यम बनाया, यशोदा देवी ने उसका हल आहार, विचार में बताया था। उन्होंने तन मन के आरोग्य पर बल दिया। उन्होंने इस दांपत्य सुख को पवित्रता के साथ जोड़ा, यही कारण था कि प्रगतिशील स्त्री विमर्श में यशोदा देवी की पुस्तक 'आनंद मंदिर' का उल्लेख कहीं नहीं होता है।
उनकी दूसरी पुस्तक गृहणी कर्तव्य अथवा पाकशास्त्र जो इन्टरनेट पर उपलब्ध है, वह और भी विशेष है। उसमें गृहणी के कर्तव्य एवं पाकशास्त्र की बात है। जिस कार्य अर्थात घर पर भोजन पकाने को वामपंथी विमर्श स्त्री की गुलामी घोषित करता है, उसे यशोदा देवी पूरी तरह से विज्ञान बताते हुए बताती हैं कि कैसे भोजन पकाया जाए कि शरीर निरोग रहे।
इस पुस्तक के जो सूत्रधार संवाद कर रहे हैं, वह भी ननद एवं भाभी का संवाद है, जिसमें भाभी अपनी अविवाहित ननद को बता रही है कि कैसे भोजन पकाया जाता है एवं कौन सी दाल के साथ कौन सी सब्जी लेनी है। कब चावल खाने हैं, कब देह की आवश्यकता के अनुसार दही लेना है आदि आदि।
यशोदा देवी अपनी पुस्तक में लिखती हैं "भोजन बनाने में सबसे कठिन और आवश्यक बात यही है कि ऋतु और प्रकृति के अनुसार भोजन बनना चाहिए। लेकिन इस ओर किसी स्त्री पुरुष का ध्यान नहीं है यही कारण है कि घर घर मनुष्य रोगी रहते हैं। यदि पता लगाया जाए तो सौ में से दस मनुष्य ही निरोग मिलेंगे। शेष नब्बे भोजन की गड़बड़ी से प्रतिदिन किसी रोग में फंसे ही रहते हैं।"
उनकी तीसरी उपलब्ध पुस्तक में भारत की महान स्त्रियों का वर्णन है, उसका नाम है संसार के स्त्री रत्न। इस पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि यदि आप अपने घर की स्त्रियों, पुत्रियों एवं पुत्रवधुओं को आदर्श गृहिणी, सच्ची माता, सुशीला बहू और सर्वगुण संपन्न बनाने की इच्छा है, एवं आप उनके सच्चे हितैषी हैं, तो उन्हें यशोदा देवी की पुस्तकें पढ़वाएं।
वामपंथी फेमिनिज्म कभी नहीं चाहेगा कि किसी भी यशोदा देवी की कहानी जनता के सामने आए। वह कभी भी नहीं चाहेगा कि यशोदा देवी द्वारा संग्रहित की गयी हिन्दू स्त्रियों की कहानी लोग पढ़ें, क्योंकि इसके कारण उनके भीतर जो आत्मगौरव के भाव उत्पन्न होंगे, वह उस आत्महीनता को पूरी तरह से धो पोंछकर अलग कर देंगे, जो उनके दिल में वामपंथी फेमिनिज्म भरता है।
परन्तु यशोदा देवी की कहानी वामपंथियों के उस झूठ का भी उत्तर है, जो वह बार बार हिन्दू समाज के पुरुषों के विषय में बोलती रहती हैं कि पिताओं ने पुत्रियों को जैसा मन किया, वैसा ही किसी को दे दिया, जबकि यशोदा देवी का जीवन बताता है कि वास्तविकता इससे अलग थी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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