Jackfruit किसानों के लिए जैकपॉट से कम नहीं, लाखों रुपये की आमदनी
सब्जी और फल के रूप में कटहल (jackfruit) पोषक तत्वों से भरपूर है। जैकफ्रूट को दुनिया का सबसे बड़ा फल कहा जाता है। पढ़िए कटहल की बागवानी से कैसे कमाएं लाभ
नई दिल्ली, 18 जून : कटहल (jackfruit)की व्यावसायिक खेती अन्नदाताओं को मालामाल कर सकती है। एक बार रोपाई के बाद कटहल का पेड़ कई वर्षों तक फल देता है। कटहल की सब्जी बनाने के अलावा लोग इसका इस्तेमाल अचार बनाने में भी करते हैं। कटहल का फल बड़ा होने के बाद इसका भीतरी भाग पक जाता है। स्थानीय भाषा में इसे कोआ कहते हैं। फल पकने के बाद इसे बिना आग पर पकाए भी खाया जता है। विश्व के सबसे बड़े फल जैकफ्रूट की खेती से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में पढ़िए वनइंडिया हिंदी की इस रिपोर्ट में

पोषक तत्वों का जैकपॉट है जैकफ्रूट
कटहल के छिलके पर कांटे जैसा उभार होता है। कटहल यानी जैकफ्रूट पोषक तत्वों से भरपूर होता है। आयरन, कैल्शियम, विटामिन ए, विटामिन सी और पोटैशियम प्रचूर मात्रा में पाए जाते हैं। कटहल के पेड़ से साल में दो बार फलों की तुड़ाई की जा सकती हैं। साल में दो बार फसल होने के कारण कटहल की खेती किसानों को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाती है। सब्जी, अचार और मीठे कोए के कारण कटहल की मार्केट में अच्छी डिमांड होती है। ऐसे में किसानों को अच्छा मुनाफा होता है।

विदेश भी भेजे जाते हैं भारतीय कटहल
कटहल की खेती / बागवानी उत्तर प्रदेश , बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत के कई राज्यों में बड़े पैमाने पर होती है। खेती-किसानी, फसल और फलों के इतिहास के जानकारों की मानें तो दक्षिण भारत में विशेषकर महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल राज्य में कटहल या जैकफ्रूट की खेती तीन से छह हजार साल पहले से हो रही है। गौरतलब है कि भारत में पैदा होने वाले कुछ विशेष कटहल की किस्मों का अब निर्यात भी होने लगा है। APEDA के सौजन्य से कटहल का निर्यात हो रहा है। ऐसे में जैकफ्रूट फार्मिंग करने वाले किसानों को लाखों रुपये की आमदनी होती है। हर साल इन किसानों को मोटा मुनाफा भी होता है।

कटहल के पेड़ के नीचे पौधों की रोपाई
जैकफ्रूट से जुड़े फैक्ट में ये दिलचस्प है कि कटहल बांग्लादेश और श्रीलंका का राष्ट्रीय फल है। भारत में केरल और तमिलनाडु की सरकारों ने कटहल को राजकीय फल का दर्जा दिया है। कटहल का पौधा सदाबहार माना जाता है। 8 से 15 मीटर तक की ऊंचाई तक जाने वाला जैकफ्रूट ट्री काफी घना भी होता है।कटहल का वानस्पतिक नाम औनतिआरिस टोक्सिकारीआ है। कटहल का फल पूरा परिपक्व होने पर लगभग 20 किलो तक का होता है। खेती के जानकारों की मानें तो कटहल के पेड़ की छाया में कॉफी, इलायची, काली मिर्च, हल्दी और अदरक जैसे छोटे पौधों की रोपाई भी की जा सकती है।

कैसे मौसम में कटहल की खेती
जैकफ्रूट प्लांट की रोपाई किसी भी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है। हालांकि, कटहल की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी आदर्श मानी जाती है। जिस मिट्टी में कटहल के पौधे लगाए जाते हैं, वहां पानी का जमाव नहीं होना चाहिए। कटहल के पौधे अधिक गर्मी और बारिश के मौसम में आसानी से बड़े होते हैं। हालांकि, ठंड के मौसम में पाला कटहल के लिए हानिकारक है। कटहल की व्यापारिक खेती में मिट्टी के प्रकार और जलवायु का ध्यान रखना जरूरी है।

कटहल के पौधे की रोपाई
कटहल की बागवानी करने के लिए बीजों से भी रोपाई की जा सकती है। बीज की रोपाई के बाद पौधे बड़े होने में 5 से 6 साल का समय लगता है। पके हुए कटहल से बीज निकालने के बाद इनकी रोपाई की जाती है। बीजों को निकालने के बाद रोपाई के लिए लंबा इंतजार नहीं करना चाहिए। तुरंत मिट्टी में रोपाई करने के बाद पौधे अच्छे से विकसित होते हैं। गमले या पॉलीथिन बैग में बीजों की रोपाई कर पौधे उगाए जा सकते हैं। 80 प्रतिशत सामान्य मिट्टी और 20 प्रतिशत पुरानी गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट को मिलाने के बाद इसकी कटहल के बीज की रोपाई की जा सकती है। बीज की रोपाई लगभग दो इंच की गहराई में करें। रोपाई के बाद मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए सिंचाई जरूरी है। बीज में अंकुरण एक सफ्ताह में शुरू हो जाता है। तीन-चार पत्तियां आने पर पौधों की रोपाई खेत में की जा सकती है।

रोपाई का सही समय और तरीका
जून से सितंबर के दौरान कटहल की रोपाई का आदर्श समय माना जाता है। पौधे की रोपाई करने से पहले खेत तैयार करें। खेत में गहरी जुताई के बाद पाटा चलाकर मिट्टी बराबर कर लें। दो पौधों के बीच 10 से 12 मीटर की दूरी रखें। एक मीटर गहराई के गड्ढे कर 20 से 25 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट डालें। मिट्टी में 250 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 500 म्यूरियेट ऑफ पोटाश, 1 किलोग्राम नीम की खल्ली और 10 ग्राम थाइमेट अच्छी तरह मिलाकर भरने पर पौधा अच्छी गुणवत्ता का होता है।

कटहल के पौधे की देखभाल
जैकफ्रूट में अधिक सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। पौधों की रोपाई के तुरंत बाद पहली सिंचाई होती है। इसके बाद गर्मी में 15 से 20 दिन के अंतराल पर मिट्टी की नमी जांचने के बाद जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें। पौधे के आसपास की मिट्टी अधिक सूखी होने पर सिंचाई करें। बारिश के मौसम में कटहल के पौधे में अधिक सिंचाई न करें। पौधों में फूल लगना शुरू होने पर सिंचाई नहीं करनी चाहिए।

जैकफ्रूट की पैदावार
रोपाई के तीन से चार साल बाद कटहल के पेड़ में फल लगना शुरू हो जाता है। बीज रोपने पर पौधे में कम से कम 7 से 8 साल बाद फल लगने शुरू होते हैं। अच्छी गुणवत्ता वाले कटहल के पेड़ 12 साल तक भरपूर फल देते हैं। पेड़ पुराने होने पर जैकफ्रूट की मात्रा कम होने लगती है। एक हेक्टेयर खेत में लगभग 150 पौधों की रोपाई की जा सकती है। एक साल में एक जैकफ्रूट ट्री पर तकरीबन 500 से 1000 किलोग्राम कटहल पैदा होते हैं। कटहल के औसत बाजार मूल्य के आधार पर एक साल में करीब तीन से चार लाख रुपये कमाए जा सकते हैं।

ग्राफ्टिंग से कटहल की नई पौध
ग्राफ्टिंग विधि से कटहल की पौध तैयार करने के लिए इसके बीजों से उपजे जैकफ्रूट प्लांट लेने के बाद बड़े कटहल के पेड़ की टहनी (तीन से चार इंच लंबी) काटनी होगी। टहनी की मोटाई पेंसिल जैसी हो। कटहल के पौधे के तने को बीच में से काटें। तने में लगभग तीन इंच का चीरा लगाने के बाद काटी गई टहनी को नुकीला बनाएं। काटी गई टहनी तने के अंदर फंसा दें। ऊपर कसकर टेप या प्लास्टिक बांधें। कुछ दिनों में काटी गई टहनी में जड़ें निकल आएंगी। जड़ निकलने के बाद छोटी टहनी को काटकर अलग गड्ढे में रोपाई की जाती है।

जैकफ्रूट से कई और फायदे
कटहल का पेड़ बारहमासी यानी पूरे साल हराभरा रहता है। जैकफ्रूट ट्री की शाखाएं घनी होती हैं। ऐसे में इसकी छाया में इलायची, काली मिर्च और कॉफी जैसी चीजों की रोपाई व खेती की जा सकती है। कटहल के घने पत्तों के कारण जमीन पर सीधी धूप नहीं पड़ती जो इन पौधों के लिए फायदेमंद होता है। कटहल के पेड़ के सूखने पर लकड़ियों का इस्तेमाल घरेलू फर्नीचर बनाने में होता है। इसकी लकड़ी काफी मजबूत होती है।
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