MSP Guarantee: सरकार क्यों हिचक रही है एमएसपी कानून लागू करने से?
MSP Guarantee:अपनी अनेक मांगों को लेकर विभिन्न प्रातों में खासकर दिल्ली आने वाले मार्गों पर पंजाब के किसानों द्वारा विरोध प्रदर्शन जारी है। किसानों व केंद्र सरकार के बीच तीन वार्ताएं हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोई हल नहीं निकला है।
किसान अपनी मांगों पर अडिग है, वहीं केंद्र सरकार किसानों को समझाने का भरपूर प्रयास कर रही है। किसानों की प्रमुख मांगों में सभी फसलों को 'एमएसपी की गारंटी' यानी किसानों की सभी फसलें एमएसपी पर खरीदी जाए।

इसके अतिरिक्त एमएसपी से कम फसल खरीद को अपराध घोषित किया जाए। एक नजर एमएसपी के विभिन्न पहलूओं पर।
क्या है एमएसपी?
न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी, केंद्र सरकार द्वारा तय फसल की वह खरीद दर है जिस पर सरकार किसानों से फसल की खरीद करती है। कृषि और सहकारिता विभाग तथा भारत सरकार की सिफारिशों पर कृषि लागत और मूल्य आयोग द्वारा 'एमएसपी' घोषित किया जाता है। भारत में 1966-67 में पहली बार गेहूं पर एमएसपी तय किया गया था।
इसको आसान शब्दों में इस प्रकार समझ सकते हैं कि जैसे सरकार ने किसी फसल का एमएसपी 20 रूपये प्रति किलो निर्धारित किया हुआ है और बाजार में उसकी कीमत 15-16 रूपये चल रही है तो भी सरकार उस फसल को 20 रूपये प्रति किलो से ही खरीदेगी। यहां किसानों का कहना है कि बाजार में भी वह फसल 20 रूपये प्रति किलो से कम नहीं बिकनी चाहिए, अगर कोई व्यापारी एमएसपी से कम कीमत पर खरीदता है तो उसे अपराध घोषित किया जाए। उसे जेल भेज दिया जाए।
किन फसलों पर है एमएसपी
केंद्र सरकार सभी फसलों पर एमएसपी नहीं देती, अभी तक देश भर में 23 फसलों पर एमएसपी लागू है। जिनमें- 7 अनाज (धान, गेहूं, बाजरा, मक्का, ज्वार, रागी, जौ), 5 दालें (चना, अरहर, मूंग, उड़द, मसूर), 7 तिलहन (सोयाबीन, सरसों, सूरजमुखी, तिल, कुसुम, मूंगफली व नाइजर बीज) तथा 4 कमर्शियल फसलें (कपास, जूट, नारियल व गन्ना) पर केंद्र सरकार द्वारा एमएसपी लागू है।
एमएसपी पर सरकार का खर्च
अगर एमएसपी पर सरकारी खर्च की बात करें तो वित्तीय वर्ष 2014-15 में एमएसपी पर सरकार का खर्च 1.06 लाख करोड़ रूपये था, जो वित्तीय वर्ष 2022-23 में बढ़कर 2.28 लाख करोड़ हो गया है। वहीं अगर सरकार किसानों की इस मांग को पूरा करती है तो अनुमान है कि सरकार का एमएसपी पर खर्च बढ़कर 10 लाख करोड़ रूपये पहुंच जायेगा।
एमएसपी कानून बनने में अडचनें
कृषि विशेषज्ञों व अर्थशास्त्रियों के अनुसार जहां एमएसपी कानून बनने से किसानों को बड़ा फायदा हो सकता है, वहीं इसे कानूनी रूप देना बड़ा चुनौतीपूर्ण है। अभी लगभग 6 से 20 प्रतिशत किसानों को ही एमएसपी का फायदा मिलता है, जबकि एमएसपी के कानून बन जाने से इसका फायदा सभी किसानों को मिलने की उम्मीद है। जिसके चलते किसानों की यह मांग अपेक्षित मालूम होती है, वहीं अगर सरकारी पहलू देखें तो सरकार के संसाधनों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव, भारत के फूड सब्सिडी बिल और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संबंधों पर पड़ने वाले प्रभावों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अगर एमएसपी को कानूनी रूप दिया जाता है तो सरकार का सब्सिड़ी पर खर्च तो बढ़ेगा ही, इसके साथ-साथ फसलों के उचित भण्डारण न होने के कारण उसकी बर्बादी का सामना भी करना पड़ सकता है। वित्तीय वर्ष 2015-16 में सरकार द्वारा एमएसपी पर 623 लाख टन चावल और गेहूं खरीदा, जिसमें से 3116 टन अनाज बर्बाद हो गया। वहीं 2019-20 में सरकार द्वारा 75.17 मिलियन टन अनाज खरीदा गया, जिसमें से 1930 टन बर्बाद हो गया।
एक मोटे अनुमान के अनुसार उचित भण्डारण न होने के कारण प्रतिवर्ष करीब 700 करोड़ रूपये का नुकसान हो जाता है। जिसमें कीटों से नुकसान 2-4 प्रतिशत, चूहों से 2.5 प्रतिशत, पक्षियों द्वारा करीब 1 प्रतिशत व नमी के चलते लगभग 0.7 प्रतिशत नुकसान हो जाता है।
इसके अलावा एमएसपी कृषि उपजों की औसत गुणवत्ता पर तय होता है। खराब गुणवत्ता वाली उपज का क्या होगा, उसको किस दर पर खरीदा जाएगा, यह भी एक विचारणीय विषय है। वहीं जानकारों का मानना है कि गुणवता को लेकर प्राइवेट कंपनियों व किसानों में भी मतभेद हो सकते हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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