Punjab Agriculture: पंजाब को बचाना है तो धान पर एमएसपी का लालच छोड़ना ही पड़ेगा
Punjab Agriculture: किसान आंदोलन-2 के शुरुआती चरण में ही पंजाब के किसान आंदोलनकारियों के सामने एक स्वर्णिम अवसर आया लेकिन विरोध प्रदर्शन के राजनीतिक उत्साह में उन्होंने उसे ठुकरा दिया है।
केन्द्र सरकार और किसान आंदोलनकारियों के बीच बातचीत में केन्द्र सरकार ने उन्हें धान के स्थान पर अन्य असाढी फसलों पर एमएसपी देने का प्रस्ताव किया लेकिन आंदोलन के जुनून में किसान आंदोलनकारियों ने उसे ठुकरा दिया। यह एक ऐसा स्वर्णिम अवसर था जिसको ठुकराने का सीधा नुकसान पंजाब और पंजाब की खेती किसानी को होगा।

पंजाब में चावल की खेती का कोई औचित्य नहीं है। न तो पंजाब के लोग चावल खाते हैं और न ही वहां कभी चावल की खेती का इतिहास रहा है। पंजाब में परंपरागत रूप से ज्वार, बाजरा, मक्का और दलहन तथा बाद में गेहूं की पैदावार ही होती थी। पंजाब में धान की खेती शुरु हुई हरित क्रांति के बाद जब वहां के किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलना शुरु हुआ।
लेकिन पंजाब में धान की यह खेती पंजाब की धरती को ही बहुत भारी पड़ी है। धान ने पंजाब के किसान की खेती का पैटर्न किस तरह से बदला है उसे एक आंकड़े से समझ सकते हैं कि 1970 में 6.9 प्रतिशत जमीन पर धान की खेती होती थी लेकिन 2005 में यह आंकड़ा 33.8 फीसदी पहुंच गया। इसका परिणाम यह हुआ कि पंजाब की परंपरागत फसलों के लिए खेती का रकबा घट गया।
पंजाब में धान की खेती का बढता चलन ऐसा वक्त था जिसने लागत को लगातार बढा दिया। लेकिन क्योंकि धान और गेंहू की खेती किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देती है इसलिए उनकी लागत की भरपाई हो जाती है। इसलिए कल तक जब उनसे यह कहा जाता था कि आप पंजाब की परंपरागत खेती को अपनाइये तो किसान लागत का रोना रोते थे। उन्हें पता था कि अगर गेहूं और धान के अतिरिक्त उन्होंने कुछ और पैदा किया तो उसे सरकार खरीदेगी नहीं। इसलिए किसानों को ऐसी फसलों की तरफ मोड़ने का तर्क जिन पर कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं है पंजाब के किसानों को समझ नहीं आता था।
लेकिन अब जबकि केन्द्र सरकार की ओर से खुद यह प्रस्ताव दिया जा रहा है कि पंजाब के किसान अपनी परंपरागत खेती की ओर लौटें। सरकार एमएसपी पर उन फसलों को खरीदने के लिए तैयार है जो अभी एमएसपी के बाहर थीं तब भी किसान आंदोलनकारियों ने उसे ठुकराकर पंजाब के लिए एक स्वर्णिम अवसर गवा दिया है।
पंजाब में धान की खेती ने न केवल भूजल का गंभीर संकट पैदा किया है बल्कि कीटनाशकों के बेतहाशा इस्तेमाल और धान की पराली जलाने की समस्या ने गंभीर पर्यावरणीय संकट भी पैदा किया है। पंजाब में कैंसर एक महामारी के रूप में फैला तो इसका सबसे बड़ा कारण एमएसपी के लालच में फसलों पर बेतहाशा कीटनाशकों और केमिकल फर्टिलाइजर का इस्तेमाल ही था। पंजाब में एक आम चलन है कि पंजाब के किसान जो पैदा करते हैं उसे नहीं खाते। वो अपने खाने का गेहूं चावल मध्य प्रदेश और बंगाल से मंगाते हैं। जबकि जो गेहूं और चावल वो पैदा करते हैं उसे एमएसपी पर सरकार को बेच देते हैं।
ऐसा करने के पीछे कोई त्याग तपस्या या परोपकार की भावना नहीं है। ऐसा करना उनकी मजबूरी है क्योंकि वो जानते हैं कि गेहूं धान की पैदावार में अत्यधिक उत्पादन की लालच में उन्होंने जितना केमिकल फर्टिलाइजर और कीटनाशक इस्तेमाल किया है उसके बाद वह अनाज खाने लायक ही नहीं बचा है। 2021-22 की रिपोर्ट है कि अकेले पंजाब में 39 लाख मिट्रिक टन फर्टिलाइजर का प्रयोग किया गया। देश में सर्वाधिक 103 लाख मिट्रिक टन केमिकल फर्टिलाइजर का इस्तेमाल यूपी में हुआ लेकिन कृषि जोत के मामले में यूपी पंजाब से साढे चार गुना बड़ा है।
भारत में कुल 183 मिलियन हेक्टेयर खेती योग्य जमीन है जिसमें सर्वाधिक खेती योग्य जमीन राजस्थान में है 20.87 मिलियन हेक्टेयर। इसके बाद महाराष्ट्र 20.5, उत्तर प्रदेश 17.5, मध्य प्रदेश 15.67 और कर्नाटक 11.81 मिलियन हेक्टेयर जमीन के साथ दूसरे, तीसरे, चौथे और पांचवे नंबर पर हैं। 4.2 मिलियन हेक्टेयर खेतीयोग्य जमीन के साथ पंजाब इस लिस्ट में बहुत नीचे है लेकिन उसकी केमिकल फर्टिलाइजर और कीटनाशकों की खपत खेती के अनुपात में सर्वाधिक है।
जहां तक कृषि उपज का सवाल है तो उसमें पंजाब अपनी अत्यधिक केमिकल फर्टिलाइजर युक्त खेती के कारण ही कम जोत के बावजूद तीसरे नबंर है। पंजाब के मुकाबले बहुत कम केमिकल फर्टिलाइजर इस्तेमाल करनेवाला पश्चिम बंगाल सबसे बड़ा कृषि उत्पादन वाला प्रदेश है। उसके बाद उत्तर प्रदेश है और फिर पंजाब का नंबर आता है। औद्योगिक राज्य में पहचान बनानेवाला गुजरात कृषि उत्पादन में चौथे नंबर पर है। पांचवे नंबर पर हरियाणा है। इस तरह यह मिथक भी अनावश्यक है कि पंजाब पूरे देश को गेहूं चावल खिलाता है। असल में इस मिथक के पीछे भी उसी एमएसपी लॉबी की अफवाह है जो यह भ्रम बनाकर रखना चाहते हैं ताकि पंजाब में धान और गेहूं पर मिलनेवाली एमएसपी मिलती रहे।
लेकिन एमएसपी के इस लालच ने पंजाब को ही सबसे अधिक तबाह किया है। पंजाब में भूजल स्तर इतना अधिक गिर चुका था कि 2008 में कानून बनाकर अप्रैल मई में होनेवाली धान की खेती पर रोक लगानी पड़ी। एमएसपी के लालच में पंजाब के किसानों ने अप्रैल मई के महीने में धान की रोपाई शुरु कर दी थी। इस कारण वो एक सीजन में धान की दो फसल लेने लगे थे। लेकिन इसका दुष्परिणाम ये हुआ कि पंजाब का भूजल संग्रह 2009 में ही 20.35 अरब घनमीटर पहुंच गया था। पंजाब किसान आयोग के अनुसार यह भूजल स्तर कम से कम 34.66 लाख घनमीटर होना चाहिए।
लेकिन पंजाब में एमएसपी के लालच में धान की खेती के कारण न केवल भूजल गिरा है बल्कि जलवायु परिवर्तन की मार का असर भी पंजाब पर होने लगा है। अत्यधिक भूजल दोहन के कारण पंजाब में सूखे का संकट बढ सकता है। पंजाब के औसत तापमान में 2030 तक भी 0.5 से 1 डिग्री सेल्यियस की बढत दर्ज होने का अनुमान है। ऐसा होने पर स्वाभाविक रूप से पंजाब की खेती पर विपरीत असर पड़ेगा और वहां गेहूं चावल की पैदावार में 8 से 10 प्रतिशत की कमी आ जाएगी।
ऐसे में आज नहीं तो कल, इच्छा से या अनिच्छा से पंजाब के किसानों को धान की खेती छोड़नी ही पड़ेगी। यह न केवल पंजाब की खेती किसानी के लिए जरूरी होगा बल्कि प्रकृति और पर्यावरण को बचाने के लिए जरूरी होगा। पंजाब में धान की खेती खत्म होने से न केवल पंजाब में खेती की लागत में भारी गिरावट आयेगी बल्कि ज्वार बाजरा और दलहन की पैदावार पर एमएसपी मिलने से उनकी आमदनी भी बनी रहेगी। जिस सीजन में वो धान रोपते हैं उस सीजन में उन्होंने ज्वार बाजरा बोना शुरु किया तो न केवल पंजाब की धरती सुरक्षित होगी बल्कि दिल्ली जैसे शहरों में पराली के कारण होनेवाली प्रदूषण की समस्या भी दूर होगी।
इन परिस्थितियों में ज्वार बाजरा और दलहन पर एमएसपी की गारंटी पंजाब के किसानों के लिए एक स्वर्णिम अवसर था जिसे उनके किसान नेताओं ने फिलहाल गंवा दिया है। लेकिन देर सबेर यही विकल्प पंजाब को और वहां के किसानों को बचायेगा, इसमें भी कोई दो राय नहीं। अच्छा होता राजनीति छोड़कर किसान नेता इस स्वर्णिम अवसर को लपक लेते और जीत का जश्न मनाते हुए वापस लौट जाते।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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