राजपथ का नाम कर्तव्यपथ क्यों?
राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट को सीधे जोड़ने वाले मार्ग का नाम राजपथ से कर्तव्यपथ कर दिया गया है। 1911 में ब्रिटिश साम्राज्य के महाराजा जॉर्ज पंचम के सम्मान में इसी सड़क का नाम 'किंग्स-वे' (King's Way) रखा गया था। साथ ही उनकी पत्नी यानि महारानी विक्टोरिया के नाम पर दिल्ली की एक अन्य प्रमुख सड़क का नाम 'क्वींस-वे' (Queen's Way) रखा गया।

1947 में भारत जब स्वाधीन हुआ तो इन मार्गों के नामों को भारतीय पहचान नहीं दी गयी और शुरूआती कई वर्षों तक इन्हें इनके ब्रिटिश नामों से ही जाना जाता था। हालाँकि, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर इन मार्गों सहित दिल्ली के सभी ब्रिटिश नाम अथवा पहचान वाले मार्गों एवं स्थलों को भारतीय पहचान देने का दवाब बनाया गया था लेकिन निजी तौर वे हमेशा इस मामले को अनसुना कर दिया करते थे। प्रधानमंत्री नेहरू को इस प्रकार के सुझाव देने वालों में एक नाम उस दौर के प्रमुख भाषाविद एवं संविधान सभा के सदस्य रह चुके डॉ रघुवीर का था।
डॉ रघुवीर वैचारिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रभावित थे। प्रधानमंत्री नेहरू की कश्मीर एवं चीन संबंधी नीतियों के आलोचक डॉ रघुवीर 1963 में भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने। इन वैचारिक मतभेदों के कारण प्रधानमंत्री नेहरू ने दिल्ली को गुलामी की पहचान से मुक्त कराने के डॉ रघुवीर के प्रयासों का समर्थन नहीं किया। जबकि यह मामला न तो किसी वैचारिक लड़ाई से और न ही किसी प्रकार की राजनीति से सम्बंधित था। वास्तव में तो राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए समग्रता एवं खुला मन रखने की आवश्यकता थी।
चूँकि, प्रधानमंत्री नेहरू इस सन्दर्भ में एकदम निष्क्रिय थे इसलिए अब किसी को तो पहल करनी थी। अतः 1955 में दिल्ली के चीफ कमिश्नर ने दिल्ली के ब्रिटिश नामों वाले मार्गों एवं स्थानों के नाम बदलने की एक विस्तृत योजना तैयार की। उन्होंने एक नोट तैयार किया और उसे प्रधानमंत्री नेहरू के पास भेज दिया।
प्रधानमंत्री नेहरू ने उस नोट को ध्यानपूर्वक पढ़ा और 24 जुलाई 1955 को केंद्रीय गृह सचिव को एक पत्र लिखा। यह पत्र दिल्ली के नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी में उपलब्ध 'जवाहरलाल नेहरू कलेक्शन' में उपलब्ध है, जिसकी फाइल संख्या 2(755)/55-PMS है। इस पत्र में प्रधानमंत्री लिखते है, "मुझे यह कहना होगा कि मुख्य कमिश्नर ने जो नाम दिए है उनका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह काम डॉ. रघुवीर का किया हुआ है।" यानि नेहरू को ऐसा लगा कि दिल्ली के कमिश्नर ने यह काम डॉ रघुवीर के कहने पर किया होगा, इसलिए उन्होंने उस नोट के सुझावों को सिरे से ख़ारिज कर दिया।
दिल्ली के उन चीफ कमिश्नर और डॉ रघुवीर के बीच बातचीत का कोई पत्राचार तो उपलब्ध नहीं है। साथ ही वह नोट भी नहीं मिला जो उन्होंने प्रधानमंत्री नेहरू को भेजा था। मगर प्रधानमंत्री नेहरू के केंद्रीय गृह सचिव को लिखे पत्र को पढ़कर एक बात तो समझ आती है कि उन्हें इस बात का आभास हो गया था कि अगर उन्होंने इस मामलें में हस्तक्षेप नहीं किया तो दिल्ली की सभी सडकों के नाम कहीं उनकी मर्जी के बिना न बदल जाए। जैसे नेहरू ने अपने पत्र में लिखा है कि "कनॉट सर्कस का नाम बदलकर 'अशोक स्थान' रखना एकदम बेतुका है। मैं अशोक को किसी बाजार से नहीं जोड़ना चाहता।"
यह कोई तर्क नहीं था क्योंकि भारत में सम्राट अशोक बहुत ही प्रचलित नाम है और कई स्थलों एवं मार्गों के नाम उनके सम्मान में रखे गए थे। अगर प्रधानमंत्री को यह नाम नहीं पसंद था तो किसी अन्य भारतीय नाम का सुझाव दे सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसलिए आज भी कनॉट सर्कस अथवा कनॉट प्लेस को ब्रिटिश पहचान मिली हुई है।
केंद्रीय गृह सचिव को लिखे उस पत्र में प्रधानमंत्री नेहरू ने दिल्ली के मात्र पांच मार्गों एवं स्थानों के नाम बदलने की अनुमति दी। इसमें ग्रेट प्लेस को विजय चौक, किंग्स-वे को राजपथ, क्वींस-वे को जनपथ, प्रिंसेस सर्किल को 15 अगस्त का मैदान और अल्बुकर्क रोड को तीस जनवरी मार्ग शामिल थे। बाकी अन्य नामों को उन्होंने यह कहकर नहीं बदलने दिया, "I do not think it is necessary to change the names of other roads or places." अर्थात "मुझे नहीं लगता कि अन्य सड़कों एवं स्थानों के नाम बदलने की जरुरत है।"
तीन दिन बाद, 27 जुलाई 1955 आननफानन में उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल की एक बैठक बुलाई और अपने द्वारा प्रस्तावित नामों को वहां से स्वीकृत करा लिया। इसके बाद, 15 अगस्त 1955 को उन्होंने माउंटबेटन को एक पत्र लिखकर भारत में हो रहे घटनाक्रमों की पूरी जानकारी दी। इसमें प्रधानमंत्री नेहरू को भारत रत्न से सम्मानित करने से लेकर भारत का स्वाधीनता दिवस कैसे मनाया गया जैसी सभी जानकारियां शामिल थी।
उन्होंने यह भी लिखा कि हम सौभाग्यशाली है कि 1947 से लेकर अभी तक 15 अगस्त के दिन वर्षा नहीं हुई जबकि यह वर्षा का समय रहता है। इसी पत्र में नेहरू यह भी लिखते है, "आपको यह जानने में रुचि होगी कि किंग्स-वे के अंत में बड़ा खुला क्षेत्र जिसे प्रिंसेस सर्कल के रूप में जाना जाता था और जहां 15 अगस्त 1947 को विशाल सभा हुई थी, उसका हमने नाम बदल दिया है। प्रिंसेस सर्कल को अब पंद्रह अगस्त का मैदान कहा जायेगा।"
वैसे तो एक स्वतंत्र एवं संप्रभु देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को एक अंग्रेज अधिकारी माउंटबेटन को यह सब बताने की कोई जरुरत नहीं थी। फिर भी उन्होंने अगर जानकारी दी तो किंग्स-वे के स्थानपर राजपथ क्यों नहीं लिखा? जबकि उन्होंने किंग्स-वे का नाम राजपथ करने का प्रस्ताव स्वयं पारित करवाया था।
दरअसल, राजपथ एक प्रकार से किंग्स-वे का हिंदी अनुवाद ही था। इस बात की स्पष्टता 13 जुलाई 1956 को 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' में 'Changing New Delhi' नाम से प्रकाशित एक खबर से भी होती है। इसमें राजपथ को 'road for the royalty' के नाम से संबोधित किया गया था। जबकि लोकतंत्र में न तो किंग का और न ही रॉयल्टी का कोई औचित्य था। बस प्रधानमंत्री नेहरू ने शब्दों के खेल से साम्राज्यवादी मानसिकता के इस निशान को मिटने नहीं दिया।
यहाँ एक बात और गौर करने वाली है। 3 दिसंबर 1965 को लोकसभा में एक सविधान (संशोधन) अधिनियम पर चर्चा के दौरान सदन के सदस्य मधु लिमये ने सभी का ध्यान राजपथ की ओर आकर्षित करवाते हुए कहा, "राष्ट्रपति भवन के सामने एक बड़ा चौड़ा राज पथ है। उसी राज पथ के एक कोने पर आज भी जॉर्ज पंचम की मूर्ति कायम है। यह कितनी शर्मनाक चीज है। अगर वहाँ पर सुभाष बाबू के नाम से प्रतिष्ठापना की जाती तो मैं कहता कि वाकई यह हमारे प्रजासत्तात्मक राज्य की राजधानी है, गुलामाबाद नहीं है। लेकिन जब तक जॉर्ज पंचम की मूर्ति रहेगी और नेताजी सुभाष जैसे नेताओं की इज्जत नहीं की जाएगी तब तक मुझे कहना पड़ेगा कि आज भी हम गुलामाबाद में रहते है और लोकसभा भी गुलामाबाद में बैठती है।"
हंगामा मचने के बाद जॉर्ज पंचम की मूर्ति को तो वहाँ से हटा दिया गया लेकिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति वहाँ स्थापित नहीं की गई। एक के बाद एक कई दशक बीतते चले गए लेकिन किसी सरकार ने उस स्थान की सुध नहीं ली।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उस स्थान पर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की प्रतिमा का अनावरण करना नेताजी सुभाष के प्रति वह उचित सम्मान है जिसकी कई सालों से राह देखी जा रही थी। यही नहीं, राजपथ का नाम कर्तव्यपथ करना भी इस बात का परिचायक है कि भारत अब सदियों पुरानी गुलामी अथवा साम्राज्यवादी मानसिकता की जकड़ से बाहर आ रहा है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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