इंडिया गेट से: भारत जोड़ो यात्रा से राहुल गांधी का राजनीतिक भविष्य बचेगा?
राहुल गांधी का नाम भी अब उन नेताओं की सूची में शामिल हो जाएगा, जिन्होंने लंबी पदयात्राएं की हैं। वैसे राहुल गांधी की कन्याकुमारी से कश्मीर तक की यात्रा का नाम भारत जोड़ो यात्रा क्यों रखा गया, यह समझ नहीं आया। यात्रा इतनी जल्दबाजी में क्यों शुरू की गई है, यह भी समझ नहीं आया। यह यात्रा 2 अक्टूबर को शुरू होनी थी, फिर ऐसा क्या हुआ कि राहुल गांधी की नानी को स्वर्ग सिधारे अभी एक पखवाड़ा भी नहीं हुआ और उन्हें पदयात्रा पर भेज दिया गया।

लगता है प्रधानमंत्री पद के लिए जब विपक्ष के दर्जन भर क्षेत्रीय नेताओं के नाम उभर आए तो यात्रा सात सितंबर को ही शुरू कर दी गई। ताकि राहुल गांधी को राष्ट्रव्यापी लोकप्रिय बता कर उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ने का दावा ठोका जा सके। सब समझते हैं कि यह 2024 के लोकसभा चुनाव की यात्रा है, इसका भारत जोड़ो से कुछ लेना देना नहीं है। न ही आज़ादी के बाद भारत का कहीं कोई विभाजन हुआ है, और न ही कोई प्रदेश या इलाका खुद को भारत से अलग होने की मांग कर रहा है।
लोगों का कहना है कि कांग्रेस को भारत जोड़ो यात्रा करनी थी, तो तब करती जब भारत का बंटवारा हो रहा था। या तब करनी थी जब कश्मीर का अलग संविधान, अलग निशान, अलग झंडा और अलग प्रधानमंत्री का पद कबूल किया जा रहा था। जब जवाहर लाल नेहरू ने डा. अम्बेडकर के विरोध के बावजूद कश्मीर को विशेष दर्जा देने के लिए संविधान में अनुच्छेद 370 डाल दिया था। अब जब 370 हट चुकी है, कश्मीर भारत में स्थाई तौर पर जुड़ चुका है, तो कैसी भारत जोड़ो यात्रा। अब तो कांग्रेस 370 हटाए जाने को ही कबूल कर ले, तो इतना ही काफी होगा।
कांग्रेस के जिस बड़े नेता दिग्विजय सिंह की सिफारिश पर यात्रा 2 अक्टूबर की बजाए सात सितंबर को शुरू हुई है, उन्हीं ने कुछ दिन पहले कहा था कि कांग्रेस जब केंद्र में सत्ता में आएगी तो कश्मीर में 370 दुबारा लागू करेगी। इसलिए यात्रा का नाम भारत जोड़ो यात्रा रखना हास्यस्पद है। क्योंकि इस यात्रा में दिग्विजय सिंह और जेएनयू में 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' का नारा लगाने वाले कन्हैया कुमार भी शामिल होंगे।
राहुल गांधी कांग्रेस की पदयात्रा की अगुवाई कर रहे हैं। बात तारीफ़ की जरुर है, करीब चार हजार किलोमीटर की पदयात्रा करने की हिम्मत जुटाना बड़ी बात है। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले वह केबिनेट का प्रस्ताव फाड़ने की बजाए अगर तब पदयात्रा करने की हिम्मत दिखाते तो अब तक जन नेता बन भी सकते थे। इस बीच जनता उन्हें दो बार रिजेक्ट कर चुकी है। वह खुद इस बात को समझ भी चुके हैं, इसीलिए 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार और अमेठी से खुद की हार के बाद उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था।
लेकिन कांग्रेस के चापलूस नेता इस बात को नहीं समझ रहे, वे राहुल गांधी को ही अपने कंधों पर लादे रखना चाहते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो गुलामनबी आज़ाद कांग्रेस छोड़ कर नहीं जाते, जब उन्हें इस बात का एहसास हो गया कि कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को ही कंधों पर बिठाए रखने को आमादा हैं, तभी उन्होंने कांग्रेस छोड़ने का फैसला किया।
यह बात शायद उदयपुर में हुए कांग्रेस के चिन्तन शिविर में ही तय हो गई थी कि राहुल गांधी को ही कांग्रेस अध्यक्ष बनाना है। सम्भवत वह काफी हद तक सहमत भी हो गए थे, तभी तो वह पदयात्रा के लिए राजी हुए, वरना पार्टी का नया अध्यक्ष पदयात्रा करता। उदयपुर में पार्टी की तरफ से पदयात्रा का एलान हो गया था, इससे भी जाहिर होता है कि राहुल गांधी को अध्यक्ष पद पर विराजमान करने के लिए राजी किया जा चुका था। अक्टूबर की बजाए सितंबर में पदयात्रा निकालने का फैसला और कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव की तारीख एक साथ तय तय की गई।
इन दोनों बातों का आपस में कनेक्शन है, जब राहुल गांधी 150 दिनों तक पद यात्रा पर होंगे, तभी उन्हें अध्यक्ष चुने जाने का एलान होगा। वैसे ऐसा कोई नियम नहीं है कि वह यात्रा के बीच दिल्ली नहीं आएँगे, वे बीच में दिल्ली आ भी सकते हैं, लेकिन अगले 150 दिन वह विदेश यात्रा पर नहीं जा सकेंगे।
कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनके फिर से चुने जाने पर कांग्रेस को कोई राजनीतिक फायदा नहीं होगा। एक तो देश की जनता उनकी राजनीतिक समझ और क्षमता पहले ही परख चुकी है, दूसरे नीतीश कुमार विपक्ष का सर्वमान्य चेहरा बनते जा रहे हैं और कम से कम तीन मुख्यमंत्रियों ममता बनर्जी, केसीआर और केजरीवाल को राहुल गांधी का चेहरा बिलकुल स्वीकार्य नहीं है। राहुल गांधी और कांग्रेस को यह कबूल कर लेना चाहिए कि क्षेत्रीय दल राहुल गांधी और कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार नहीं करेंगे। राहुल गांधी अगर 2024 में विपक्ष का चेहरा बनने और सत्ता के लिए पदयात्रा नहीं कर रहे हैं , तो अच्छी बात है, लेकिन ऐसा दिख नहीं रहा।
ऐसा नहीं है कि भारत के राजनेता सत्ता के लिए ही पदयात्राएं करते हैं। कई बार नेताओं ने राजनीतिक उद्देश्य के बिना भी पदयात्राएं की हैं। पिछले कुछ दशकों में राजनीतिक पदयात्राओं का इतिहास चन्द्रशेखर की पदयात्रा से शुरू होता है। जब उन्होंने कन्याकुमारी से दिल्ली में राजघाट तक 4000 किलोमीटर की पदयात्रा की थी। वह राजनीति में थे, लेकिन उनकी पदयात्रा का उद्देश्य सत्ता नहीं था। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं को समझने, सामाजिक असमानताओं और जातिवाद को समाप्त करने के लिए पदयात्रा की। इस यात्रा का उन्हें तुरंत कोई राजनीतिक फायदा तो नहीं मिला, लेकिन 1990 में प्रधानमंत्री पद पर पहुंचने में जरुर कामयाब रहे।
इसी तरह लाल कृष्ण आडवानी की रथयात्रा रामजन्मभूमि के लिए थी, लेकिन उन की इस रथयात्रा ने भाजपा को सत्ता में पहुंचने की सीढी का काम किया। 1993 में मुरली मनोहर जोशी की कन्याकुमारी से कश्मीर तक निकाली गई "एकता यात्रा" असल में भारत जोड़ो यात्रा थी। वह आतंकवादियों के गढ़ श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने की वाहन यात्रा थी, नरेंद्र मोदी उस यात्रा में उन के सहयोगी थे। उस वाहन यात्रा का नतीजा 2019 में निकला जब नरेंद्र मोदी ने दूसरी बार प्रधानमंत्री बनते ही 370 खत्म कर दी और लाल चौक पर शान से तिरंगा फहराया। भारत जोड़ने का लक्ष्य उस दिन पूरा हो चुका है, इसलिए पदयात्रा तो ठीक है, पदयात्रा का नाम हास्यस्पद है।
वैसे भारत जोड़ो पदयात्राओं का लंबा इतिहास रहा है। शंकराचार्य ने भारत को एकसूत्र में बाँधने के लिए पहली पद यात्रा की थी। उन का कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं था। उन्होंने भारत को सांस्कृतिक रूप से सफलतापूर्वक जोड़ा था। जबकि कांग्रेस तो यह मानती है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद नाम की कोई चीज नहीं है।
खैर भारत में आधुनिक पदयात्राओं की नींव महात्मा गांधी ने 1930 में रखी थी। जब ब्रिटिश सरकार ने नमक पर टेक्स लगाया था, तब गांधी ने 388 किलोमीटर की डांडी यात्रा की थी। इसी डांडी यात्रा ने उन्हें देश का लीडर बना दिया था, तब तक वह कांग्रेस के बड़े लीडर नहीं थे। तब से जननेता बनने के लिए लीडर पदयात्राओं का रास्ता ही अपना रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि हर यात्रा राजनीति के लिए ही हो। सामाजिक सद्भाव के लिए सुनील दत्त की यात्राएं हमेशा याद की जाती रहेंगी। 1987 में जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था, तब उन्होंने मुम्बई से अमृतसर तक 2000 किलोमीटर की पदयात्रा की थी। अगले साल 1988 में उन्होंने जापान के नागासाकी से हिरोशिमा तक विश्व शान्ति के लिए 500 किलोमीटर की पदयात्रा की। 1990 में उन्होंने भागलपुर दंगे के बाद साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए भागलपुर का दौरा किया।
ज्यादातर राजनीतिक नेताओं की पद यात्राएं सफल रही हैं। 1989 में आंध्र प्रदेश के चेन्ना रेड्डी को पदयात्रा ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचा दिया था। आंध्र में तो फिर यह प्रथा ही चल गई। 2004 में वाईएस राजशेखर रेड्डी, 2014 में चंद्रबाबू नायडू और 2019 में जगनमोहन रेड्डी पदयात्राओं के सहारे ही मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे।
2012 में चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने लंबी साईकिल यात्रा की। अखिलेश की इस यात्रा का यह असर हुआ कि समाजवादी पार्टी इतिहास में पहली बार पूर्ण बहुमत में पहुंच गई। 2018 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने 3300 किलोमीटर की लंबी नर्मदा यात्रा की, लेकिन उन्हें कोई राजनीतिक फायदा नहीं हुआ। अब राजनीति में आने को आतुर प्रशांत किशोर ने एलान किया है कि वह 3000 किलोमीटर की पदयात्रा करेंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
-
LPG Cylinder Shortage: एलपीजी संकट पर प्रियंका गांधी का सरकार पर प्रहार, बताया क्यों हो रही है गैस की किल्लत -
Rahul Gandhi: संसद में मचे घमासान के बीच राहुल गांधी का तीखा हमला, अध्यक्ष की भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल -
Parliament Today:संसद में स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की तैयारी, राहुल गांधी की सदस्यता भी घिरी -
Parliament Session: राहुल गांधी पर भड़के बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे, बताया- ‘प्रोपेगेंडा लीडर' -
Parliament Budget Session Day 3 Highlights: गृहमंत्री अमित शाह विपक्ष पर बरसे, अविश्वास प्रस्ताव हुआ खारिज -
Parliament Budget Session: 'आप अबोध बालक हो', संसद में हंगामे पर भड़के गिरिराज सिंह -
'जब बोलना होता है तो विदेश में होते हैं', अमित शाह ने सदन में पढ़ा राहुल गांधी का अटेंडेंस चार्ट -
Rahul Gandhi Wedding Visit: कौन है दुल्हन तनु, जिसकी शादी में पहुंचे राहुल गांधी? तोहफे में क्या-क्या दिया? -
वर्ल्ड कप जीत के जश्न के बीच इशान किशन के घर पसरा मातम, बहन की हुई दुखद मौत, आखिर किस वजह से गई जान -
संजू सैमसन पर हुई नोटों की बारिश! प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट बनने पर मिली इतनी प्राइज मनी? -
ICC के चाबुक से घायल हुए अर्शदीप सिंह, जीत के नशे में चूर सरदारजी को मिली कड़ी सजा -
IND vs NZ: 'वह मैदान पर मेरे साथ थी', ईशान किशन जिस बहन पर छिड़कते थे जान, उसकी मौत से घर में पसरा सन्नाटा












Click it and Unblock the Notifications