संकट में कांग्रेस को ओबीसी, दलित की याद आती है

कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए गांधी नेहरू परिवार के उम्मीदवार का चयन इस बार काफी दिलचस्प हो गया था। हर दिन उम्मीदवार बदल रहा था। यह तो शुरू से ही तय था कि गांधी परिवार का कोई सदस्य अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं लड़ेगा, लेकिन यह भी तय था कि अध्यक्ष वही चुना जाएगा, जिसे गांधी परिवार चुनेगा।
हालांकि गांधी परिवार मल्लिकार्जुन खड्गे को परिवार का आधिकारिक उम्मीदवार बताने से हिचकिचा रहा है, बल्कि खंडन कर रहा है। कहा जा रहा है कि गांधी परिवार तटस्थ है लेकिन जिस तरह दिग्विजय सिंह रातोंरात रेस से बाहर किए गए, हर कोई सच जान गया है।

रही सही कसर सोनिया गांधी ने महात्मा गांधी की जयंती पर मल्लिकार्जुन खड़गे को गांधी समाधि पर अपने साथ ले जाकर पूरी कर दी। दूसरे उम्मीदवार शशि थरूर भी साथ होते, तो मानते कि गांधी परिवार तटस्थ है। इसलिए पहली बात तो यह है कि मल्लिकार्जुन खड्गे के सामने शशि थरूर जीत नहीं सकते, जीत गए तो अध्यक्ष नहीं रह सकते। कांग्रेस इतिहास के ऐसे चार उदाहरण हमारे सामने हैं।
गांधी और नेहरू ने कभी ऐसे व्यक्ति को जीतने के बाद भी अध्यक्ष नहीं रहने दिया, जो उनकी इच्छा के बिना चुनाव जीत जाए। कांग्रेस के राजनीतिक इतिहास को जानने वाले गांधी और नेहरू कार्यकाल के दो उदाहरण अक्सर देते रहे हैं, लेकिन इंदिरा और सोनिया कार्यकाल के भी दो उदाहरण हैं। पहले गांधी नेहरू के दो उदाहरणों की बात कर लेते हैं।
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कांग्रेस के 1938 में हुए हरिपुरा अधिवेशन में सुभाष चन्द्र बोस सर्वसम्मती से अध्यक्ष चुने गए थे। ब्रिटिश राज के खिलाफ उनकी स्पष्टवादिता के कारण उनकी लोकप्रियता महात्मा गांधी से ज्यादा हो गई थी। गांधी और नेहरु उनसे ईर्ष्या करते थे।
इसलिए अगले साल 1939 में कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में गांधी नेहरु ने मिल कर पट्टाभि सीतारामय्या को उनके खिलाफ खड़ा कर दिया। गांधी नेहरू की जोरदार लाबिंग के बावजूद सुभाष चन्द्र बोस 1580 वोटों से चुनाव जीत गए। गांधी ने इसे अपनी व्यक्तिगत हार माना। सुभाष चन्द्र बोस के खिलाफ गांधी नेहरू गुट के 13 कांग्रेस कार्य समिति सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया था। यह एक तरह से सुभाष चन्द्र बोस के प्रति अविश्वास था। अध्यक्ष के रूप में उनका काम करना मुश्किल कर दिया गया।
सुभाष चन्द्र बोस को इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया गया। उनकी जगह पर डा. राजेन्द्र प्रसाद को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन आज़ादी के बाद डा. राजेन्द्र प्रसाद हिन्दू धर्म में आस्था के कारण नेहरू की आँख की किरकिरी बन गए थे। इसके बावजूद नेहरू उन्हें लगातार दो बार राष्ट्रपति बनने से नहीं रोक सके, क्योंकि कांग्रेस कार्यसमिति डा. राजेन्द्र प्रसाद के पक्ष में थी।
जैसे गांधी-नेहरू ने मिल कर सुभाष चन्द्र बोस को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया था, ठीक वैसे ही आज़ादी के बाद भी 1950 में नेहरू के उम्मीदवार जे.बी. कृपलानी जब पुरुषोतम दास टंडन के मुकाबले हार गए, तो नेहरू ने कांग्रेस कार्यसमिति से इस्तीफा देने की धमकी दी। बिलकुल वैसे ही जैसे सुभाष चन्द्र बोस के समय गांधीजी ने दी थी।
नेहरू ने अपने इस्तीफा देने की खबर अखबारों में प्लांट करवाई। 1952 का लोकसभा चुनाव सामने था, कांग्रेस में हडकंप मच गया। इस पर पुरुषोतम दास टंडन ने खुद पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। नेहरु जो चाहते थे, वह हो गया था। वह खुद पार्टी के अध्यक्ष बन गए और 1954 तक अध्यक्ष बने रहे। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हर साल हुआ करता था।
दूसरी बार वह वक्त तब आया, जब राजनीति से बाहर हो चुकी सोनिया गांधी ने 1996 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की हार के बाद अपने परिवार के चापलूसों का दबाव बनाकर नरसिंह राव को अध्यक्ष पद छोड़ने को मजबूर किया। हालांकि कांग्रेस 1989 से लगातार चुनाव हार रही थी। 1991 से 1996 तक नरसिंह राव अल्पमत सरकार के प्रधानमंत्री थे। सोनिया गांधी के गुट ने बिहार के ओबीसी नेता सीता राम केसरी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया था, क्योंकि चुनाव जीतने के लिए यूपी बिहार का ओबीसी वोट बहुत मायने रखता था और इन्हीं दोनों राज्यों में कांग्रेस की दुर्गति शुरू हो गई थी।
लेकिन बाद में खुद अध्यक्ष बनने के लिए ओबीसी जाति के सीता राम केसरी को कैसे अपमानित करके कांग्रेस के अध्यक्ष पद और कांग्रेस मुख्यालय से निकाला गया था, वह कांग्रेस का काला इतिहास बन चुका है।
चलिए अब आप को संकट के समय दलितों को अध्यक्ष बनाने की याद दिलाते हैं। लाल बहादुर शास्त्री के देहांत के बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बन चुकी थी। 1969 तक सब ठीक चल रहा था, लेकिन 1969 में राष्ट्रपति पद के चुनाव में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस की ओर से तय किए गए राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार नीलम संजीवा रेड्डी का समर्थन करने से इंकार कर दिया। उन्होंने वी.वी. गिरी को बागी उम्मीदवार बना कर आत्मा की आवाज पर वोट देने की अपील जारी कर दी। कांग्रेस का आधिकारिक उम्मीदवार हार गया और इंदिरा गांधी का उम्मीदवार जीत गया।
इसी के साथ कांग्रेस भी टूट गई, यह पहला मौक़ा था, जब इंदिरा गांधी ने वोट बैंक की राजनीति शुरू करते हुए दलित चेहरा सामने रखने के लिए जगजीवन राम को अपनी अलग पार्टी कांग्रेस (आई) का अध्यक्ष बना दिया। इंदिरा गांधी के लिए तब अस्तित्व और संकट का काल था लेकिन एक साल बाद ही जब कांग्रेस संकट से बाहर निकल आई तो शंकर दयाल शर्मा और देवकांत बरुआ अध्यक्ष बनाए गए। आपातकाल के बाद तो इंदिरा गांधी खुद अध्यक्ष बन गई और 1984 में हत्या होने तक प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष दोनों बनी रही।
अब फिर नेहरू गांधी परिवार के लिए अस्तित्व और संकट का काल है तो परिवार को दलित याद आए हैं। सोनिया गांधी ने ठाकुर दिग्विजय सिंह को ठुकरा कर दक्षिण के दलित मल्लिकार्जुन खड्गे को अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाया है।
कांग्रेस जब जब संकट में होती है, उसे पिछड़े और दलित याद आते हैं। कांग्रेस जैसे संकट में अब है, वैसे संकट में पहले कभी नहीं रही, इसलिए अब चारों तरफ दलितों की पूछ हो रही है। यहाँ तक कि दूसरे दलों से आए दलितों का पूजन हो रहा है। जैसे राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में भी बसपा से उधार लेकर दलित समुदाय के बृजलाल खाबरी को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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