कांग्रेस के दक्षिण भारतीय अध्यक्षों से नेहरू परिवार की कभी बनी नहीं
वैश्विक इतिहास के लिए 1919 का जितना अहम है, उतना ही महत्वपूर्ण भारत के लिए भी है। दुनिया को झकझोर देने वाले पहले विश्व युद्ध का अंत इसी साल हुआ तो इसी साल लोकतांत्रिक मुलम्मे के भीतर भारत में एक राजतंत्र की नींव पड़ी। बलिदान पंथ की तीर्थस्थली अमृतसर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में मोतीलाल नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। जालियांवाला बाग जैसे क्रूर कांड की प्रतिक्रिया में उबल रहे चौंतीस साला कांग्रेस पार्टी ने जो बिरवा रोपा, वह कालांतर में उसके लिए इतना जरूरी हो गया कि उसके बिना पार्टी की कल्पना भी आज बेमानी हो गई है।

मोतीलाल नेहरू का खून कांग्रेस के लिए ऐसा अपरिहार्य बन गया कि उसकी मर्जी के बिना पार्टी में पत्ता तक खड़कना मुनासिब नहीं रह गया। इस घटना के पूरे एक सौ तीन साल बाद कांग्रेस अपने लिए नया अध्यक्ष चुनने जा रही है। आखिरी सूची के हिसाब से कर्नाटक के मल्लिकार्जुन खड़गे और केरल के शशि थरूर के साथ ही झारखंड के केएन त्रिपाठी उम्मीदवार हैं। कांग्रेस आलाकमान के रूप में स्थापित गांधी-नेहरू परिवार का वरदहस्त चूंकि कर्नाटक के वयोवृद्ध खड़गे के सिर है, इसलिए माना जा रहा है कि अगले अध्यक्ष वे ही होंगे।
दक्षिण भारत से हुए सात अध्यक्ष
खड़गे चुने जाएं या शशि थरूर के सिर देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी का ताज सजे, यह आठवां मौका होगा, जब दक्षिण भारत से कोई पार्टी की कमान संभालेगा। आजाद भारत के 75 साल के इतिहास में सिर्फ 17 साल ही ऐसे रहे, जब कांग्रेस सत्ता से बाहर रही। अन्यथा देश की सत्ता पर उसका ही शासन रहा। पिछले आठ-दस सालों को छोड़ दें तो दक्षिण पर अपेक्षाकृत कांग्रेस की पकड़ हमेशा रही है। इसके बावजूद पार्टी की कमान सिर्फ पांच बार ही मिली।
आजाद भारत में पहली बार 1948 में आंध्र प्रदेश के पट्टाभिसीतारमैया को कांग्रेस की कमान मिली। तब कांग्रेस पंडित नेहरू के रोमानी प्रभाव में थी, इसलिए सीतारमैया अपनी अलग छाप नहीं छोड़ पाए। नेहरू के रहते ही 1960 में आंध्र के ही दूसरे दिग्गज नीलम संजीव रेड्डी बंगलुरू में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। इसके अगले साल गुजरात के भावनगर और उसके अगले साल पटना में हुए सम्मेलन में संजीव रेड्डी अध्यक्ष चुने गए। अपने कार्यकाल के शुरूआती साल में भले ही नेहरू का प्रभामंडल बचा हुआ था, लेकिन 1962 में चीन के हाथों भारत को मिली बुरी पराजय के बाद नेहरू के प्रभामंडल में दरार पड़ी। ऐसे में कांग्रेस पर दक्षिण भारतीय नेतृत्व का प्रभाव बढ़ने लगा।
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नीलम संजीव रेड्डी के बाद 1964 में भुवनेश्वर में हुए सम्मेलन में तमिलनाडु से आनेवाले के कामराज अध्यक्ष चुन लिए गए। इसके अगले साल पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर और उसके अगले साल जयपुर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में कामराज लगातार अध्यक्ष चुने जाते रहे। कामराज के ही कार्यकाल के दौरान इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं। तब कामराज की अगुआई वाले दक्षिण भारतीय दिग्गज चेहरों से भरी कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के बारे में सोचा था कि वह उनके इशारे पर नाचेंगी।
लेकिन इंदिरा गांधी के पास वह विरासत थी, जिसे मोतीलाल नेहरू ने 1919 में कांग्रेस में रोपा। बड़ी चालाकी से 1928 में मजबूत किया और अपने बाद अपने बेटे जवाहरलाल को ही कांग्रेस की कमान दिलवा दी। इतिहास में यह तथ्य भुला दिया जाता है कि 1929 की लाहौर कांग्रेस के लिए जवाहर से उम्र में 14 साल बड़े सरदार वल्लभ भाई पटेल को अध्यक्ष बनना था। लेकिन मोतीलाल नेहरू की चालों के चलते उन्हें दो साल का इंतजार करना पड़ा। वे 1931 में ही कांग्रेस के अध्यक्ष बन सके।
आजाद भारत की कांग्रेस के चौथे दक्षिण भारतीय अध्यक्ष आंध्र प्रदेश के एस निजलिंगप्पा रहे, जिन्हें 1968 में हैदराबाद और 1969 में मुंबई में अध्यक्ष चुना गया। लेकिन तब तक इंदिरा गांधी, अपनी गूंगी गुड़िया की उस छवि से मुक्त हो चुकी थीं, जिसे सिंडिकेट के रूप में चर्चित तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व ने आरोपित किया था। इन्हीं निजलिंगप्पा के दौर में कांग्रेस का ऐतिहासिक विभाजन हुआ और इंदिरा ने पहले कांग्रेस (आर) और फिर बाद में कांग्रेस (आई) के नाम से अपनी अलग पार्टी बनाई। और देखते ही देखते यही असल कांग्रेस के रूप में स्थापित हो गई। इसके बाद कांग्रेस के जो भी अध्यक्ष रहे हों, चाहे जगजीवन राम हों या शंकर दयाल शर्मा या देवकांत बरूआ, सब इंदिरा-नेहरू परिवार के खड़ाऊं वाहक ही रहे।
कांग्रेस पार्टी का प्रथम परिवार
1978 में इंदिरा ने आधिकारिक रूप से कांग्रेस की कमान जो संभाली तो बीच के छह सालों छोड़ दें तो गांधी-नेहरू परिवार के ही हाथ कांग्रेस की कमान रही। फिर तो कांग्रेस पार्टी जैसे गांधी-नेहरू परिवार की होकर रह गई। कांग्रेसी तो इस परिवार को देश का प्रथम राजनीतिक परिवार मानने लगे। कांग्रेसियों की यह सोच तो समझ में आती है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि कांग्रेस विरोध के नाम राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करने वाली पार्टियां और उनका नेतृत्व भी कभी प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष रूप से गांधी-नेहरू परिवार को ही प्रथम परिवार स्वीकार करता रहता है।
यहां एक बात और गौर करने की है कि प्रथम राजनीतिक परिवार के तौर पर सिर्फ सोनिया गांधी और उनकी संतानों को ही मान्यता है। इंदिरा गांधी के दूसरे और राजनीतिक रूप से कहीं ज्यादा प्रभावशाली रहे बेटे संजय गांधी का परिवार प्रथम राजनीतिक परिवार के रूप में मान्य नहीं है। संजय की पत्नी मेनका और उनके बेटे वरूण की वैसी राजनीतिक मान्यता और हैसियत नहीं है, जैसी सोनिया, राहुल या प्रियंका की है।
राजीव गांधी की 1991 में हत्या भी उस दक्षिण भारत में ही हुई, जहां कांग्रेस का वर्चस्व बना रहा। उनकी हत्या के बाद तो वैसे ही कांग्रेसियों को अपने प्रथम परिवार की छाया से मुक्त नहीं होना था। तब भी कमान सोनिया को ही सौंपने की कोशिश हुई। यह बात और है कि शोक और पीड़ा में डूबी सोनिया ने तब कमान संभालने से इनकार कर दिया। फिर मजबूरी में कमान आंध्र के पामुलपति व्यंकट नरसिंह राव को मिली। अगर हवाला कांड में नाम नहीं आया होता तो 1996 में भी नरसिंह राव शायद ही पार्टी की कमान छोड़ते।
गांधी-नेहरू परिवार की गैरमौजूदगी और 1991 में बीच चुनाव राजीव हत्या से उपजी सहानुभूति के चलते मिली कांग्रेस को बढ़त की वजह से सत्ता के शिखर पर भी जा पहुंचे। इसके बाद तो उन्होंने कांग्रेस के प्रथम परिवार को राजीव गांधी फाउंडेशन और दस जनपथ के दायरे में ही बांध कर रख दिया।
दक्षिण भारतीय अध्यक्षों से नेहरु वंश का टकराव
आजाद भारत के एक दक्षिण भारतीय कांग्रेस अध्यक्ष पट्टाभिसीतारमैया को छोड़ दें तो सभी दक्षिण भारतीयों से गांधी-नेहरू परिवार का रिश्ता छत्तीस का ही रहा है। नीलम संजीव रेड्डी और एस निजलिंगप्पा की इंदिरा से अदावत मशहूर है। वे इंदिरा के प्रभाव में नहीं आए। कामराज ने भले ही इंदिरा को प्रधानमंत्री बनवाया, लेकिन बाद में वे भी उनके विरोधी हो गए। नरसिंह राव भी उसी तर्ज पर गांधी-नेहरू परिवार के अपने कार्यकाल के दिनों में किनारे रखते रहे। उन्होंने सीताराम केसरी को उत्तराधिकार अपने विश्वस्त के नाते सौंपा, लेकिन केसरी खुलकर खेलने लगे। इस पूरी प्रक्रिया में उन्होंने नरसिंहराव का कद पार्टी में छोटा तो कर दिया, लेकिन 1998 में अपनी धोती नहीं बचा पाए। दिल्ली में हुए एक अधिवेशन में उन्हें जबरिया हटाकर सोनिया गांधी को अध्यक्ष बना दिया गया। तब से तो यह परिवार जैसे कांग्रेस का बेताज बादशाह है।
1972 से लगातार किसी न किसी सदन के प्रतिनिधि रहे सातवें दक्षिण भारतीय मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस अध्यक्ष बनने की दहलीज पर हैं। दलित के नाम पर कांग्रेस के नए अध्यक्ष को चौतरफा समर्थन की उम्मीद की जा रही है। उम्मीद के मुताबिक वे जीत भी जाएंगे। लेकिन राजनीतिक समीक्षक के शब्दों में इस पूरी प्रक्रिया में मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस रूपी वाहन को चलाने का लाइसेंस भले ही हासिल कर लेंगे, लेकिन वे शायद ही कभी इस वाहन को चला पाएं। उसके स्टेयरिंग पर हाथ गांधी-नेहरू परिवार का ही होगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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