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अंतर्राष्ट्रीय बाजार में रॉकेट की रफ्तार से क्यों बढ़ रही है कच्चे तेल की कीमत, आप पर क्या होगा असर?

तेल निर्यातक देशों और सहयोगी देशों के संगठन ओपेक प्लस ने तेल का प्रोडक्शन कम कर दिया है और बाजार के अनुमान के मुकाबले प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन को कम कर दिया है।

नई दिल्ली, जनवरी 22: पिछले कुछ हफ्तों से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है और बुधवार को तेल की कीमत साल 2014 के बाद से अपने उच्चतम स्तर तक पहुंच गया है और विश्लेषकों का कहना है कि, जनवरी और फरवरी में भी तेल का उत्पादन और उसकी सप्लाई में काफी कमी होने वाली है, यानि आने वाले हफ्तों में तेल की कीमत हर रिकॉर्ड को तोड़ सकती है। तेल की आपूर्ति में कमी ओमिक्रॉन वेरिएंट के डर से शुरू हुई है, जब दुनिया में एक बार फिर से लॉकडाउन का डर बनने लगा, लेकिन ओमिक्रॉन का असर उतना नहीं हुआ, जितना डर था, लेकिन तेल के बाजार में कीमतों का बढ़ना अब भी जारी है।

स्थिर बनी है तेल की मांग

स्थिर बनी है तेल की मांग

अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में तेल की मांग स्थिर बनी हुई है, जबकि पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन और उसके सहयोगियों (ओपेक +) से उत्पादन में कमी के कारण आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसके साथ ही पेट्रोलिय पदार्थों में लैंडिंग सपोर्ट, काफी ज्यादा भू-राजनीतिक तनाव और पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति करने वाले देशों की आपसी राजनीति ने पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में एक तूफान ला दिया है। इस रिपोर्ट को बनाते वक्त अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड ऑयल वायदा बाजार में 87.69 डॉलर प्रति बैरल पर था, जबकि, वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड 0.70 प्रतिशत नीचे 84.95 डॉलर पर था। तो इस साल तेल की कीमतें कितनी ऊंची चढ़ सकती हैं? और उपभोक्ताओं के दर्द को कम करने के लिए क्या किया जा सकता है? आईये जानते हैं।

तेल की कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?

तेल की कीमतें क्यों बढ़ रही हैं?

पिछले साल के आखिरी महीनों में जब ओमिक्रॉन वेरिएंट ने दुनियाभर की अखबारों में हेडलाइंस बनाना शुरू किया, तो तेल बाजारों ने कच्चे तेल की मांग में तेज गिरावट होने लगी। लेकिन नए साल के पहले महीने के शुरूआती हफ्तों में पता चल रहा है कि, ओमिक्रॉन का असर बाजार में कुछ खास नहीं पड़ रहा है, जितनी आशंका जताई गई थी। लेकिन, भले ही बाजार पर ओमिक्रॉन का असर नहीं हुआ, लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा होना शुरू हो गया है। लेकिन, सवाल ये है, कि आखिर तेल की कीमतों में इतनी तेजी से इजाफा क्यों हो रहा है, तो विश्लेषकों का कहना है कि, बाजार में तेल की डिमांड स्थिर बनी हुई है, यानि मांग में कमी नहीं आई है, जबकि सप्लाई में कमी कर दी गई है।

क्यों की गई सप्लाई में कमी?

क्यों की गई सप्लाई में कमी?

तेल निर्यातक देशों और सहयोगी देशों के संगठन ओपेक प्लस ने तेल का प्रोडक्शन कम कर दिया है और बाजार के अनुमान के मुकाबले प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन को कम कर दिया है और इसके पीछे ओमिक्रॉन का हवाला दिया गया है, जबकि ओमिक्रॉन तो असर ही नहीं दिखा पाया। जिसपर कुछ विश्लेषकों का कहना है कि, ओपेक प्लस जान बूझकर तेल की कीमतों को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और आपूर्ति में कमी कर रहा है।

ओपेक प्लस को किस बात का डर?

ओपेक प्लस को किस बात का डर?

नाइजीरिया, इक्वाडोर, लीबिया और कजाकिस्तान में हाल ही में कई तरह की रुकावटें और राजनीतिक टेंशन आई हैं और ये सभी ओपेक प्लस सदस्य देशों ने ओमिक्रॉन के डर के साथ साथ राजनीतिक अस्थिरता के डर को और बढ़ा दिया है। इसके साथ ही इराक-टू-तुर्की पाइपलाइन में अस्थायी ठहराव की वजह से भू-राजनीतिक टकराव को लेकर तनाव और भी ज्यादा बढ़ गया है, लिहाजा ओपेक प्लस देशों ने अस्थिरता की वजह से तेल का उत्पादन कम कर दिया है।

भू-राजनीतिक तनाव का असर?

भू-राजनीतिक तनाव का असर?

इन दिनों दुनिया के कई हिस्सों में काफी तनाव भड़का हुआ है। यूक्रेन तनाव चरम पर है और अमेरिका और रूस आमने-सामने हैं। इस बीच यमन में तनाव काफी बढ़ गया है। हूती विद्रोहियों द्वारा संयुक्त अरब अमीरात पर किए गये हमले के बाद सऊदी अरब की अगुवाई में यमन पर भीषण हमला किया गया है, जिसमें 70 से ज्यादा लोग मारे गये हैं, लिहाजा मिडिल ईस्ट में तनाव काफी बढ़ गया है, जिसका सीधा असर तेल उत्पादन पर पड़ रहा है। इन हमलों में ज्यादातर वक्त तेल ठिकानों को ही निशाना बनाया जाता है।

कितनी ऊपर जा सकती है तेल की कीमत?

कितनी ऊपर जा सकती है तेल की कीमत?

गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषकों ने इस सप्ताह अपने तेल मूल्य पूर्वानुमान को संशोधित किया है। वे अब वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड को इस साल 96 डॉलर प्रति बैरल और अगले साल 105 डॉलर से ज्यादा बढ़ने की संभावना बता रहे हैं और साल अगले साथ तक स्थिति में संतुलन आने की संभावना जता रहे हैं।

क्या अन्य विश्लेषक गोल्डमैन से सहमत हैं?

क्या अन्य विश्लेषक गोल्डमैन से सहमत हैं?

अटलांटिक काउंसिल ग्लोबल एनर्जी सेंटर के उप निदेशक रीड ब्लेकमोर ने अल जज़ीरा को बताया कि उन्हें इस बात की जल्द उम्मीद नहीं दिख रही हैं कि, तेल की कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आएगा और आने वाले हफ्तों में उन्हें तेल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल की कीमत से ऊपर जाता दिखाई दे रहा है। वहीं,रिस्टैड एनर्जी के वरिष्ठ तेल विश्लेषक लुईस डिक्सन ने अल जज़ीरा को बताया कि ''तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से आगे जा सकता है, लेकिन इसे जल्दी से ठीक किया जाएगा''।

क्या ओपेक प्लस प्रोडक्शन बढ़ाएगा?

क्या ओपेक प्लस प्रोडक्शन बढ़ाएगा?

ब्लेकमोर ने कहा कि ओपेक+ मौजूदा कीमतों के माहौल में अच्छी स्थिति में है। उन्होंने कहा कि, "लेकिन समूह निश्चित रूप से समझता है कि उच्च कीमतें जल्दी से एक बुरी स्थिति में भी तब्दील हो सकती हैं और इस प्रकार इस बात से ओपेक प्लस सावधान रहता है कि, आने वाले वक्त में कीमतों को स्थिर कैसे रखा जाए और कीमत स्थिर नहीं होने पर इसका क्या असर हो सकता है''। विश्लेषकों का कहना है कि, जब तेल महंगा हो जाता है, तो संयुक्त राज्य अमेरिका की शेल तेल कंपनियां, जिनकी उत्पादन लागत अपेक्षाकृत ज्यादा होती है, उनकी कीमतें भी तेजी से बढ़ती है और ऐसी कंपनियां ओपेक प्लस बाजार में अपनी हिस्सेदारी खो सकती है। लिहाजा, अगर अमेरिकी कंपनियों के पेट में दर्द शुरू होता है, तो फिर इसका सीधा असर वाशिंगटन और रियाद के संबंधो पर पड़ता है और दोनों देशों के बीच संबंध खराब हो सकते हैं''।

उपभोक्ताओं को कितना दर्द होगा?

उपभोक्ताओं को कितना दर्द होगा?

खैर, अगर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में इजाफा होता है, तो इसका सीधा असर पेट्रोल पंपों पर पड़ेगा और आम उपभोक्ताओं के सिर में इसका दर्द शुरू होगा। अमेरिकी राज्य कैलिफ़ोर्निया में एक गैलन (3.8 लीटर) गैसोलीन की कीमत 4.65 डॉलर जितनी हो सकती है। अमेरिकन ऑटोमोबाइल एसोसिएशन के अनुसार, तेल की कीमत का राष्ट्रीय औसत इस साल 3.33 डॉलर है, जबकि पिछले साल ये 2.40 डॉलर था। पिछली बार भी अमेरिकियों के लिए गैसोलीन की कीमतें आसमान छूने लगीं थीं, जब एक वैश्विक ऊर्जा संकट चल रहा था। वहीं इसका ड़ायरेक्ट असर भारत जैसे देशों पर भी होगा, भारत में जहां तेल की कीमतें पहले से ही काफी ज्यादा हैं, वहां स्थिति काफी खराब हो सकती है और इसका सीधा असर भारत जैसे देशों की घरेलू राजनीति पर पड़ेगा।

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