चाइनीज वैक्सीन पर भरोसा नहीं कर पा रहे उसके गहरे दोस्त पाकिस्तान के लोग

नई दिल्ली। Chinese Covid vaccine: कोरोना महामारी के खिलाफ दुनिया के बड़े देश और दवा निर्माता कम्पनियां वैक्सीन के निर्माण में लगी हुई हैं। वैक्सीन बनाने वाले प्रमुख देशों में चीन भी है। चीन में बनी कोविड-19 वैक्सीन को लेकर ज्यादा देश आगे नहीं आ रहे हैं यहां तक कि उसके सबसे नजदीकी दोस्त पाकिस्तान के लोगों को भी चाइनीज वैक्सीन पर भरोसा नहीं है।

पाकिस्तान में चीनी वैक्सीन पर भरोसा नहीं

पाकिस्तान में चीनी वैक्सीन पर भरोसा नहीं

पिछले 70 सालों में चीन ने पाकिस्तान में रोड, रेल नेटवर्क और पॉवर स्टेशन जैसे विकास निर्माण में 70 अरब डॉलर का निवेश किया है। इतना निवेश करने के बावजूद पाकिस्तान में चीन की वैक्सीन के केवल दो क्लीनिकल ट्रायल किए जा रहे हैं जिसमें सरकारी अधिकारियों को टीका लगाना पड़ रहा है।

वहीं पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर कराची और दूसरे देश जैसे इंडोनेशिया, ब्राजील में लोगों से बात करने पर पता चलता है कि चीन लाखों लोगों को भरोसे में लेने में असफल रहा है जिन्हें इसके टीकों पर निर्भर रहना पड़ सकता है। कराची में लोगों का कहना है कि वो ये वैक्सीन नहीं लेंगे। उन्हें इस पर भरोसा नहीं है।

यह अविश्वास उन गरीब देशों में जिनकी निर्भरता चीन के ऊपर है एक राजनीतिक मुश्किल पैदा कर सकता है। अगर लोगों को लगता है कि उन्हें खराब क्वालिटी की वैक्सीन दी जा रही है या फिर वे इसे संदेह की नजर से देखते हैं तो सरकारों के लिए टीकाकरण मुश्किल हो जाएगा।

वैक्सीन डिप्लोमेसी से हावी होना चाहता है चीन

वैक्सीन डिप्लोमेसी से हावी होना चाहता है चीन

चीन अपनी कोरोना वैक्सीन को अपनी कूटनीतिक सफलता के लिए भी इस्तेमाल करने की सोच रहा था। उसका इरादा वैक्सीन डिप्लोमेसी के जरिए उन गरीब देशों तक पहुंचने का है जहां पर यूरोप में बनी वैक्सीन अभी पहुंचने की उम्मीद नहीं है। लेकिन मुश्किल यह है कि चीन में तैयार हुई कोरोना वायरस वैक्सीन के ट्रायल और इसकी प्रक्रिया को संदेह से परे रखने के लिए बहुत कम जानकारी सामने है। वहीं अमेरिका और यूरोप की दवा कंपनियों ने अपनी वैक्सीन की सुरक्षा और प्रभाव को लेकर डाटा प्रकाशित किया है और वैक्सीन पहुंचानी भी शुरू कर दी है।

इसी अनिश्चितता ने चीन की एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिकी देशों में पहुंचने की रणनीति को एक बार फिर से झटका दिया है। चीन ने इन देशों में पहुंचने के लिए अरबों डालर पैसा बहाया है जिनमें रोड से लेकर रेलवे नेटवर्क और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने पर जोर है लेकिन उसे लागू करने के तरीके और दूसरे देशों को कर्ज में फंसाने से आखिर उसका दांव खुद पर ही उलटा पड़ जाता है। चीन जब भी किसी डिप्मोलेसी में खुद को डालता है वह खुद ही उसे बरबाद कर देता है। वैक्सीन डिप्लोमेसी के साथ भी यही हुआ है।

चीन की इस चाल से डरते हैं देश

चीन की इस चाल से डरते हैं देश

चीन ने वैक्सीन पर भरोसा कायम करने के लिए कई सारे प्रयास किए हैं। अक्टूबर में चीन ने अफ्रीकी देशों के 50 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल का सिनोवॉक कम्पनी में दौरा करवाया था जिसमें इन लोगों को वैक्सीन को लेकर निर्माण के बारे में जानकारी दी गई थी। लेकिन अभी तक सिर्फ यूएई ने ही चीन की वैक्सीन के टीकाकरण की अनुमति दी है।

वहीं देशों की शंका ये भी है कि कई चीन वैक्सीन के बदले अपनी 5 जी टेक्नॉलॉजी या फिर उन देशों के प्रमुख सेक्टर में निवेश की अनुमित भी मांग सकता है। चीन को देखते हुए ऐसा सोचना बहुत मुश्किल भी नहीं है। चीन पहले भी ऐसा कर चुका है। श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह इसका ताजा उदाहरण है। जहां कर्ज लौटाने में श्रीलंका के असफल होने पर चीन ने महत्वपूर्ण बंदरगाह पर अपना सिक्का जमा लिया है।

वैक्सीन न बिकने से चिढ़ा है चीन

वैक्सीन न बिकने से चिढ़ा है चीन

सोमवार को चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने एक ट्वीट में कहा था चीन निर्मित टीके उन सरकारों के लिए एकमात्र विकल्प हो सकते हैं जिन्हें अभी तक वैक्सीन नहीं मिल सकी है। क्योंकि अमीर देशों ने अनुमानित रूप से बनने वाले 12 अरब वैक्सीन का तीन चौथाई पहले ही अपने लिया बुक कर लिया है। इसके साथ ही उन्होंने इन देशों की कोल्ड चेन की समस्या की तरफ इशारा करते हुए बताया कि इन टीकों को दूसरों की तुलना में अधिक व्यापक रूप से वितरित किया जा सकता है। झाओ ने ये भी कहा था कि चीन इन्हें विकासशील देशों को दान और मुफ्त सहायता सहित प्राथमिकता के आधार पर देगा।

झाओ ने कहा कि "हमें दूसरों की कीमत पर अपना एकाधिकार चाहने वालों के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। खासतौर से हमें टीके के राष्ट्रवाद को खारिज करना चाहिए।" झाओ का ये बयान बताता है कि किस तरह चीन अपने टीकों को दूसरे देशों में समर्थन न मिलने से चिढ़ा हुआ है। एक तरफ जहां अमीर देशों ने फाइजर और मॉडर्ना के टीकों से टीकाकरण शुरू कर दिया है वहीं विकासशील देश भी उन्हीं टीकों का इंतजार कर रहे हैं। यहां तक कि चीन ने जिस पाकिस्तान की इस मुश्किल दौर में बढ़-चढ़कर मदद की है और अरबों डॉलर का कर्ज दिया है वह भी अभी तक चीन से वैक्सीन को डील करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है।

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