स्पष्ट बहुमत के बावजूद हेमंत सोरेन को झारखंड सरकार चलाने में करना पड़ेगा इन कड़ी चुनौतियों का सामना
Despite the clear majority, Hemant Soren will have to face these tough challenges in running the Jharkhand government.झारखंड में सीएम बन रहे हेमंत सोरेन की गठबंधन सरकार में हर कदम पर चुनौतियों का समाना करना पड़ेगा। जानिए वो चुनौनियां?
बेंगलुरु। झारखंड में महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हेमंत सोरेन 29 दिसंबर को रांची में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे है। इस समारोह में 14 राजनीतिक दल शिरकत करेंगे। इनके अलावा इस समारोह में पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी, राहुल गांधी समेत 30 बड़े राजनेताओं ने कार्यक्रम में आने की सहमति व्यक्त की है। समारोह के लिए देश के बड़े नेताओं, उद्योगपतियों और हस्तियों को आमंत्रित किया गया है। बता दें कि हेमंत सोरेन दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। इससे पहले हेमंत ने जुलाई 2013 में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। जेएमएम-राजद-कांग्रेस के साथ मिलकर उन्होंने एक साल पांच महीने पंद्रह दिनों तक सरकार चलाई थी।
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गौरतलतब है कि झारखंड विधानभा चुनाव में आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर हेमंत सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा पार्टी ने चुनाव लड़ा था। चुनाव परिणाम में हेमंत सोरेन के गठबंधन ने झारखंड विधानसभा की 81 सीटों में से 47 सीटों पर जीत हासिल कर सरकार बनाने का बहुमत हासिल किया हैं। वहीं इस हेमंत सोरेन महागठबंधन की विरोधी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ाऔर महज 25 सीटों पर सिमट कर रह गयी। जबकि पिछले पांच सालों से झारखंड में भाजपा के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने ही यहां की सत्ता संभाली थी।

फिलहाल छह माह पूर्व हुए लोकसभा चुनाव में झारखंड में अधिकांश सीटों पर जीत हासिल करने वाली भाजपा को हेमंत सोरेन ने विधानसभा चुनाव में हरा कर झारखंड की सत्ता अपने हाथ में ले ली हैं। अब ऐसे में सवाल उठता है कि क्या झारखंड संभालना हेमंत सोरेन के लिए इतना ही आसान है? क्या आरजेडी और कांग्रेस से गठबंधन के साथ हेमंत सोरेन अपने मन मुताबिक फैसले लेकर सरकार सहजता से चला पाएंगे? इस गठबंधन के चलते झारखंड हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री तो बनने जा रहे है लेकिन सरकार चलाने में उनकी राहें इतनी आसान होगी?

महाराष्ट्र वाले तेवर कांग्रेस झारखंड में दिखा सकती है
महाराष्ट्र की तरह कांग्रेस के समर्थन से झारखंड में भी सरकार बनी है। इसलिए इसमें कोई दोराय नहीं कि झारखंड में हेमंत सोरेन सरकार को भी महाराष्ट्र के सीएम उद्वव ठाकरे जैसी कठिन हालात से गुजरना पड़ेंगा। आपको बता दें महाराष्ट्र में महज एक माह पुरानी सीएम उद्वव ठाकरे की महाअघाड़ी सरकार को चलाने में कांग्रेस गठबंधन में शामिल होने के बावजूद हर कदम पर बड़ी मुश्किलें खड़ी कर रही है।
महाराष्ट्र में कांग्रेस कर रही ये डिमांड
पहले नागरिकता संसोधन बिन को लोकसभा में समर्थन देने के लिए शिवसेना को आड़े हाथों लिया, इतना ही नहीं गठबंधन से बाहर निकलने तक की धमकी तक दे डाली थी। वहीं वर्तमान समय में मंत्रीमंडल विस्तार में विभागों के बंटवारें को लेकर कांग्रेस संतुष्ट नही हैं। कुछ मलाईदार विभागों की मांग को लेकर कांग्रेस अड़ी हुई हैं। कांग्रेस की इस जिद्दी रवैये के कारण महाराष्ट्र सरकार में दरार पड़ती दिखायी देने लगी हैं।

यहां भी दोहराया जा सकता है महाराष्ट्र का इतिहास
अगर झारखंड की बात करें तो सीएम बन रहे हेमंत सोरेन के सामने आने वाले दिनों में ऐसे कई मौके आ सकते है जब महाराष्ट्र का इतिहास वहां भी दोहराया जा सकता हैं। झारंखड में तीन बड़े दलों में गठबंधन की सरकार बन रही है जिसमें कांग्रेस और आरजेडी से मोर्चा लेने या फिर अपनी बात मनवाने में सोरेन को कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
16 सीट पर कांग्रेस ने जीत हासिल की है
बता दें झारखंड की 81 विधानसभा सीट पर हुए चुनाव में हेमंत सोरेन की अगुवाई में झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन 47 सीट हासिल की है। 81 सीटों में जेएमएम को 30, कांग्रेस 16 और आरजेडी एक सीट पर जीत हासिल की हैं। जबकि 3 सीट हासिल करने वाली बाबूलाल मरांडी की झाविमो भी गठबंधन सरकार को समर्थन दे रही है। लेकिन कांग्रेस की इस जीत में कांग्रेस नेता राहुल गांधी का कोई योगदान नही हैं। वहीं बीजेपी को चुनाव में 25 सीट मिली जबकि आजसू को 2 सीटें हासिल हुई है।

भाजपा का सफाया करने के लिए बना था ये गठबंधन
बता दें झारखंड से भाजपा को साफ करने के लिए आरजेडी और कांग्रेस एक साथ आए और उन्हें हेमंत सोरेन को अपना समर्थन दिया। जैसा की सबको पता है कि राजनीति में कुछ नि:स्वार्थ और निष्काम नहीं होता। तो ये अभी से माना जा रहा है कि चले राष्ट्रीय जनता दल हो या फिर कांग्रेस दोनों ही दलों ने झारखंड मुक्ति मोर्चा से इसकी कीमत वसूलने में कोई कसर नहीं छोड़गी। वर्तमान में भले ही कांग्रेस और आरजेडी कुछ बड़ा न कर पाई हों मगर भाजपा को धकेलने के लिए जैसे ये दोनों दल एकजुट हुए हैं।

सोरेन सरकार की ये होगी सबसे पहली चुनौती
गौरतलब है कि नई सरकार कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के तहत काम करने की योजना बनायी है ऐसे में गठबंधन में शामिल कांग्रेस मलाईदार पदों और मंत्रालयों की मांग करना शुरु कर चुकी हैं। बता दें महाराष्ट्र में सरकार बने एक माह हो चुका है लेकिन अभी तक कांग्रेस के साथ बात न बन पाने के कारण मंत्रीमंडल विस्तार नही हो सका हैं। माना जा रहा है कि हेमंत सोरेन के सीएम पद की शपथ लेते ही उनके सामने सबसे बड़ी समस्या मलाईदार पदों और मंत्रालयों के बंटवारें को लेकर होने वाली हैं।
हेमंत के लिए आसान नहीं होगी ये राह
कांग्रेस और आरजीडी यही चाहेंगे कि अच्छे मंत्रालय उन्हीं को मिलें जबकि जेएमएम का भी प्रयास कुछ ऐसा ही होगा कि मलाईदार पद उसके पाले में रहें। इन चीजों के आलवा अगर हेमंत सोरेन का जिक्र हो तो ये कहना कहीं से भी गलत नहीं है कि हेमंत के अन्दर सत्ता की जबरदस्त भूख है। ये भूख उनमें इस हद तक है कि अगर चीजें सही समय पर मैनेज न होतीं तो इस शर्त पर कि मुख्यमंत्री वही बनेंगे हेमंत सोरेन भाजपा तक के साथ गठबंधन कर सकते थे।

सोरेन के लिए सबको खुश करना टेढ़ी खीर होगा
बता दें हेमंत सोरेन एक ऐसे नेता हैं जिन्हें मौका भुनाना खूब अच्छे से आता है। चाहे भाजपा के साथ जेएमएम का गठबंधन रहा हो या फिर इनका कांग्रेस के साथ आना रहा हो, वह राजनीति में बिछाई हुई हर चाल का हमेशा ही हेमंत सोरेन को फायदा हुआ है और कई मौके ऐसे भी आए हैं जब उन्होंने ये साबित किया है कि वो राजनीति में बड़ी पारी खेलेंगे। बहरहाल, विषय नई सरकार में हेमंत सोरेन की चुनौतियां हैं। तो सोरेन गठबंधन के साथियों को कितना खुश कर पाएंगे इस सवाल का जवाब हमें वक़्त देगा. लेकिन जो वर्तमान है और जैसा सत्ता संघर्ष हम पूर्व में कर्नाटक फिर महाराष्ट्र में देख चुके हैं महसूस होता है कि हेमंत सोरेन और उनके दल के लिए सबको राजी ख़ुशी रखना एक टेढ़ी खीर होने वाला है।

कांग्रेस कर रही ये मांग
गौरतलब है कि हेमंत सरकार में कैबिनेट गठन की कवायद भी दो दिन पूर्व शुरु हो चुकी हैं। इस स्वरूप को लेकर गुरुवार को भी गठबंधन के प्रमुख नेताओं के बीच बैठकें हुई। इस दौरान कांग्रेस द्वारा पांच मंत्री पद मांगने की बात सामने आई है। इसके अलावा कांग्रेस ने विधानसभा अध्यक्ष का पद भी मांगा है। हालांकि अभी राज्य के भावी मंत्रिपरिषद में झामुमो और कांग्रेस के बीच हिस्सेदारी तय नहीं हो पाई है। दोनों दलों के बड़े नेताओं पर इस मसले को 28 दिसंबर की शाम तक सुलझाने का दबाव है।
कांग्रेस को 5 मंत्री पद नहीं देना चाहते हेमंत
झामुमो विधानसभाध्यक्ष का पद कांग्रेस को देने के लिए तैयार है। कांग्रेस के खाते में पांच मंत्री देना झामुमो को थोड़़ा ज्यादा लग रहा है। कांग्रेस को कैबिनेट में सात सदस्य झामुओ को देने पर कोई आपत्ति नहीं है। परंतु, पांच सदस्य कांग्रेस के लिए तय करने पर नेतृत्व अड़ा है। राजद को कांग्रेस मंत्री पद नहीं देना चाहती है। कांग्रेस नेतृत्व राजद को बोर्ड या निगम के चेयरमैन का पद देने के सुझाव दे रही है। वहीं झामुमो नेतृत्व का मानना है कि कैबिनेट की सात सीट उसके खाते में मिले। चार सीट कांग्रेस के जिम्मे रहे। एक सीट पर पर हेमंत सोरेन की मर्जी से खुला विकल्प रहे। ताकि तात्कालिक परिस्थितियों के हिसाब से इस पर राजद विधायक या किसी निर्दलीय को बैठाया जा सके।
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