Jharkhand: सोरेन परिवार पर मंडराता राजनीतिक संकट
Jharkhand: भारतीय जनता पार्टी की सशक्त तैयारी और पारिवारिक अंतर्कलह के कारण आगामी लोकसभा चुनाव झारखंड की फर्स्ट फैमिली कहे जाने वाले शिबू सोरेन परिवार के राजनीतिक वर्चस्व का अंत संभव दिखने लगा है।
झारखंड राज्य बनने के 24 साल बाद पहली बार इस परिवार के वर्चस्व पर संकट मंडरा रहा है। दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने अपने आप को समेट लिया है और जिस बेटे के हाथ में उन्होंने कमान सौंपी थी, वह अभी जेल में है। इसके कारण परिवार में भी सब अपना अपना विकल्प तलाश रहे हैं।

बड़ी बहू और विधायक सीता सोरेन को भाजपा ने परिवार की पारंपरिक दुमका लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतार दिया है। जबकि छोटी बहू कल्पना सोरेन गांडेय विधानसभा सीट से झामुमो के टिकट पर ही मैदान में है। गिरिडीह की गांडेय विधानसभा सीट पर उपचुनाव में स्थानीय बनाम बाहरी बड़ा मुद्दा बन गया है। कल्पना सोरेन पहली बार यहां से चुनावी मैदान में उतरी हैं। यहां से उनकी जीत या हार ही तय करेगी कि प्रदेश की राजनीति में हेमंत सोरेन बचे रह पाते हैं या नहीं।
भावी मुख्यमंत्री की चाह रखने वाली कल्पना सोरेन के खिलाफ भाजपा ने स्थानीय समर्थन वाले नेता दिलीप वर्मा को उतार रखा है। जबकि 25 फीसदी अल्पसंख्यक आबादी वाले इस सीट को विधायक सरफराज अहमद से इस्तीफे दिलवा कर बड़ी उम्मीद के साथ खाली कराया गया है। बीते साल के आखिरी दिन विधायकी से इस्तीफा देने वाले सरफराज अहमद अब राजनीतिक सौदे के तहत झामुमो के राज्यसभा सदस्य हो गए हैं।
प्रदेश विधानसभा की अनारक्षित इस सीट पर पहली बार कोई बड़ा आदिवासी नेता गंभीरता के साथ अपना भाग्य आजमा रहा है। जनजाति समाज से आने वाली कल्पना सोरेन मूलतः पड़ोसी राज्य ओडिशा से हैं। लिहाजा झारखंड में जनजातियों के लिए आरक्षित सीट पर उनकी दावेदारी नहीं बनती है। राजनीति में बने रहने के लिए आगे भी उनको गैर अनारक्षित सीट से ही चुनाव लड़ना होगा।
भाजपा ने 2019 में प्रदेश कांग्रेस से एकमात्र लोकसभा चुनाव जीतने वाली गीता कोड़ा को दलबदल करा चाईबासा से अपना उम्मीदवार बनाया है। गीता कोड़ा भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर बहुचर्चित मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा की पत्नी और राजनीतिक वारिस हैं।
इस उलटफेर से सकते में आए इंडिया गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर मचा घमासान टलने का नाम नहीं ले रहा। झामुमो ने चाइबासा सीट पर कांग्रेस की दावेदारी को दरकिनार कर इलाके की पुरानी नेता जोबा मांझी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। इसी तरह झामुमो की पारंपरिक सीट राजमहल से हेमंत सोरेन को लोकसभा पहुंचाने का इरादा छोड़ देना पड़ा।
पूर्व मुख्यमंत्री और झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन 31 जनवरी से जेल में हैं। तब से उनको एक नहीं दो मोर्चों पर भीषण लड़ाई करनी पड़ रही है। एक मोर्चे पर उनके सामने जाना पहचाना प्रतिद्वंदी भाजपा है। हेमंत ने शुरुआती राजनीतिक सफर भाजपा के सहयोग से ही तय किया है।
2009 में पहली बार विधायक होने के साथ ही मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में उन्होंने उप मुख्यमंत्री बनकर विशद राजनीतिक अनुभव लिया। फिर परिपक्व होते ही उन्होंने एनडीए विरोधी राजनीति की राह थाम ली। उस पर चलकर न सिर्फ मुख्यमंत्री होने के सपने को साकार किया, बल्कि परिवार में पिता शिबू सोरेन के वास्तविक राजनीतिक वारिस होने की झलक पेश करने में सफल रहे। इसमें कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल उनका सहारा बनी रही।
कहते हैं कि बाहर से ज्यादा मुश्किल घर के अंदर की लड़ाई होती है, तो पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का दूसरा मोर्चा परिवार के अंदर विरासत को लेकर जारी लड़ाई है। इसमें उनकी आधी जीत तो भाजपा ने मौजूदा चुनाव में उनकी भाभी और झामुमो की विधायक सीता सोरेन को दुमका लोकसभा से उम्मीदवार बनाकर कर दी है।
इससे शिबू सोरेन परिवार के अंदर सीता सोरेन के वर्चस्व की उम्मीद स्वतः खत्म हो गई है जबकि विधायक भाई बसंत सोरेन की पिता शिबू सोरेन की राजनीतिक विरासत पर दावेदारी में हिस्सेदारी की नौबत अब भी बनी हुई है। 4 जून को लोकसभा चुनाव परिणाम के साथ गांडेय उपचुनाव के नतीजे भी आने हैं। अगर उसमें जीत हासिल कर हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन राजनीति में स्थापित हो जाती हैं तो विरासत की लड़ाई फिलहाल थम जाएगी।
सबको पता है कि मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद से तात्कालिक व्यवस्था के तौर पर हेमंत सोरेन ने झामुमो के बुजुर्ग नेता चंपई सोरेन को मुख्यमंत्री बना रखा है। उनका असली मकसद चार जून के बाद कल्पना सोरेन के सिर मुख्यमंत्री का ताज सजाना है। क्योंकि एक के बाद एक भ्रष्टाचार के अनेक मामलों की जांच में फंसे हेमंत का निकट भविष्य में बाहर आना मुश्किल लग रहा है।
भ्रष्टाचार में फंसे झामुमो नेता हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी से पहले इस्तीफा देने के फ़ैसले पर पार्टी के अंदर सवाल उठ रहे हैं। पार्टी के भीतर नेताओं का कहना है कि उस हड़बड़ी से बचा जा सकता था। खासकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जिस तरह जेल में रहकर ही सरकार चलाने की मिसाल बना रहे हैं। वह मंहगी वकील व्यवस्था से घिरे झामुमो को भी करना चाहिए था।
हेमंत समर्थक धड़ा यह भी मानता है कि जेल जाने से पहले इस्तीफा के साथ ही हेमंत सोरेन अगर अपने सामने कल्पना सोरेन को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवा गए होते तो झामुमो के लिए मौजूदा संकट कम होता। भविष्य की राजनीति में वह आसानी से बने रहते, अगर वह भी राजद प्रमुख लालू प्रसाद के 1997 में राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाने जैसा फैसला कर गए होते।
लेकिन हेमंत सोरेन ऐसा कुछ नहीं कर पाये। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के केस में वो जेल में हैं और बाहर उनके पार्टी की कलह सतह पर है। इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलता दिख रहा है। यह भी संभव है कि इस बार भाजपा प्रदेश की सभी 14 लोकसभा सीटों पर अपना परचम फहरा दे। फिलहाल सोरेन परिवार राज्य की सरकार बचाने और चलाने की जुगत भिड़ाने में लगा हुआ है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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