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औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर करने की मांग पर बढ़ा विवाद, जानिए क्या है इतिहास

By ओंकार करंबेलकर

औरंगाबाद या संभाजीनगर
Getty Images
औरंगाबाद या संभाजीनगर

"इस धरती ने इतना ज़्यादा विनाश देखा है. इसकी देह असंख्य घावों से छिदी हुई है. फिर भी हैदराबाद बेजोड़ है." हैदराबाद के बारे में ये लाइनें राघवेंद्र आलमपुरी की हैं. आप इसमें हैदराबाद की जगह औरंगाबाद को रख सकते हैं. बाकी सब कुछ एक जैसा है.

हैदराबाद और औरंगाबाद में कई चीजें समान हैं. दोनों शहर अपने बहुरंगी सांस्कृतिक लोकाचार के लिए जाने जाते हैं.

एक वक़्त में औरंगाबाद दक्कन में सत्ता का केंद्र था. यह कई साम्राज्यों की राजधानी रह चुका है.

जब निज़ाम ने अपने शासन की नींव रखी, तो औरंगाबाद को काफ़ी अहमियत मिली. हालांकि निज़ाम की राजधानी तो हैदराबाद ही थी, लेकिन औरंगाबाद का सम्मान उप-राजधानी के तौर पर बरक़रार रहा.

चूंकि निज़ाम के शासन में यह उनके राज्य की सरहद पर मौजूद सबसे बड़ा और अहम शहर था, इसलिए इसका दर्जा भी ख़ास था.

लेकिन आज हैदराबाद और औरंगाबाद, दोनों एक बार फिर सुर्खियों में हैं. हैदराबाद का नाम 'भाग्यनगर' और औरंगाबाद का नाम 'संभाजीनगर' करने की माँग की जा रही है.

लव औरंगाबाद
@AIRNEWS_PUNE
लव औरंगाबाद

'लव औरगांबाद' और 'सुपर संभाजीनगर'

औरंगाबाद सिटी और औरंगाबाद ज़िले का नया नाम रखने पर बहस जब-तब उठ खड़ी होती है.

हाल में औरंगाबाद शहर में 'लव औरंगाबाद' और 'सुपर संभाजीनगर' लिखे साइन-बोर्ड जगह-जगह देखने को मिले.

इसने शहर के नाम को लेकर होने वाले विवाद को एक बार फिर हवा दी और इसमें कई राजनीतिक पार्टियाँ कूद पड़ीं.

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का कहना है कि 'शिवसेना कई सालों से औरंगाबाद का नाम बदलने की माँग करती रही है. राज्य में अब शिवसेना सत्ता में है, लिहाज़ा उसे अब इस शहर का नाम संभाजीनगर कर यह माँग पूरी करनी चाहिए.'

दूसरी ओर कांग्रेस ने यह साफ़ कर दिया है कि 'वह शहर का नया नाम रखने के किसी भी क़दम का पुरज़ोर विरोध करेगी.'

इस मामले पर गठबंधन सरकार चला रहीं - कांग्रेस और शिवसेना में मतभेद है. मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा है कि 'गठबंधन सरकार धर्मनिरपेक्षता के एजेंडे पर काम कर रही है और मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब इस खांचे में फिट नहीं बैठते. वे धर्मनिरपेक्ष नहीं थे.'

ठाकरे ने अपने हाल के बयानों में लगातार औरंगाबाद को 'संभाजीनगर' कहा है जिससे कांग्रेस पार्टी को आपत्ति है.

कांग्रेस पार्टी का कहना है कि 'यह मुद्दा गठबंधन सरकार के लिए प्राथमिकता का नहीं है. इस पर चर्चा की जा सकती है. लेकिन कांग्रेस पार्टी नाम बदलने की राजनीति के ख़िलाफ़ है जिससे समाज में दरार पैदा होने की संभावना है.' हालांकि, कांग्रेस पार्टी ने यह भी स्पष्ट किया है कि उन्हें संभाजी महाराज से कोई आपत्ति नहीं है.

महाराष्ट्र नव-निर्माण सेना ने औरंगाबाद का नाम बदलने के लिए चल रहे अभियानों का समर्थन किया है.

शिवसेना ने अपने मुखपत्र 'सामना' में भी इसे लेकर अपना रुख़ साफ़ किया है. सामना के संपादकीय में लिखा है, 'बालासाहेब ठाकरे ने औरंगाबाद का नाम 'संभाजीनगर' कर दिया था और लोगों ने इसे स्वीकार कर लिया था.'

लेकिन औरंगाबाद अक्सर स्थानीय राजनीति की वजह से सुर्खियों में रहा है. अगर हम शहरी चुनाव क्षेत्र को देखें तो यह साफ़ हो जाता है कि क्यों राजनीतिक पार्टियाँ इसे इतनी अहमियत दे रही हैं. क्यों बार-बार इस शहर के नाम का मुद्दा सामने आ जाता है.

दरअसल, औरंगाबाद में सबसे ज़्यादा हिन्दुओं की आबादी है, लेकिन मुस्लिम आबादी भी कम नहीं है.

शायद यही वजह है कि राजनीतिक मक़सद से इसका नाम बदलने का मुद्दा ज़ोर-शोर से उछाला जाता रहा है.

राजतदाग से औरंगाबाद तक

औरंगाबाद में रह रहीं रिटायर्ड प्रोफ़ेसर और इतिहास की स्कॉलर दुलारी क़ुरैशी कहती हैं, ''आमतौर पर औरंगाबाद का ज्ञात इतिहास सिर्फ़ यादव वंश तक ही सीमित रहा है लेकिन यहाँ सातवाहन काल के समय के भी प्रमाण हैं."

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा कि 'कन्हेरी की गुफ़ाओं में जो अभिलेख हैं, उनमें सातवाहनों ने औरंगाबाद का उल्लेख राजतदाग के तौर पर किया है. ये गुफाएं औरंगाबाद यूनिवर्सिटी (डॉक्टर बाबा साहेब आंबेडकर मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी, औरंगाबाद) में हैं. दरअसल, ये एक व्यापार मार्ग पर बसा अहम केंद्र था. यह व्यापारिक रूट उज्जैन-महिष्मति-बुरहानपुर-अजंता-भोकारदन-राजतदाग-प्रतिष्ठान-टेर से होकर गुजरता था.'

औरंगाबाद या संभाजीनगर
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औरंगाबाद या संभाजीनगर

यादव वंश के शासन के दौरान देवगिरी यानी दौलताबाद एक प्रमुख जगह बन गई थी. बाद में अलाउद्दीन ख़िलजी ने दौलताबाद के क़िले पर अपना आधिपत्य जमा लिया था.

1327 में मोहम्मद बिन तुगलक ने यह फ़रमान जारी किया कि राजधानी दिल्ली को दौलताबाद ले जाया जाये. बड़ी तादाद में लोग इधर से उधर हुए. लेकिन 1334 में उसका मन बदल गया और उसने दिल्ली को ही राजधानी रखने का फ़ैसला किया.

1499 में दौलताबाद अहमदनगर की निज़ामशाही के नियंत्रण में आ गया. अगले 137 साल दौलताबाद निज़ाम के ही कब्जे में रहा.

तुगलकशाही के दौरान दौलताबाद में निर्माण कार्य

चूंकि मोहम्मद बिन तुगलक अपनी राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद ले जाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने रास्ते में कई जगहों पर सराय, कुएं और मस्जिदें बनवाईं. ऐसी ही एक जगह थी औरंगाबाद.

दुलारी क़ुरैशी कहती हैं कि तुगलक ने औरंगाबाद में एक जगह पर एक मस्जिद, कुआँ और सराय बनवाई थी. आज उस जगह को 'जूना बाज़ार' कहा जाता है.

उन्होंने बताया, "पहले इसे जौना बाज़ार कहा जाता था, क्योंकि मोहम्मद बिन तुगलक का एक नाम जौना ख़ान भी था. यही 'जौना बाज़ार' अब 'जूना बाज़ार' हो गया है."

औरंगाबाद या संभाजीनगर
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औरंगाबाद या संभाजीनगर

खडकी और चिकलठाणा

मलिक अंबर अहमदनगर के निज़ाम के प्रधानमंत्री और सेनापति थे. उन्होंने चिकलठाणा की लड़ाई में मुग़लों को हराया था.

मलिक अंबर को यह जगह काफ़ी पसंद थी. उन्होंने यहाँ खडकी गाँव को विकसित करने का फै़सला किया और इस पर औरंगाबाद शहर की पहली नींव पड़ी.

मलिक अंबर ने यहाँ सड़कें, पुल और जलापूर्ति के लिए नहरें बनवाईं. उन्होंने नौखंडा जैसे महल भी बनवाये.

उन्होंने पुर्तगालियों के लिए एक गिरजाघर भी बनवाया (मलिक अंबर जंजीरा में अपने प्रशासनिक काम के दौरान पुर्तगालियों के संपर्क में आये थे).

तुगलकाबाद किला, दिल्ली
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तुगलकाबाद किला, दिल्ली

विध्वंस के बावजूद वजूद बरक़रार

मुग़ल बादशाह जहांगीर ने खडकी पर 1616 में हमला किया और शहर को तहस-नहस कर दिया.

बादशाह की फ़ौजों ने इतनी तबाही मचाई कि इस शहर को होश में आने में कई दशक लग गये. मलिक अंबर ने इसे फिर से खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन 1626 में उनका निधन हो गया.

मलिक अंबर
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मलिक अंबर

फ़तेहनगर से खुजिस्ता बुनियाद तक

कुछ वर्षों के बाद मलिक अंबर के बेटे फ़तेह ख़ान कुछ वक्त के लिए खडकी आये.

इतिहास के स्कॉलर पुष्कर सोहनी कहते हैं, "उन्होंने इस शहर का नया नाम रखा - फ़तेहनगर. लेकिन मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने 1636 में औरंगजे़ब को दक्कन का सूबेदार बना दिया. उस समय इस शहर को दोबारा नाम दिया गया - खुजिस्ता बुनियाद."

1657 के बाद खुजिस्ता बुनियाद का नाम औरंगाबाद पड़ गया. मुग़ल इतिहास में औरंगाबाद भी लाहौर, दिल्ली और बुरहानपुर जितना ही महत्वपूर्ण है.

औरंगजे़ब का पसंदीदा शहर

शुरू में कुछ समय तक औरंगजे़ब दौलताबाद में रहे लेकिन बाद में वह खुजिस्ता बुनियाद चले गए.

उन्हें यह जगह पसंद आ गई इसलिए वहाँ रहने के लिए बड़ी तादाद में कॉलोनियां बसाई गईं. शहर में बावनपुरा बसाये गए. इसकी किलेबंदी की गई. बाद में इसे दक्कन की राजधानी बनने का गौरव हासिल हुआ. मलिक अंबर की तरह ही औरंगजेब ने भी 11 नहरें बनवाईं.

दुलारी क़ुरैशी बताती हैं कि कई यात्रियों ने इस शहर की सुंदरता का वर्णन किया है.

उन्होंने कहा, "औरंगाबाद का वर्णन एक ऐसे शहर के तौर पर किया गया है जहाँ की हवा ख़ुशबू से भरी है, जहाँ का पानी अमृत जैसा है. औरंगजे़ब 1681 में यहाँ आये और फिर उन्होंने कभी भी दक्कन को नहीं छोड़ा. बादशाह औरंगजे़ब ने यहाँ ख़ुलताबाद मे अपने लिए एक सादा सा मक़बरा बनाने और उसके ऊपर तुलसी का पौधा लगाने के लिए कहा था."

बादशाह जहांगीर
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बादशाह जहांगीर

आसफ़जाही शासन

औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुग़ल शासन दक्कन में फिर कभी पहले जैसा ताकतवर नहीं बन सका.

यहाँ सूबेदार बनकर आये निज़ाम आसफ़जाह अव्वल ने मुग़लों के ख़िलाफ़ बगावत कर दी और अपना शासन स्थापित कर लिया. लेकिन उनके भी राज्य की राजधानी औरंगाबाद ही रही.

तीसरे निज़ाम ने 1761 में हैदराबाद में अपनी राजधानी स्थापित की. तब तक औरंगाबाद कई बादशाहों की राजधानी बनी रही थी.

हैदराबाद भले ही नई राजधानी बन गई हो लेकिन औरंगाबाद को उप-राजधानी का सम्मान मिलता रहा.

1948 में जब हैदराबाद राज्य का भारत में विलय हो गया, तो औरंगाबाद के साथ ही मराठवाड़ा का इलाका भी भारतीय संघ का हिस्सा हो गया.

बादशहा औरंगजेब
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बादशहा औरंगजेब

औरंगाबाद को संभाजीनगर बनाने की कोशिश कब शुरू हुई?

1988 में औरंगाबाद नगरपालिका के चुनाव में शिवसेना को 27 सीटों पर जीत हासिल हुई थीं. इसके बाद बाला साहेब ठाकरे ने सांस्कृतिक मण्डल ग्राउंड में एक विजय रैली को संबोधित किया. इसी रैली में उन्होंने ऐलान किया कि औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर रखा जाएगा.

इसके बाद शिवसेना कार्यकर्ता आज भी औरंगाबाद को संभाजीनगर ही कहते हैं. शिवसेना के मुख-पत्र में भी इसे संभाजीनगर ही लिखा जाता है.

हर बार नगरपालिका चुनाव में औरंगाबाद का नाम बदलने का मामला उठता है और यह चुनावी मुद्दा बन जाता है.

पहले शिवसेना-बीजेपी सरकार के दौरान मिली मंज़ूरी

दरअसल, 1995 में औरंगाबाद नगरपालिका की एक बैठक में औरंगाबाद को संभाजीनगर करने का प्रस्ताव पारित किया गया था.

इसके बाद इसे राज्य सरकार के पास भेजा गया. 1995 में महाराष्ट्र में शिवसेना-बीजेपी गठबंधन की सरकार थी.

उस वक़्त पूर्व सांसद चंद्रकात खैरे औरंगाबाद के अभिभावक मंत्री थे. विधानसभा के पूर्व स्पीकर हरिभाऊ बागड़े जालना ज़िले के अभिभावक मंत्री थे.

उन्होंने कैबिनेट की बैठक में औरंगाबाद का नया नाम रखने का प्रस्ताव रखा था, जिसे मंज़ूर कर लिया गया.

चंद्रकांत खैरे ने बीबीसी मराठी से पहले की एक बातचीत में कहा था, "जब 1995 में शिवसेना-बीजेपी गठबंधन की सरकार थी, तो औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर करने के प्रस्ताव को कैबिनेट ने मंज़ूर कर लिया था. हमने इसका नाम संभाजीनगर कर दिया था. लेकिन किसी ने कोर्ट में अपील कर दी. हाई कोर्ट ने हमारे पक्ष में फ़ैसला दिया. सुप्रीम कोर्ट ने भी हमारे पक्ष में फ़ैसला दिया. लेकिन इस बीच हमारा गठबंधन चुनाव हार गया और औरंगाबाद को संभाजीनगर करने का मामला लटक गया."

खैरे से जब हमने पूछा कि औरंगाबाद शहर का नाम संभाजीनगर क्यों रखा जाये? तो उन्होंने कहा कि इसका नाम औरंगज़ेब जैसे 'तानाशाह' शासक के तौर पर नहीं रखा जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, "एक समय में इस शहर का नाम खडकी था. औरंगज़ेब ने इसका नाम बदलकर औरंगाबाद कर दिया. औरंगज़ेब ने संभाजी महाराज को सोनेरी महल में चार महीने तक क़ैद करके रखा था. उनके ख़िलाफ़ यहाँ मुक़दमा चला. वह हमारे लिए काफ़ी महत्वपूर्ण हैं. इसलिए हम इसका नाम संभाजीनगर रखना चाहते हैं."

1996 में शिवसेना-बीजेपी कैबिनेट ने संभाजीनगर नाम को मंज़ूरी दे दी थी. लेकिन तब औरंगाबाद नगरपालिका के पार्षद मुश्ताक़ अहमद ने अदालतों में इस फ़ैसले को चुनौती दी थी. 2018 में मुश्ताक़ अहमद ने इस बारे में बीबीसी मराठी से बात की थी.

उन्होंने कहा था, "1996 में तत्कालीन राज्य सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर कहा था कि औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर करने के बारे में अगर कोई व्यक्ति सुझाव या आपत्ति दर्ज कराना चाहता है तो करा सकता है. हमने इस अधिसूचना में नाम बदलने के फ़ैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में अपील दायर की. लेकिन कोर्ट ने यह कहकर याचिका ठुकरा दी कि मामला अभी अधिसूचना तक ही सीमित है. अपील प्री-मैच्योर है."

मुश्ताक कहते हैं, "हमने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. सुप्रीम कोर्ट ने याचिका मंज़ूर कर ली और राज्य सरकार को लताड़ लगाई. एक जज ने राज्य सरकार को यह कहते हुए झिड़का कि शहरों के नाम बदलने के बजाय उनके विकास पर ध्यान देना चाहिए. लेकिन आगे की सुनवाई से पहले राज्य में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की सरकार आ गई. मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर करने की अधिसूचना रद्द कर दी. इससे सुप्रीम कोर्ट में दायर हमारी याचिका स्वाभविक तौर पर ख़ारिज हो गई."

BBC Hindi
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English summary
Controversy over demand for renaming Aurangabad to Sambhajinagar, know what is history
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