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कब बदलेगी मुस्लिमों कि तकदीर?

By उत्कर्ष कुमार सिन्हा
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    Muslim
    आज़ादी के 6 दशक के बाद भारतीय मुसलमानों के हालात बदलते नहीं दीखते. तमाम राजनितिक पार्टिया मुस्लिम वोते बैंक पर तो आँख लगाये रहती हैं पर दरअसल इस समाज के असली हालत पर किसी ने कोई पहेल नहीं की.

    सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के बाद सियासी गलियारों में मुसलमानों के ऊपर राजनीती तो तेज हो गयी पर मुसलमानों के हालत कब सुधरेंगे ये देखना अभी बाकी है. अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी एक्शन ऐड द्वारा उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की स्थिति पर किये गए शोध "मुस्लिम्स इन ग्रोविंग इकोनोमी" के नतीजे हालत की विकटता को साफ़ परिलक्षित कर रहे है. एक्शन ऐड उत्तर प्रदेश के कार्यक्रम समन्वयक देबब्रत पत्रा बताते है कि इस सुर्वे का उद्देश्य यही था कि उत्तर प्रदेश के मुसलमानों कि वास्तविक हालत पर एक दृष्टी विक्सित हो सके.

    उत्तर प्रदेश के 12 जिलों में किये गया यह शोध कार्य मुसलमानों की स्थिति पर समग्र द्रिस्ती डालता है. शोध के मुताबिक अल्पसंख्यकों के विकास के आकडों में मुस्लमान काफी पीछे है. सच्चर कमेटी की रेपोर्ट में जो स्थिति बयां की गयी है. दरअसल उत्तर प्रदेश में स्थिस्ती उससे भी खराब है. उत्तर प्रदेश की कुल जनसँख्या का 19 प्रतिशत मुस्लिम हैं और यह आबादी सांप्रदायिक भेदभाव और पहचान के संकट से जूझ रही है.

    आकडे बताते हैं की 22 प्रतिशत आबादी के पास राशन कार्ड ही नहीं है और बड़े वोट बैंक के रूप में पहचाने जाने वाले मुसलमानों में 23 प्रतिशत के पास ग्रामीण क्षत्रों में और 31 प्रतिशत के पास शहरी क्षेत्रों में वोटर कार्ड ही नहीं हैं. बैंको के जरिये विकास के सरकारी प्रयासों की सफलता तब संदिग्ध हो जाती है जब इस समुदाय के सिर्फ 30 प्रतिशत लोगो के पास बैंक में खाते की बात सामने आती है.

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    शोध के मुताबिक उत्तर प्रदेश के 80.02 प्रतिशत मुस्लमान रोजाना 11 रुपये से कम में अपनी जिंदगी चलने को मजबूर हैं. उत्तर प्रदेश में सरकारी या निजी क्षेत्र की नौकरियों में सिर्फ 6.81 प्रतिशत मुस्लमान हैं जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह 13 प्रतिशत है. उत्तर प्रदेश का 60 प्रतिशत मुस्लमान दैनिक मजदूरी कर रहा है. जबकि 27 प्रतिशत स्वयं के व्यवसाय में लगे है और कर्जा लेने में होने वाली दिक्कतों के कारन वह अब अपने पारंपरिक पेशों से भी दूर हो रहे है.

    वैश्वीकरण के इस दौर में बन रही पूंजीवादी नीतियों और बड़ी कंपनियों को प्रोत्साहन देने कि सरकारी प्राथमिकताओं ने खुले बाज़ार कि प्रतिस्पर्धा में मुसलमानों को काफी पीछे कर दिया है. परिणामस्वरुप मुस्लिम बिरादरी का हुनरमंद तबका भी प्रभावित हुआ है. मुस्लमान अपने पारंपरिक पेशों से दूर हो रहे हैं. शोध के नतीजे बताते हैं की पिछले दस वर्षों में 36 प्रतिशत मुस्लमान अपने पारंपरिक पेशो जैसे जरदोजी या हाथ के अन्य हुनरमंद पेशो से दूर हुए हैं. 13 प्रतिशत मुस्लिम आबादी ऐसे कारोबार के जरिये जिंदगी चला रही है जिसमे कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है.नतीजतन ग्रामीण इलाको के 40 पर्तिशत लोग पलायन कर गए हैं. जिसमें 94 प्रतिशत के पलायन की वजह आर्थिक है.

    मुस्लिम समुदाय के किसानो कि भी समस्याएँ भी कम नहीं हैं. खेती किसानी में लगे मुसलमानों को क्रेडिट कार्ड की सुविधायें भी नहीं मिल पा रही हैं. कुल खेतिहर मुसलमानों में सिर्फ 44 फीसद ही किसान क्रेडिट कार्ड का लाभ ले पा रहे हैं. जबकि कुल मुसलमानों का 13 प्रतिशत खेती पर निर्भर करता है. मुसलमानों के पास खेती की अपनी जमीन भी पर्याप्त नहीं है. 55 प्रतिशत खेतिहर मुस्लिम भूमिहीन है जबकि 14 प्रतिशत के पास 1 बीघे से भी कम जमीन है.

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    मुस्लिमों के रिहाइश में भी बड़ी समस्याएं हैं. सामान्य मुस्लिम आबादी बुनियादी सुविधाओं कि कमी से जूझ रही है. स्वच्छ जल और शौचालय सुबिधायें अभी भी बड़ी आबादी के पहुँच में नहीं हैं. शोध के नतीजे बताते हैं कि 60 प्रतिशत आबादी के पास अपने घर में पीने के पानी का कोई स्रोत नहीं है. और 56 प्रतिशत के पास शौचालय नहीं है.

    शिक्षा के सम्बन्ध में यह माना जाता है कि इस समुदाय के लोग अपने बच्चों को मुख्या धरा के स्चूलों में नहीं डालना चाहते हैं और यह भी माना जाता है की गरीब मुस्लिम मदरसों में ही अपने बच्चों को पढाना चाहता है पर शोध के नतीजे कुछ और ही कहानी कहते है. 4 प्रतिशत मुसलमान ये मानता है की सरकारी स्कूल में उसके साथ सांप्रदायिक भेदभाव होता है. और आम तौर पर शिक्षकों का व्यवहार भी ऐसाही होता है. शिक्षा के अलावा भी यह भेदभाव उन्हें डराता है.

    सामान्यतया 37 प्रतिशत का मानना है की सामान्य स्कूलों में उन्हें सांप्रदायिक भेदभाव का सामना करना पडता है. बहुलतावादी भारतीय समाज में एक तबके में इस तरह के नतीजे देश कि मनोस्थिति पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर देते हैं. गोरखपुर विश्वविद्यालय में समाजशात्र के प्रवक्ता डा. शफीक अहमद का मानना है कि यह भेदभाव सरकारी योजनाओं के लाभ मिलाने में और काम मिलाने में भी उन्हें महसूस होता है. खास तौर से कार्य स्थल पर, किराये के माकन मिलाने में और पुलिस का सामना होने में ये उपेक्षा सबसे ज्यादा सालती है.

    हालिया दिनों में आतंक वाद के नाम पर जिस तरह मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है उसने भी इस तबके का आत्मविश्वास हिलाया है और सामान्य मुस्लिम इस पीड़ा से बाहर नहीं निकल पा रहा. हालत को देखते हुए अब वक़्त आ गया है कि मुसलमानों पर सियासत से आगे भी कुछ काम हो.

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