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खुद निर्णय लेना सीखें महिलाएं

Women
महिला दिवस यानि खूब गहमा गहमी का दिवस। बस इसे मनाना है। किसी भी सूरत में। चाहे प्रशासन हो। या कोई संगठन। क्लब हो या कोई एनजीओ। सब अपने अपने ढगं से मनाते हैं। इस दिन जबरदस्त भाषण बाजी होती है। महिलाओ को कमजोर बता कर उन्हे आगे आने के लिए उत्साहित किया जाता है। नारी सशकितकरण की याद भी उसी दिन आती है। दावे किए जाते है कि हमारे यहाँ क्रार्यक्रम मे 50 महिलाएं आएंगी तो, कोई कहता है कि हमारे पास 100 आएगी। हैरानी की बात आती भी हैं। उस दिन उनका पूरा समय भी लिया जाता है। कई बार उन्हे खुश करने के लिए उन्‍हें सम्‍मानित किया जाता है।

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महिला दिवस की सुबह मिताली का अपने पति से जम कर झगडा हुआ, क्योकि दिवस मनाने के चक्कर मे जल्दी-जल्दी वो ड्बल रोटी जला बैठी और अंडा कच्चा ही रह गया। पति महोदय बिना कुछ खाए द्फ्तर चले गए। दीपा को महिला दिवस का कही से न्यौता ही नही आया था। इस चक्कर मे घर मे काफी तनाव था। दो बार अपने बेटे की पिटाई कर चुकी थी। और चार बार फोन उठा कर भी देखा, लेकिन कोई कॉल नहीं। वो महिला दिवस को कोसती हुई। बालो मे तेल लगा कर। जैसे ही नहाने घुसी, अचानक फोन बज उठा, नेहा बता रही थी कि कल तो फोन मिला नही। बस अभी आधे घंटे मे क्लब पहुचों, आगे आप समझदार हैं, कि क्या हुआ होगा।

सरकारी दफ्तर मे काम करने वाली कोमल की अलग अलग तीन जगह डयूटी थी। उधर घर पर पति बीमार थे, और लड़की के बोर्ड का पेपर था। उसे सेंटर छोड़ कर आना था। टेंशन के मारे उसका दिमाग घूम रहा था, उपर से दफ्तर से फोन पर फोन आए जा रहे थे, कि जल्दी आओ। ऐसे में वो अपने ही दिवस के बारे में सोच भी नहीं सकती थी। ये कहिए कि उसके पास सोचने का समय ही नहीं था।

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महिला दिवस समारोह में जाने के लिए अमिता समय से पहले तैयार होकर खुद को बार बार शीशे मे निहार रही थी, कि अचानक बाहर से महेमान आ गए। वो भी सपरिवार दो दिन के लिए। उन्‍हें नाश्ता देकर जल्दी आने की बात कह कर वो तुंरत भागी। संगीता के पति का सुझाव था, कि उनकी बेटी के शादी के कार्ड वही प्रोग्राम में बांट दे।

खैर, ऐसे उदाहरण तो बहुत हैं। पर बताने वाली बात यह है कि प्रोग्राम मे सभी महिलाए इतनी खुश हुईं कि जीवन की सारी तकलीफें मानो भूल गई हों। लेकिन सभी के मन में अपने परिवार को लेकर कोई न कोई चिंता फिर भी बनी हुई थी। शायद महिलाओं की यही खासियत उन्‍हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही हैं। घर हो या द्फ्तर और या फिर परिवार। सभी में सही तालमेल रखना अब उनकी आदत में शामिल होता जा रहा है।

जरा सोचिए उन महिलाओं के बारे में जिनका जीवन आज भी घर की चार दीवारी के बीच सिमट कर रह गया है। उन महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए बजाय मंच पर खड़े होकर चिल्ला-चिल्ला दुहाई देने से अच्छा है, कि महिलाओं को अपने घर की चार दिवारी मे परिवार वालो के बीच ही फैसला लेना होगा। वो अपना अच्छा बुरा खुद सोच सकती हैं। हर साल चाहे जितनी भाषण बाजी हो, चाहे जितने दिवस मनाए जाएं, लेकिन महिलाएं तभी सशक्‍त होंगी, जब वो खुद फैसला लेना सीखेंगी।

लेखक परिचय:
मोनिका गुप्‍ता 'जय स्‍वच्‍छता समिति' की अध्‍यक्ष एवं प्रतिभाओं को खोजने वाली संस्‍था 'दोस्‍त' की ऑनरेरी सचिव हैं। एक समाजसेविका होने के साथ-साथ पत्रकार भी हैं। मोनिका गुप्‍ता सामाजिक, शैक्षिक मुद्दों और महिलाओं व बच्‍चों से जुड़े मुद्दों पर लिखती हैं। आप एक अंतर्राष्‍ट्रीय न्‍यूज़ चैनल के लिए काम भी करती हैं। आप चार किताबें लिख चुकी हैं, जिनमें से एक को बाल साहित्‍य पुरस्‍कार भी मिल चुका है। मोनिका गुप्‍ता हरियाणा के सिरसा जिले की रहने वाली हैं।

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