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सऊदी अरब बन रहा है सेकुलर, तो भारत में कट्टरता क्यों?

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भारत में 27 सितंबर की रात को जब आतंकी संगठन पीएफआई पर प्रतिबन्ध लगाया जा रहा था, ठीक उसी समय सऊदी अरब में प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को देश का अगला प्रधानमंत्री घोषित कर दिया गया। आप कह सकते हैं कि सुल्तान ने अपने बेटे को प्रधानमंत्री बना दिया तो इसमें क्या बड़ी बात हुई? जी नहीं, प्रिंस सलमान के पीएम बनने से अब सऊदी अरब में बदलाव की हवा बहेगी। वो आधुनिक विचारधारा के पढ़े लिखे इंसान हैं जो सऊदी अरब को रुढिवादी बेड़ियों से बाहर निकालने का प्रयास कर रहे हैं।

Saudi Arabia turning secular but radicals harm India

प्रिंस सलमान अपना इरादा जता चुके हैं कि वह 2030 तक सऊदी अरब से मजहबी कट्टरता को उखाड़ फेंकेंगे। वह सऊदी अरब को हर धर्म को मानने वाले के लिए सहिष्णु बनाना चाहते हैं। यानि वह उस देश को सेक्युलर बनाना चाहते हैं जहां इस्लाम का जन्म हुआ जबकि कट्टरपंथी 2047 तक भारत को इस्लामिक स्टेट बनाना चाहते हैं। वे यहाँ के सेक्युलर संविधान को समाप्त कर शरिया लागू करना चाहते हैं, और भारत के तथाकथित सेक्युलर और लिबरल उन कट्टरपंथियों का समर्थन कर रहे हैं।

पीएफआई पर बैन का सिर्फ असदुद्दीन ओवैसी ने विरोध नहीं किया, सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने भी विरोध किया। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह और राजद के लालू यादव ने तो पीएफआई के साथ आरएसएस पर भी प्रतिबन्ध लगाने की मांग की है। भारत के सेक्युलर राजनीतिज्ञों की सोच भी किसी न किसी तरह मजहबी कट्टरता के प्रति नर्म रवैया रखती है। वे एक राष्ट्रवादी संगठन की देशद्रोही संगठनों से तुलना करने में जरा भी परहेज नही करते। इसीलिए केरल में पिछले 16 साल में कम्युनिस्ट और कांग्रेस सरकारों की सरपरस्ती में पीएफआई इतना फला फूला।

उधर सऊदी अरब में बदलाव की बयार बह रही है। नए प्रधानमंत्री प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का मानना है कि सऊदी अरब की पहचान एक कट्टर मजहबी देश के तौर पर नहीं, बल्कि एक उदार देश के तौर पर होनी चाहिए जहां हर धर्म और हर संप्रदाय को एक नजर से देखा जाता हो और किसी के ऊपर कोई मजहबी पाबंदी ना हो। लिहाजा क्राउन प्रिंस मोहम्मद ने मजहबी कट्टरता के खिलाफ बेहद सख्त मुहिम चला रखी है।

इसलिए उनका सऊदी अरब का प्रधानमंत्री बनना इस्लामिक दुनिया में बड़े बदलाव का संदेश लेकर आया है। इसके संकेत पिछले साल ही मिल गए थे, जब दिसंबर में क्राउन प्रिंस ने कट्टरवादी संगठन तबलीगी जमात को "आतंक का दरवाजा" करार देते हुए प्रतिबंधित कर दिया था। जबकि भारत, जहां से तबलीगी जमात शुरू हुई थी, अब तक जमात को प्रतिबंधित नहीं कर सका है। ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ राजनीतिक दल उसका समर्थन करते हैं। कोरोना काल में जब तबलीगी जमात ने अपना कैम्प स्थगित करने से इनकार कर दिया था तो भारत में उसके खिलाफ कार्रवाई की मांग उठी थी, लेकिन भारत के तथाकथित सेक्युलर दल और कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी जमात के पक्ष में खड़े हो गए थे।

यही स्थिति मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने पर पैदा हुई थी। महाराष्ट्र में जब मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटवाने के लिए मांग उठी तो वही लॉबी लाऊडस्पीकरों के हक में खडी हो गई थी। जबकि प्रिंस सलमान पिछले साल मई-जून में ही अजान के समय बजने वाले लाउडस्पीकर को मस्जिद की चारदीवारी तक सीमित कर चुके हैं। अब माना जा रहा है कि प्रिंस सलमान देश की मस्जिदों को लेकर और भी सख्त नियम बना सकते हैं क्योंकि कट्टरपंथी मौलाना लंबे वक्त से उनके निशाने पर हैं।

यह भी पढ़ें: मौलानाओं के 'दुश्मन' प्रिंस सलमान बने प्रधानमंत्री, जानिए 2030 तक सऊदी को बदलने का क्या है विजन?

सऊदी क्राउन प्रिंस का मानना है कि भले अभी तेल की वजह से दुनिया सऊदी अरब का सम्मान करती है और सऊदी अरब की बातों को सुना जाता है, लेकिन तेल खत्म होने के बाद सऊदी अरब का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए सऊदी अरब को भविष्य में आने वाले संकट से बचाने के लिए उदारीकरण की प्रक्रिया में तेजी लाना जरूरी है। इसीलिए सबसे पहले मजहबी कट्टरता पर हथौड़ा चलाया जा रहा है, क्योंकि वह उदारीकरण और खुलेपन में सब से बड़ी रुकावट है।

वह सऊदी अरब को ऐसा देश बनाना चाहते हैं जहां कोई कट्टरता नहीं हो, जहां हर संस्कृति का मेल हो, जहां के बारे में सोचकर किसी को डर ना लगे, जहां पर्यटन समृद्ध हो और जहां निवेश की काफी ज्यादा संभावनाए हों। यानी सऊदी क्राउन प्रिंस की पूरी सोच भारत के संविधान के मुताबिक़ है। यहां तक कि अब सऊदी अरब में यहूदियों को पूर्ण आजादी दी जा चुकी है।

सऊदी अरब को धार्मिक सहिष्णु बनाने के लिए स्कूलों में सुधार कार्यक्रम काफी तेजी के साथ जारी हैं। स्कूली किताबों के सिलेबस को बदला जा रहा है। कई मजहबी मान्यताओं को सिलेबस से बाहर कर दिया गया है, वहीं दूसरे धर्मों को भी सिलेबस में जोड़ दिया गया है। पिछले साल खबर आई थी कि सऊदी अरब की स्कूली किताबों में रामायण, महाभारत और गीता के ज्ञान को जोड़ा गया है। जबकि भारत के हरियाणा राज्य में गीता को पाठ्यक्रम में शामिल करने के बयान पर ही बवाल मच गया था। भारत में योग दिवस मनाने और स्कूलों में योग करवाने पर कितना बवाल मचता रहता है, जबकि सऊदी अरब में योग को भी सिलेबस में शामिल किया गया है। भारत में कट्टरपंथी और तथाकथित सेक्युलर योग को हिंदुत्व बताकर विरोध करते हैं।

इसी साल अगस्त में जब सऊदी अरब के पुरातत्त्व विभाग ने खुदाई के दौरान 8 हजार साल पुराने मंदिर के अवशेषों को खोजा, तो उसे मस्जिद नहीं बताया बल्कि सऊदी अरब ने सारी दुनिया को बताया कि रियाद के दक्षिण में खुदाई के दौरान मन्दिर के अवशेष मिले हैं, जिससे साबित होता है कि उनके पूर्वज मूतिपूजा करते थे। लेकिन भारत के कट्टरपंथी पता नहीं क्यों अरब में खत्म हो रही मजहबी कट्टरता को भारत पर लाद देना चाहते हैं।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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