पीएफआई पर प्रतिबंध लग गया, लेकिन उसकी विचारधारा पर रोक कब लगेगी?
नई दिल्ली, 28 सितंबर: पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की लगातार छापेमारी और गिरफ्तारी के बीच केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने पीएफआई और उससे जुड़े आठ संगठनों पर पांच साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। आतंकी फंडिंग और देश-विरोधी गतिविधियों में लिप्त इस आतंकी संगठन पर पहली बार इतने बड़े स्तर पर कार्यवाही हो रही है। देश के कई राज्यों से सैकड़ों की संख्या में इससे जुड़े सदस्यों को गिरफ्तार किया गया है। केंद्र सरकार ने पीएफआई और उससे जुड़े संगठनों पर ठोस कार्यवाही करते हुए यूएपीए के तहत प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों की सूची में डाल दिया है।

पीएफआई का जजिया और जिहाद
साल 2010 में केरल के प्रोफेसर टीजे जोसेफ का पीएफआई के आतंकियों ने तालिबानी तरीके से हाथ काट दिया था, तभी से यह संगठन सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर था। उस दौरान इसके दफ्तरों में हुई छापेमारी में पीएफआई के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकी संगठनों के साथ जुड़े होने सहित तालिबानी तरीके से लोगों का गला रेतने की सीडी जैसी सामग्री जब्त की गयी थी।
साल 2009 में पीएफआई की कालीकट में आयोजित एक जनसभा में उसके एक नेता ने भाषण देते हुए कहा, "जो इस मकसद में तुम्हारा साथ दे, वो तुम्हारा भाई है और जो इस भलाई का इंकार करे उससे जजिया का मुतालबा करो (मांग करना) और वो जजिया न दे तो उससे मुकाबला करो। इस मुकाबले में जो मारा जायेगा वो शहीद कहलायेगा. उन्हें नेमतों से भरी जन्नत मिलेगी।" यह वीडियो आज भी यूट्यूब पर उपलब्ध है जोकि सार्वजानिक रूप से जजिया थोपने और लोगों को आतंकवादी बनाने के लिए उकसा रहा है।
इससे पहले साल 2008 में पीएफआई ने अपने मुखपत्र तेजस के माध्यम से बताया कि केरल में सालाना 1200 से 1300 लोगों का इस्लाम में धर्मान्तरण हो रहा है। यही नहीं, इस पत्रिका में यह भी कहा गया था कि इस धर्मान्तरण के लिए जो पैसा उपलब्ध करवाया जाता है उसका ठीक से इस्तेमाल नहीं हो रहा है। साल 2014 में केरल के गृह विभाग की अवर सचिव मैरी जोसफ ने बताया था कि पीएफआई के पास इस्लामीकरण का एक गुप्त एजेंडा है।
आतंकवाद से सीधा संबंध
पीएफआई से जुड़े कई आतंकियों के इस्लामिक स्टेट (Islamic State of Iraq and the Levant - ISIL) में शामिल होने के कई मामले आज भी एनआईए के पास है। जैसे साल 2015 में तेजस में काम करने वाला अबू ताहिर इस्लामिक स्टेट से जुड़ा। साल 2016 में पीएफआई की राजनैतिक शाखा - सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) से जुड़ा पी सफवान इस्लामिक स्टेट में शामिल हुआ। इसी साल एनआईए ने केवी अब्दुल जलील नाम के एक आतंकी को गिरफ्तार किया। वह पीएफआई और एसडीपीआई के कैडर को विस्फोटक बनाने और हथियार चलाने का प्रशिक्षण देता था।
साल 2017 में केरल पुलिस की छानबीन से पता चला कि पीएफआई से जुडी एक महिला सहित छह से अधिक लोग इस्लामिक स्टेट में शामिल हो गए। इसी साल तुर्की से शाहजहाँ कैंडी नाम के एक आतंकी को भारत प्रत्यर्पण किया गया। तुर्की की सुरक्षा एजेंसियों ने उसे सीरिया सीमा में अवैध रूप से घुसने के लिए पकड़ा था। वह 2007 में कुन्नूर में पीएफआई का एरिया कमांडर था। साल 2019 में ए अनवर नाम का पीएफआई से जुडा एक आतंकी इस्लामिक स्टेट में शामिल हो गया था और वह अफगानिस्तान में मारा गया था।
पीएफआई से संबंधित ऐसे सैकड़ों मामले हैं जो उसके आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त होने के पुख्ता जानकारी देते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इसकी स्थापना साल 2006 में हुई थी मगर यह एक भ्रम है। दरअसल, साल 2001 में केंद्र सरकार ने स्टुडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया (सिमी) नाम के एक आतंकी संगठन को प्रतिबंधित कर दिया था। यूपीए सरकार और वर्तमान की एनडीए सरकार ने भी इस प्रतिबन्ध को कायम रखा। इसी कार्यवाही के चलते सिमी से जुड़े लोगों ने जो नया संगठन तैयार किया उसका नाम बदलकर पीएफआई कर लिया था।
भारत में आतंकवाद की जड़ें
कुल मिलाकर पीएफआई हो या सिमी, लश्कर हो या जैश या फिर इंडियन मुजाहिद्दीन - सभी के तार एक दूसरे से जुड़े हुए मिलते हैं। अब प्रश्न उठता है कि आखिर इन सबके पीछे ऐसी कौन सी विचारधारा अथवा ताकत है जोकि एक आतंकी संगठन खत्म होता है तो उसका स्थान दूसरा ले लेता है? खास बात यह है कि इन सभी के उद्देश्य और काम करने के तरीके हमेशा एक समान रहते हैं।
इसका जवाब खोजने के लिए हमें अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान के इतिहास में जाना होगा। साल 1977 में यह देश एक बहुत बड़े परिवर्तन से गुजरा। इस साल वहां सैन्य शासन लागू हुआ और जनरल जिया उल हक़ ने शासन अपने कब्जे में कर लिया। उन्होंने 'इस्लाम का सिपाही' नाम की उपाधि लेते हुए अपने सैनिकों को जिहाद का नारा दिया। राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में उन्होंने कहा था, "पाकिस्तान का निर्माण इस्लाम के नाम पर हुआ है और यह केवल तभी जीवित रह सकता है जब वह इस्लाम के सहारे खड़ा हो। यही कारण है कि मैं इस्लामिक व्यवस्था के प्रस्तुतीकरण को इस देश के लिए आवश्यक मानता हूँ।
प्रथम दृष्टया तो ऐसा लगता है कि यह पाकिस्तान का अपना आन्तरिक मामला है लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। दरअसल, पाकिस्तान के इस इस्लामीकरण ने न सिर्फ दक्षिण एशिया बल्कि पूरे विश्व को बुरी तरह से प्रभावित किया। पाकिस्तान के इस बदलाव के पीछे जमात ए इस्लामी के संस्थापक अबू आला मौदूदी का हाथ था। जनरल जिया पर मौदूदी का बहुत गहरा प्रभाव था और पाकिस्तान से जुड़े नीतिगत एवं वैचारिक विषय में वे मौदूदी की सहायता लेते थे।
आतंकवादियों का कार्ल मार्क्स मौलाना मौदूदी
मौदूदी का जन्म 1903 में अविभाजित भारत में हुआ। विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए। पाकिस्तान के प्रमुख अखबार द डॉन के अनुसार, "अधिकतर पाकिस्तानी जोकि इजिप्ट, सीरिया, इंडोनेशिया, और मलेशिया में इस्लामिक राजनैतिक संगठनों से जुड़े है उनके लिए मौदूदी का दर्जा वैसा ही है जैसा कार्ल मार्क्स को वामपंथ में मिला है। पश्चिमी और दक्षिण एशिया के इतिहासकारों ने मौदूदी को 20वीं सदी का सबसे ताकतवर मुस्लिम विचारक बताया है जिसके विचारों एवं लेखों ने पूरे विश्व की इस्लामिक गतिविधियों को प्रभावित किया है।
मौदूदी ने न सिर्फ पाकिस्तान में कट्टरपंथ और आतंकवाद को बढ़ावा दिया बल्कि जनरल जिया को भी इस्लाम को फायदा पहुँचाने के नजरिये से काम करने के लिए तैयार किया। इस क्रम में 1977 में भारत में सिमी बना, और 1979 में रूस ने जब अफगानिस्तान पर हमला किया तो पाकिस्तान में मुजाहिदों को तैयार किया गया।
मौदूदी का निधन तो 1979 में हो गया मगर जनरल जिया ने उसके विचारों के माध्यम से भारत सहित पूरी दुनिया को आतंकवाद की चपेट में ला दिया। उन्होंने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई को फिर से संगठित किया और उसे 'Bleed India with a Thousand Cuts' का एक उद्देश्य दिया। इस दिशा में पुख्ता काम करने की शुरुआत 90 के दशक में आईएसआई के मुखिया रहे हामिद गुल ने की। वे हमेशा ही इस बात को स्वीकार करते थे कि जनरल जिया ही उनके मार्गदर्शक रहे हैं।
हामिद गुल ने ही सिमी और मुजाहिदों के गठजोड़ को पोषित किया। भारत की सुरक्षा एजेंसी रॉ (RAW) के मुखिया रहे बी रमन अपनी पुस्तक 'द काओबॉय ऑफ़ रॉ : डाउन मोमोरी लेन' में भी लिखते है कि सिमी को आईएसआई से शह मिलती थी। पिछले दिनों भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इसी 'Bleed India with a Thousand Cuts' का उल्लेख करते हुए बताया था कि पाकिस्तान अभी भी भारत में शांति भंग करने के लिए प्रयासरत है। इस प्रकार मौदूदी का विचार आज भी पीएफआई जैसे संगठनों के रूप में भारत में मौजूद है।
भारतीय विश्वविद्यालयों में मौदूदी की पढाई
आश्चर्य तो यह है कि भारत के अधिकतर विश्वविद्यालयों में मौदूदी के कट्टरपंथी विचारों को पढाया जाता है। वह चाहे जामिया मिलिया इस्लामिया हो, श्रीनगर स्थित यूनिवर्सिटी हो, अथवा केरल का कालीकट विश्वविद्यालय। इनके पाठ्यक्रमों में मौदूदी को शामिल किया गया है। हां, अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने अगस्त 2022 में मौदूदी को अपने पाठ्यक्रम से हटा दिया है।
भारत के कट्टरपंथियों को अब यह समझने की जरुरत है कि मौदूदी ने पाकिस्तान में जनरल जिया के माध्यम से जो किया, उसका खामियाजा वह देश हर दिन भुगत रहा है। उसी व्यवस्था अथवा विचार को वे भारत पर थोपकर किसका फायदा करना चाहते है?
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