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जानिए नई सरकार से क्या चाहती बिहार की गरीब जनता?

पटना (मुकुंद सिंह)। उम्मीदों की खासियत यह होती है कि इसकी कोई सीमा नहीं होती। खासकर वंचित तबके की उम्मीदों की बात ही कुछ और है। इसकी वजह यह है कि यह वह तबका है जो रोजी-रोटी से लेकर अपनी पहचान और इतिहास तक को तरस रहा है। अब जबकि सूबे में दलितों-पिछड़ों की सरकार का बनना तय है, ऐसे में उम्मीदों का जगना स्वभाविक है।

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महागठबंधन की ऐतिहासिक जीत ने यह साबित कर दिया है कि समाज का बहुसंख्यक वर्ग जो आजादी के साढे छह दशक बीतने के बावजूद वंचित है, अब वह न तो अपमान स्वीकारने को तैयार है और न ही वंचित रहने को। जाहिर तौर पर महागठबंधन को ऐतिहासिक जीत दिलाने के पीछे इस वंचित तबके की यही मंशा रही।

नीतीश कुमार का नारा न्याय के साथ विकास उनके पहले दो कार्यकालों में कितना साकार हुआ, अब यह विचार का विषय नहीं है। विचार का विषय यह है कि अगले पांच वर्षों में बिहार कहां रहेगा और वंचित तबका अपनी परिभाषा से कितना दूर होगा।

वंचित तबका तबतक वंचित रहेगा जबतक कि उसे उत्पादन के संसाधनों पर अधिकार नहीं मिलता है। यह तभी संभव है जब खेत में काम करने वालों को खेत का मालिक होने का अधिकार मिले। हालांकि अपने पहले कार्यकाल में नीतीश कुमार ने भूमि सुधार आयोग का गठन कर इसके संकेत दिया था कि वे इस दिशा में गंभीर प्रयास करने के मूड में हैं। लेकिन संभवतः वह भाजपा के साथ रहने के कारण भूमि सुधार आयोग के फ़ैसले को लागू नहीं करवा सके।

दिल खोल कर दिया समर्थन

इस बार उनके समक्ष कोई दबाव नहीं है। समाज के वंचित तबके ने दिल खोलकर लालू-नीतीश दोनों को अपना समर्थन दिया है। लिहाजा यह दोनों की जिम्मेवारी है कि वे बिहार में भूमि सुधार लागू करायें। नई सरकार से वंचित तबके को दूसरी सबसे बड़ी उम्मीद रणवीर सेना के हरामियों को सजा दिलवाने की है, जिन्होंने बड़ी संख्या में बिहार के दलितों व पिछड़ों की हत्या की।

पिछले कार्यकाल में साजिश के तहत भाजपा ने अपने पोसपुत्र रणवीर सेना को सभी मामलों में बरी करवा लिया। हालांकि इसके लिये एक हदतक नीतीश कुमार भी जिम्मेवार रहे। लेकिन अब जबकि उनके पास दलितों-पिछड़ों का दिया प्रचंड बहुमत है, उन्हें इस दिशा में पुरजोर प्रयास करना चाहिए।

श‍िक्षा में सुधार बेहद जरूरी

तीसरी और सबसे बड़ी उम्मीद शिक्षा में सुधार की है। यह कहना गलत नहीं होगा कि बिहार के सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था निम्न दर्जे की है। इसका शिकार सवर्ण और वैश्य वर्ग के बच्चे नहीं बल्कि दलित और पिछ्ड़े तबके के नौनिहाल होते हैं। आवश्यकता है कि नई सरकार अन्य सभी कार्यों को छोड़कर शिक्षा को प्राथमिकता बनाये ताकि दलित-पिछड़े वर्ग के बच्चे भी पढ लिखकर मजदूर बनने के बजाय धनार्जन के योग्य बन सकें।

यह जिम्मेवारी नई सरकार की होनी चाहिए।चौथी उम्मीद सामाजिक व्यवस्था और सामाजिक समरसता की है। हालांकि यह तय है कि दलितों-पिछड़ों की एकजुटता का सवर्ण समाज पर प्रतिकुल असर पड़ेगा और संभव है कि आने वाले समय में वह सामाजिक अमन-चैन पर प्रतिकुल प्रहार करे। लेकिन सरकार होने के नाते यह जिम्मेवारी लालू-नीतीश दोनों की है कि वे न्यायसम्मत कार्रवाई करते हुए समाज में समरसता और सौहार्द्र बनाने रखने के लिये पहल करें। हालांकि यह जिम्मेवारी दलितों और पिछड़ों की भी है।

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