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भारत-चीन तनाव के बीच चीन की मीडिया ने भारत को क्या नसीहत दी है

चीन की मीडिया ने भारत से अपील की है कि बीते साल से दोनों देशों के बीच जारी सीमा गतिरोध का हल निकालने और डिसइंगेजमेंट के लिए होने वाली 14वें दौर की वार्ता से पहले वह द्विपक्षीय संबंधों को पटरी पर लाए.

हालांकि चीन की सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक़, 14वें दौर की यह उच्चस्तरीय बैठक कब होगी, यह तय नहीं है.

बेनतीजा रही थी पिछली मुलाक़ात

भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में एलएसी यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जारी सीमा विवाद को सुलझाने के लिए 13वें दौर की सीनियर सैन्य कमांडर स्तर की वार्ता बेनतीजा रही थी.

इस बैठक के बाद भारत ने कहा था कि चीन एलएससी पर यथास्थिति बहाल करने को तैयार नहीं है.

अभी पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर दोनों देशों के बीच हॉट स्प्रिंग्स, डेपसांग बल्ज और चार्डिंग नाला जंक्शन को लेकर विवाद है.

वहीं चीन की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि भारत ग़ैर वाजिब और अनुचित मांग उठा रहा है, जिससे मुश्किल पेश आ रही है.

चीन ने भारत से कहा था कि वह किसी भी परिस्थिति का ग़लत आकलन ना करे.

ग्लोबल टाइम्स न्यूज़ पेपर के चाइनीज़ एडिशन ने भारत के फ़ाइनेंशियल न्यूज़ पेपर द इकोनॉमिक टाइम्स की एक ख़बर का हवाला दिया है जिसमें 25 दिसंबर को सूत्रों के हवाले से ख़बर प्रकाशित की गई थी कि भारत ने दोनों देशों के बीच सैन्य कमांडर स्तर की 14वें दौर की बातचीत का प्रस्ताव दिया है.

https://www.youtube.com/watch?v=DtldC65FBYg

ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारतीय मीडिया का मानना था कि इस महीने की 15 तारीख़ को राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनके रूसी समकक्ष व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई वर्चुअल मीटिंग के बाद पुतिन के सहयोगी यूरी उशाकोव ने चीन, रूस और भारत के बीच जिस बैठक के आयोजन का प्रस्ताव रखा है वो दोनों पक्षों के 'सीमा से पीछे हटने और टकराव की स्थिति शांत' होने पर ही संभव है.

ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों देशों ने सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए आधिकारिक स्तर की 23वीं बैठक की थी जिसमें दोनों देशों ने राजनयिक और सैन्य स्तर पर संवाद बनाए रखने पर सहमति जताई थी. साथ ही दोनों पक्षों ने इस बात पर भी सहमति जताई थी कि कमांडर स्तर की 14वें दौर की बैठक का जल्दी आयोजन किया जाना चाहिए.

https://www.youtube.com/watch?v=fS-bU7dPb5g

सरकारी अंग्रेज़ी अख़बार चाइना डेली में 27 दिसंबर को प्रकाशित संपादकीय में इस साल दर्जनों चीनी ऐप्स पर लगाये गए प्रतिबंध और भारत में चीनी उत्पादों के बहिष्कार पर व्यापक रूप से चर्चा की गई. इस लेख में भारत में काम कर रही चीनी कंपनियों पर हालिया आयकर छापे की ख़बर पर भी विस्तार से लिखा गया. इस लेख में इस बात का भी ज़िक़्र किया गया कि कैसे भारत सरकार के इस क़दम से उत्पादन और व्यवसायिक गतिविधियां प्रभावित हुईं.

इसमें आगे कहा गया है कि डिसइंगेजमेंट पर दोनों देशों के बीच हुई 13वें दौर की बातचीत भारत की अनुचित और अवास्तविक मांगों के कारण किसी नतीजे तक नहीं पहुंच सकी.

इसी तरह ग्लोबल टाइम्स में 26 दिसंबर को प्रकाशित एक कॉमेंट्री मे कहा गया कि चीन और भारत के बीच अच्छे और गहरे व्यापारिक संबंध दोनों देशों के लिए फ़ायदेमंद होंगे. आप इसे पसंद कीजिए या फिर इसे पसंद ना कीजिए, लेकिन आप इस बात से मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि भारत पहले से ही चीन से मज़बूती से जुड़ा हुआ है और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन का हिस्सा है.

दोनों देशों के लिए चुनौती यह नहीं है कि कौन किसकी जगह लेगा बल्कि चुनौती तो यह है कि दोनों देश वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी स्थिति को मज़बूत करने के लिए कैसे साथ काम करते हैं.

भारतीय अख़बार की रिपोर्ट को किया ख़ारिज

ग्लोबल टाइम्स की एक अन्य रिपोर्ट में भारत के अंग्रेज़ी दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स की 24 दिसंबर को प्रकाशित हुई एक ख़बर को ख़ारिज किया गया है. इस ख़बर में अज्ञात अंदरुनी लोगों के हवाले से ख़ुफिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा गया था कि चीन के अधिकारी तिब्बती बच्चों को विशेष सैन्य ट्रेनिंग के लिए कैंपों में भेज रहे हैं.

ग्लोबल टाइम्स ने शिन्हुआ यूनिवर्सिटी में नेशनल स्ट्रैटेजी इंस्टीट्यूट के निदेशक कियान फ़ेंग के हवाले से लिखा,"भारतीय मीडिया को ऐसी किसी भी चीज़ का इस्तेमाल करने में कोई शर्म नहीं है जिससे चीन पर हमला किया जा सके, जैसा कि उसने तिब्बती स्काउट्स को ट्रेनिंग देने के मामले में किया."

27 दिसंबर को चीन के विदेश मंत्रालय ने भी इस रिपोर्ट को पूरी तरह से ग़लत जानकारी और मनगढ़ंत बताया था.

भारत चीन
Getty Images
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चीन ने भारतीय जानकारों के बयान का भी उल्लेख किया

चीन की मीडिया ने भारतीय विद्वानों के पश्चिमी देशों की आलोचना के बयानों को भी काफ़ी तवज्जो दी है.

दोनों देशों के बीच होने वाली वार्ता की पुष्टि करने से पहले, ग्लोबल टाइम्स ने एक भारतीय बुद्धिजीवी के पश्चिम की आलोचना के बयान को काफ़ी तवज्जो दी.

अख़बार ने अपने चीनी और अंग्रेज़ी संस्करण में भारतीय स्तंभकार और मार्क्सवादी जानकार विजय प्रसाद के एक साक्षात्कार को काफ़ी प्रमुखता दी जिसमें उन्होंने कहा था कि पश्चिम को उपनिवेशवाद के इतिहास को स्वीकार करने की ज़रूरत है.

प्रसाद ने अख़बार से कहा था, "पश्चिम को उपनिवेशवाद के इतिहास को स्वीकार करने की ज़रूरत है. लेकिन लगता है कि इस संबंध में वे सबकुछ भूल चुके हैं. फ़्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका कोई भी अपने अतीत को कभी स्वीकार नहीं करता है."

उन्होंने कहा कि आज के समय में ब्रिटेन "हांगकांग के मौजूदा हालातों को लेकर बहुत व्यथित नज़र आता है, लेकिन अंग्रेज़ों ने इस शहर को अपना उपनिवेश बनाकर रखा और ब्रिटिश शासन के दौरान वहां लोकतंत्र जैसा कुछ नहीं था.''

भारत-चीन तनाव

भारत और चीन के बीच सीमा पर पिछले साल मई में गंभीर स्थिति पैदा हो गई थी.

एक मई 2020 को दोनों देशों के सौनिकों के बीच पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग त्सो झील के नॉर्थ बैंक में झड़प हुई थी. इसमें दोनों ही पक्षों के दर्जनों सैनिक घायल हो गए थे.

इसके बाद 15 जून को गलवान घाटी में एक बार फिर दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प हुई. इसमें दोनों तरफ़ के कई सैनिकों की मौत हुई थी.

गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई.

आख़िरकार, इस साल फ़रवरी में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में हुई सहमति के बाद इस साल फ़रवरी में डिसइंगेजमेंट की प्रक्रिया शुरू की गई थी.

अभी तक दोनों देशों के बीच 13 दौर की सैन्य वार्ता हो चुकी है, लेकिन कोई बड़ा नतीजा सामने नहीं आया है.

चीन का दावा

चीन का पहले से ही लद्दाख के पूर्वी इलाक़े अक्साई चिन पर नियंत्रण है.

चीन लगातार यह कहता आया है कि मौजूदा हालात के लिए लद्दाख को लेकर भारत सरकार की आक्रामक नीति ज़िम्मेदार है जबकि भारत का कहना है कि उसने एलएसी पर एकतरफ़ा कार्रवाई करते हुए यथास्थिति बदल दी है.

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