Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

सोनिया गांधी ने क्यों दी 370, असम और राम मंदिर से दूर रहने की सलाह: नज़रिया

सोनिया गांधी, कांग्रेस
Getty Images
सोनिया गांधी, कांग्रेस

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की गुरुवार को एक बैठक हुई जिसमें पार्टी को पटरी पर लाने की एक ठोस कोशिश दिखाई दी. इस बैठक की अध्यक्षता पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने की.

हालांकि, सोनिया गांधी के ब्लूप्रिंट का कुछ हिस्सा आरएसएस-बीजेपी के चुनाव जीतने और सत्ता में बने रहने के फॉर्मूले से मिलता-जुलता था. लेकिन फिर भी उन्होंने दिखाया कि उन्होंने कांग्रेस के उबर न पाने के कारणों पर गंभीरता से सोच-विचार किया है. साथ ही इन स्थितियों से पार्टी को निकालने के तरीके ढूंढने की कोशिश की है.

सोनिया गांधी के संदेश में एक और बात जो निकलकर आई, जो उनके नज़रिये को राहुल गांधी से कुछ अलग दिखाती है. राहुल गांधी आधुनिक तकनीक के चश्मे से राजनीति को देखते हैं लेकिन सोनिया गांधी के विचार इससे अलग हैं.

सोनिया गांधी ने कहा कि सोशल मीडिया पर सक्रिय होना और आक्रामक दिखना ही काफ़ी नहीं है. इससे ज़्यादा जरूरी है लोगों से सीधे तौर पर जुड़ना. आंदोलन के एक ठोस एजेंडे के साथ गलियों-कूचों, गांवों और शहरों में निकलना जरूरी है.

सोनिया गांधी, राहुल गांधी, कांग्रेस
Getty Images
सोनिया गांधी, राहुल गांधी, कांग्रेस

370, असम और राम मंदिर से दूर रहने की सलाह

इस बैठक में कांग्रेस के मुद्दे भी कुछ बदलते नज़र आए. सोनिया गांधी ने आर्थिक मंदी, नौकरियों की कमी और निवेशकों के डगमगाए विश्वास जैसे प्रमुखों मुद्दों को लोगों के सामने उठाने की बात कही.

एक तरह से उन्होंने कांग्रेस को सामाजिक ध्रुवीकरण करने वाले मसलों जैसे अनुच्छेद 370 को हटाना, असम में एनआरसी और राम मंदिर से दूर रहने की सलाह दी है.

सोनिया गांधी ने कांग्रेस को लोगों की रोज़ी-रोटी के मुद्दे पर ध्यान देने पर जोर दिया. उन्होंने शायद ये महसूस किया है कि अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दे भले ही पार्टी को कम समय में चुनावी फ़ायदा नहीं दिला सकते लेकिन बीजेपी को राष्ट्रवाद और हिंदुत्व जैसे मुद्दों पर हराने की कोशिश करके अपनी फ़ज़ीहत कराने का कोई मतलब नहीं है.

पिछले दिनों नरम हिंदुत्व कार्ड खेलने के राहुल के प्रयासों से कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ है.

मोहन भागवत और अमित शाह
Getty Images
मोहन भागवत और अमित शाह

कांग्रेस के कोऑर्डिनेटर

सोनिया गांधी ने ये भी माना है कि जब तक कांग्रेस को व्यवस्थित नहीं किया जाता तब तक किसी भी अभियान का कोई फायदा नहीं होगा.

उन्होंने 'ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर्स' नियुक्त करने का फ़ैसला किया है. ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर सामूहिक संपर्क अभियान पर जाने से पहले कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करते समय कांग्रेस के दृष्टिकोण और विचारधारा के बारे में बताएगा.

हालांकि, ये बीजेपी के 'प्रचारक' से थोड़ा अलग होगा क्योंकि 'ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर' के लिए चुनाव न लड़ने की कोई बाध्यता नहीं होगी.

सोनिया गांधी ने घर-घर जाकर सदस्यता अभियान चलाने की बात कही जिसमें मुख्यमंत्रियों से लेकर बूथ कार्यकर्ताओं तक को शामिल करने की योजना है ताकि निचले स्तर तक संपर्क बनाया जा सके.

ये एक और सीख है जो कांग्रेस ने बीजेपी से ली है जिसमें राजनीतिक गतिविधियों के मामले में शीर्ष नेता से लेकर काडर के व्यक्ति तक में कोई अंतर नहीं है.

आखिर में, सोनिया गांधी ने ज़ोर देकर कहा कि कांग्रेस को अपनी विरासत को बीजेपी को नहीं हड़पने देना चाहिए, हालांकि ये सलाह बहुत देर से आई.

उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी के पास अपने 'ग़लत' उद्देश्यों के लिए महात्मा गांधी, सरदार पटेल और बीआर अंबेडकर जैसे महान प्रतीकों के संदेशों को अपने अनुसार बदलने के तरीके हैं.

सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, कांग्रेस
Getty Images
सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, कांग्रेस

आर्थिक मसलों पर ज़ोर

अर्थव्यवस्था कांग्रेस के लिए प्रमुख मुद्दा रहा जो इस बात से भी साबित होता है कि पूर्व प्रधानमंत्री और अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था की हालत को लेकर कई साक्षात्कार दिए जो बैठक के दिन बड़े हिंदी और अंग्रेजी अख़बारों में प्रकाशित हुए.

इन साक्षात्कारों में उन्होंने सरकार से मीडिया में ख़बरें प्रभावित करने के तरीकों को छोड़कर देश के सामने मौजूद संकट को स्वीकारने का अनुरोध किया.

नब्बे के दशक में वित्त मंत्री रहते हुए देश को ख़राब आर्थिक स्थिति से निकालने वाले मनमोहन सिंह ने मौजूदा आर्थिक हालात सुधारने के लिए जीएसटी के रेशनलाइजेशन (भले ही इससे अल्पकालिक राजस्व हानि हो) और ग्रामीण खपत में वृद्धि जैसे उपायों का सुझाव दिया.

आज की बैठक ने कांग्रेस के अंदर एक धारणा को मजबूत किया कि सोनिया गांधी अब भी पार्टी के लिए सबसे जरूरी हैं.

कमलनाथ और दिग्विजय सिंह
Getty Images
कमलनाथ और दिग्विजय सिंह

पार्टी में गुटबाज़ी का खामियाजा

इस बैठक की एक वजह ये भी थी कि लगभग हर राज्य और ख़ास तौर पर कांग्रेस शासित राज्यों में पार्टी नेताओं में मनमुटाव और गुटबाज़ी है. जिससे ये बात साबित होती है कि बीजेपी नेतृत्व ने कांग्रेस को अपंग बना दिया है.

मध्य प्रदेश का ही उदाहरण लें तो राज्य के बड़े नेताओं मुख्यमंत्री कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह के बीच तब से ही टकराव बना हुआ है जब से कांग्रेस सत्ता में आई है.

कमलनाथ इस बैठक में शामिल नहीं थे जबकि सिंधिया वहां मौजूद थे. सोनिया गांधी को दो दिग्गज नेताओं के बीच टकराव को ख़त्म करने वाला माना जाता था लेकिन अब वो बात भी नहीं रही. इन हालात में बीजेपी के लिए मध्य प्रदेश में कर्नाटक जैसी स्थितियां बनाने का रास्ता आसान हो गया है.

दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया
Getty Images
दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया

इसी तरह राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट एक-दूसरे से नज़रें तक नहीं मिलाते. बुधवार को सचिन पायलट ने अपराध रोकने में असफलता को लेकर सरकार की आलोचना की थी. जाहिर है कि कांग्रेस को मजबूत रखने के लिए सिर्फ़ सत्ता मिलना ही काफ़ी नहीं है.

हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में हालात और ख़राब हैं जिनमें जल्द ही चुनाव होने वाले हैं. इन सभी राज्यों में बीजेपी और उसके सहयोगियों की सरकार है.

हरियाणा में एक नया विवाद तब पैदा हो गया जब सोनिया गांधी की विश्वासपात्र कुमारी सैलजा ने प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी के पसंदीदा अशोक तंवर की जगह ली.

सोनिया गांधी ने पूर्व मुख्यमंत्री और मजबूत जाट नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा को चुनाव समिति का प्रमुख बनाकर एक और विवाद छिड़ने से तो रोक लिया लेकिन अशोक तंवर की नाराज़गी खुले तौर पर जाहिर हो गई. उन्होंने कह दिया कि वो कांग्रेस के लिए काम करेंगे लेकिन सैलजा और हुडा के नेतृत्व में नहीं.

अशोक गहलोत और सचिन पायलट
Getty Images
अशोक गहलोत और सचिन पायलट

महाराष्ट्र में कांग्रेस और उसके सहयोगी दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) से बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ बीजेपी और शिवसेना में जाने का सिलसिला जारी है.

सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के हालात ठीक करने की कोई कोशिश नहीं की है. वहीं, एनसीपी प्रमुख शरद पवार भी बेबस नज़र आते हैं.

झारखंड में भी गुटबाज़ी है क्योंकि हफ़्तों पहले प्रदेश कांग्रेस प्रमुख अजॉय कुमार ने भी मनमुटाव के चलते पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया है.

उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों सुबोधकांत सहाय और प्रदीप कुमार बलमुचु के समर्थकों के कथित हमले के बाद ये फ़ैसला लिया था. लोकसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन एकजुट नहीं है.

ये दिखाता है कि कांग्रेस को फिर से खड़ा करने के लिए सोनिया गांधी को कई और बैठकें करने, जोश जगाने और मनोबल बढ़ाने की जरूरत होगी. उन्होंने इस बैठक के साथ शायद इसकी शुरुआत की है.

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+