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चीन को जयशंकर की ये सलाह पाकिस्तान को कितना रोक पाएगी?

ये बात जगज़ाहिर है कि जून 2020 में पूर्वी लद्दाख़ में सीमा पर झड़प के बाद से भारत और चीन के संबंध अच्छे नहीं रहे और इस दौरान चीन-पाकिस्तान रिश्ते लगातार फल-फूल रहे हैं और मज़बूत होते जा रहे हैं.

How much will Jaishankars advice to China stop Pakistan?

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ़ ने अप्रैल में पद ग्रहण करने के बाद चीन का अपना पहला आधिकारिक दौरा शुरू किया है. वह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 20 वीं राष्ट्रीय कांग्रेस के बाद चीन का दौरा करने वाले पहले विदेशी नेता हैं.

इसी कांग्रेस के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को तीसरे कार्यकाल के लिए पार्टी का नेता चुना गया था.

शाहबाज़ शरीफ़ ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली कचियांग के साथ बातचीत की है और उम्मीद के मुताबिक़ दोनों नेताओं ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (सीपीईसी) के काम में तेज़ी और इसका दायरा और बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की है.

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने चीन के दौरे पर जाने से पहले एक ट्वीट में कहा था, "चीनी नेतृत्व के साथ मेरी बातचीत कई अन्य मुद्दों के अलावा सीपीईसी को पुनर्जीवित करने पर केंद्रित होगी. सीपीईसी का दूसरा चरण सामाजिक-आर्थिक प्रगति के एक नए दौर की शुरुआत होगा जो हमारे लोगों के जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाएगा."

भारत को इस कॉरिडोर से काफ़ी आपत्ति है. भारत का एतराज़ इस बात पर है कि ये कॉरिडोर कश्मीर के उस हिस्से से होकर गुज़रता है जिसे भारत अपना अटूट अंग मांगता है, लेकिन जिसपर पिछले 75 साल से पाकिस्तान का शासन है. भारत इसे अवैध क़ब्ज़ा मानता है.

कुछ महीने पहले चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर पर चीनी मामलों के विशेषज्ञ डॉक्टर फ़ैसल अहमद और प्रो. अलेक्जेंड्रे लैम्बर्ट अपनी किताब "द बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव: जियोपॉलिटिकल एंड जियोइकॉनॉमिक एस्पेक्ट्स" में लिखते हैं कि कॉरिडोर (सीपीईसी) एक विवादित मुद्दा है.

किताब में वो कहते हैं, "चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर काफ़ी विवादास्पद मुद्दा बना हुआ है, ख़ासकर भारत के दृष्टिकोण से. इसका उद्देश्य कनेक्टिविटी, क्षेत्रीय विकास और सीपीईसी पर ध्यान देने के साथ पाकिस्तान के व्यापार के बुनियादी ढांचे को उन्नत करना है. यह कॉरिडोर पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले क्षेत्र से होकर गुज़रता है और इसलिए भारत इसे अपनी संप्रभुता के लिए एक ख़तरे और घुसपैठ के रूप में देखता है."

https://twitter.com/JiRongMFA/status/1587808128959406081?s=20&t=e5PCKH-r2IbDR4JIBl-UuQ

मंगलवार को भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की एक कांफ्रेंस के बाद अपने ट्वीट में जो कुछ भी कहा है वो भारत की चिंता को दर्शाता है.

उन्होंने कहा कि क्षेत्र में कनेक्टिविटी परियोजनाओं को मध्य एशियाई राज्यों के हितों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना चाहिए.

भारतीय विदेश मंत्री ने अपनी टिप्पणी में किसी देश का उल्लेख नहीं किया, लेकिन भारत लंबे समय से चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) परियोजना का विरोध करता रहा है.

भारत एकमात्र एससीओ सदस्य देश था, जिसने बैठक के बाद जारी एक संयुक्त बयान में चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के लिए समर्थन की पुष्टि नहीं की.

https://twitter.com/JiRongMFA/status/1587808128959406081?cxt=HHwWgoDToZXFg4ksAAAA

भारत को आपत्ति क्यों?

भारत ने इस योजना पर हमेशा से आपत्ति जताई है.

पिछले साल जब ये मुद्दा फिर से सुर्ख़ियों में था, तो विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा था, "भारत तथाकथित सीपीईसी में परियोजनाओं का दृढ़ता से और लगातार विरोध करता है, जो भारतीय क्षेत्र में है, जिस पर पाकिस्तान नेअवैध रूप से क़ब्ज़ा किया है. भारत ने ऐसी गतिविधियों को अवैध,नाजायज़ और अस्वीकार्य कहा है."

भारत ने चीन की अरबों डॉलर वाली बीआरआई परियोजना में शामिल चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर का हमेशा से विरोध किया है, क्योंकि सीपीईसी को भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन करने के रूप में देखा जाता है.

भारत को आपत्ति इस बात पर भी है कि चीन और पाकिस्तान ने सीपीईसी स्कीम में तीसरे पक्ष को शामिल करने की योजना बनाई है. भारत ने पिछले सप्ताह तीसरे देशों को शामिल करने के लिए सीपीईसी के संभावित विस्तार पर कहा कि कोई तीसरा देश इसमें शामिल नहीं होना चाहिए

भारत ने कहा था- हम यह चेतावनी पहले से दे रहे हैं क्योंकि यह है हमारी संप्रभुता का मामला है.

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चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर चीन के दक्षिणी शिनजियांग प्रांत को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक जोड़ेगा.

ये कॉरिडोर पाकिस्तान के नियंत्रण वाले कश्मीर से होकर गुज़रेगा. इस परियोजना पर काफ़ी काम हो चुका है. अब इसके दूसरे चरण के शुरू होने की ख़बर है.

डॉक्टर फ़ैसल अहमद और प्रो अलेक्जेंड्रे लैम्बर्ट ने अपनी किताब में इस पर टिपण्णी करते हुए लिखा है, "ग्वादर बंदरगाह के रणनीतिक महत्व पर और पाकिस्तान के रेलवे नेटवर्क को दक्षिणी शिनजियांग रेलवे से जोड़ने पर रणनीतिक चर्चा है."

इस बीच भारत और चीन के बीच राजनीतिक गतिरोध जारी है.

अगर आर्थिक मामलों की बात करें, तो इस मोर्चे पर द्विपक्षीय व्यापार 125 अरब डॉलर को पार कर गया है. हालांकि, द्विपक्षीय संबंधों में नरमी के कुछ संकेत नज़र आए हैं.

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को गुजरात में सस्पेंशन ब्रिज के गिरने पर शोक संदेश भेजा है.

समाचार एजेंसी रायटर्स की एक ख़बर के मुताबिक़, शी ने कहा, "चीनी सरकार और चीनी लोगों की ओर से, मैं पीड़ितों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करना चाहता हूँ और उनके परिवारों और घायलों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करता हूँ."

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उम्मीद की किरण?

हाल में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं राष्ट्रीय कांग्रेस के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को जब तीसरे कार्यकाल के लिए पार्टी का नेता चुना गया था, तो उस समय प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी को छोड़ कर दुनिया भर के नेताओं ने उन्हें बधाई दी थी.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी पर चीन वालों को ताज्जुब हुआ था.

सिचुआन विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के प्रोफ़ेसर हुआंग युनसोंग ने बीबीसी हिंदी को दिए एक ईमेल इंटरव्यू में बताया कि प्रधानमंत्री मोदी की ख़ामोशी को चीन में अच्छी तरह से नहीं देखा जा रहा है.

वो कहते हैं, "राष्ट्रपति शी के दोबारा चुने जाने पर पीएम मोदी की चुप्पी ने चीन और भारत की जनता को बेहद ख़तरनाक संकेत दिए हैं. यह आगे दोनों देशों के बीच विवादों और टकराव को उजागर करता है, और हमारे सामान्य हितों की संभावनाओं को काफ़ी कमज़ोर करता है. सच कहूँ तो, पीएम मोदी की चुप्पी दोनों देशों के बीच मतभेदों के हल करने में कोई अच्छी भूमिका नहीं निभाती है."

लेकिन पिछले दो सालों में दोनों देशों के बीच अगर हालात बेहतर नहीं हुए हैं तो बिगड़े भी नहीं हैं. दोनों देशों के बीच रिश्तों में सुधार आ सकता है.

अगले एक साल तक एससीओ की अध्यक्षता भारत के पास है. अगले साल सितंबर में भारत को शिखर सम्मेलन कराना है और हर बार की तरह चीन के राष्ट्रपति भी इसमें नियमित रूप से भाग लेंगे.

अगर सम्मेलन से पहले दोनों देशों के बीच रिश्तों में सुधार नहीं होते हैं तो सम्मेलन की कामयाबी और भारत की अध्यक्षता पर प्रश्न चिन्ह लग सकते हैं.

सिंगापुर स्थित चीन के पत्रकार सन शी कहते हैं, "मुझे उम्मीद है कि जब भारत अगले साल के शिखर सम्मेलन के लिए एससीओ की अध्यक्षता ग्रहण करेगा, तो शी के प्रति भारत मैत्रीपूर्ण संकेत दिखाने का प्रयास करेगा. याद रहे कि दोनों देश 'ब्रिक्स' के सदस्य भी हैं. उन्हें आपस में मेलजोल बढ़ाना पड़ेगा."

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