‘1 लाख मतुआ बनाम 50 लाख मुस्लिम’ बयान देने वाले कौन हैं मोदी के मंत्री शान्तनु ठाकुर, क्या है इनकी जाति?
Shantanu Thakur SIR Row: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर जबरदस्त बेचैनी है। इस बेचैनी को और हवा तब मिली, जब केंद्रीय मंत्री और बोंगांव से सांसद शान्तनु ठाकुर ने एक ऐसा बयान दे दिया, जिसने उनकी अपनी मतुआ बिरादरी को ही असहज कर दिया। '1 लाख मतुआ बनाम 50 लाख मुस्लिम' वाली टिप्पणी अब सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि बंगाल के सियासी समीकरणों को प्रभावित करने वाला मुद्दा बन चुकी है। शान्तनु ठाकुर अपने इस बयान को लेकर विवादों में हैं और उनकी जाति को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।
उत्तर 24 परगना जिले के ठाकुरनगर स्थित ठाकुरबाड़ी में लगे एक मदद केंद्र में 75 वर्षीय मोतीलाल हलदर अपनी फाइलें पकड़े प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठे सवाल पूछ रहे हैं। वे 1997 में बांग्लादेश से भारत आए थे। 2002 की वोटर लिस्ट में नाम नहीं होने के कारण उन्हें डर है कि मौजूदा SIR प्रक्रिया में उनका नाम कट सकता है। हलदर अकेले नहीं हैं। ठाकुरनगर और आसपास के इलाकों में हजारों मतुआ परिवार इसी असमंजस में दिन काट रहे हैं।

ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी होने के बाद चिंता और बढ़ गई। राज्यभर में करीब 58 लाख नाम हटाए जाने की बात सामने आई है। इसमें बोंगांव उत्तर, कसबा और सोनारपुर दक्षिण जैसी सीटें शामिल हैं, जहां मतुआ समुदाय की अच्छी खासी मौजूदगी है।
शान्तनु ठाकुर का बयान और बढ़ा विवाद
इसी माहौल में केंद्रीय मंत्री शान्तनु ठाकुर का बयान सामने आया। उन्होंने सवाल किया कि अगर 50 लाख पाकिस्तानी, बांग्लादेशी मुस्लिम और रोहिंग्या को बाहर करने की वजह से उनकी बिरादरी (मतुआ) के 1 लाख लोगों को अस्थायी तौर पर वोटिंग अधिकार से वंचित होना पड़े, तो कौन सा विकल्प देश के लिए ज्यादा फायदेमंद है। इस एक लाइन ने मतुआ समुदाय के भीतर गहरी नाराजगी और असुरक्षा पैदा कर दी।
इसके बाद शान्तनु ठाकुर ने यह भी कहा कि SIR के दौरान कई मतुआ लोगों के नाम कटेंगे, इसलिए सभी को CAA के तहत आवेदन करना चाहिए। यही बात राजनीतिक टकराव की वजह बनी। ठाकुरनगर में बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच झड़प तक हो गई। तृणमूल की राज्यसभा सांसद ममता बाला ठाकुर, जो शान्तनु ठाकुर की चाची हैं, ने आरोप लगाया कि उनके समर्थकों के साथ मारपीट हुई। वहीं बीजेपी ने पलटवार करते हुए तृणमूल कांग्रेस (TMC) पर गुंडे भेजने का आरोप लगाया।

कौन हैं शान्तनु ठाकुर (Who is Shantanu Thakur)
🔹 शान्तनु ठाकुर का जन्म 1982 में हुआ। वे 2019 से बोंगांव लोकसभा सीट से सांसद हैं और मोदी सरकार में पोर्ट्स, शिपिंग और वाटरवेज मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं।
🔹 शान्तनु ठाकुर को 7 जुलाई 2021 को हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल के फेरबदल के बाद उन्हें मोदी सरकार में पोर्ट्स, शिपिंग और वाटरवेज मंत्रालय में राज्य मंत्री बनाया गया था। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में दोबारा जीत दर्ज करने पर 9 जून 2024 को उन्हें उसी पद पर फिर से नियुक्त किया गया।
🔹 Shantanu Thakur Caste: शान्तनु ठाकुर मतुआ समुदाय से आते हैं और ऑल इंडिया मतुआ महासंघ के नेता भी हैं। मतुआ समुदाय पश्चिम बंगाल में एक प्रमुख अनुसूचित जाति (Dalit/Namasudra) समुदाय माना जाता है। यह समुदाय सामाजिक रूप से दलित हिंदू समाज के काफी करीब माना जाता है, लेकिन धार्मिक पहचान के लिहाज से इसे एक अलग पंथ के तौर पर देखा जाता है। बंगाल की राजनीति में मतुआ समुदाय का खास असर रहा है और शान्तनु ठाकुर इसी सामाजिक आधार से निकलकर राजनीति में आगे बढ़े हैं।
🔹 2019 में शान्तनु ठाकुर ने अपनी चाची ममता ठाकुर को हराकर यह सीट जीती थी। वे पूर्व बंगाल मंत्री मंजुल कृष्ण ठाकुर के बेटे हैं। शिक्षा के लिहाज से वे इंग्लिश ऑनर्स ग्रेजुएट हैं और हॉस्पिटैलिटी मैनेजमेंट में डिप्लोमा कर चुके हैं।
🔹 शिक्षा की बात करें तो शान्तनु ठाकुर ने इंग्लिश (ऑनर्स) में स्नातक की डिग्री हासिल की है। इसके साथ ही उनके पास हॉस्पिटैलिटी मैनेजमेंट में एडवांस्ड डिप्लोमा भी है। उन्होंने अपनी पढ़ाई कर्नाटक ओपन यूनिवर्सिटी और ऑस्ट्रेलिया की विक्टोरिया यूनिवर्सिटी, सिडनी से पूरी की है।
🔹 राजनीतिक विरासत भी उनके साथ जुड़ी रही है। वे पश्चिम बंगाल के पूर्व मंत्री मंजुल कृष्ण ठाकुर के बेटे हैं। इसके अलावा वे ऑल इंडिया मतुआ महासंघ के एक प्रमुख नेता भी माने जाते हैं, जिसकी बंगाल के मतुआ बहुल इलाकों में मजबूत पकड़ है।
🔹 संसदीय कार्यों में भी शान्तनु ठाकुर सक्रिय रहे हैं। वे ग्रामीण विकास मंत्रालय और पंचायती राज मंत्रालय की सलाहकार समितियों के सदस्य हैं। इससे पहले वे 13 सितंबर 2019 से 7 जुलाई 2021 तक वाणिज्य संबंधी स्थायी समिति के सदस्य के रूप में भी काम कर चुके हैं। कुल मिलाकर, शान्तनु ठाकुर बंगाल की राजनीति में मतुआ समुदाय का एक अहम चेहरा और केंद्र सरकार में प्रभावशाली युवा मंत्री माने जाते हैं।
🟡 CAA, NRC और सियासी आरोप
तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार कह रही हैं कि SIR दरअसल NRC का पिछला दरवाजा है, जिससे हजारों मतुआ नागरिकता के संकट में आ सकते हैं। बीजेपी इन आरोपों को खारिज करते हुए कह रही है कि CAA मतुआ समुदाय की सुरक्षा की गारंटी है। ठाकुरनगर और आसपास दोनों पार्टियां कैंप लगाकर लोगों को कागजात जुटाने में मदद कर रही हैं।
🟡 मुस्लिम समुदाय में भी डर
SIR की मार सिर्फ मतुआ तक सीमित नहीं है। मुस्लिम बहुल इलाकों में भी चिंता है। चुनाव आयोग ने सीमा से सटे जिलों में दावों और आपत्तियों पर खास फोकस की बात कही है। नाम, पिता के नाम या बच्चों की संख्या में गड़बड़ी जैसी 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' को लेकर लोगों को समन मिलने का डर सता रहा है। कई लोग इसे अनावश्यक परेशान करने वाली प्रक्रिया मान रहे हैं।
🟡 बंगाल की राजनीति में आगे क्या
'1 लाख मतुआ बनाम 50 लाख मुस्लिम' बयान ने SIR को सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रहने दिया। यह अब पहचान, नागरिकता और वोट की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है। आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले यह देखना अहम होगा कि बीजेपी अपने नाराज मतुआ वोटरों को कैसे संभालती है और SIR का यह विवाद बंगाल की राजनीति को किस दिशा में ले जाता है।
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