ब्लू-आइड बॉय से साइडलाइन तक: राघव चड्ढा की बदलती राजनीति की कहानी
Raghav Chadha Sidelined: आम आदमी पार्टी (AAP) में एक बड़ा संगठनात्मक बदलाव आया है। पार्टी ने अपने युवा चेहरे और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता (Deputy Leader) के पद से हटा दिया है। उनकी जगह पंजाब के सांसद अशोक कुमार मित्तल को नया उपनेता नियुक्त कर दिया गया है।
ऐसा लगता है कि कल की बात हो। आंदोलन के बाद पार्टी जनलोकपाल का आंदोलन केंद्र के विरोध का आंदोलन बन चुका था। हर दिन एक-एक करके केंद्र के मंत्रियों से लेकर देश के बड़े उद्योगपतियों के खिलाफ आम आदमी पार्टी मोर्चा खोले हुए थी। पर जब भी आर्थिक आंकड़े की बात हो या फिर कोई पॉलिसी की, एक स्मार्ट सा यंग लड़का बड़े नेताओं के पीछे-पीछे कॉलेज स्टूडेंट्स की तरफ फाइल लेकर आगे-पीछे करता रहता। बाद के दिनों में प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने के बाद मीडिया के क्वेरी को समझाते रहते। इसके बाद जल्द ही पार्टी के प्रवक्ता बनने से लेकर टीवी डिबेट में पार्टी को डिफेंड करने से लेकर पार्टी के रणनीति के कोर हिस्से में चले गए।

एक चेहरा ऐसा था, जो हमेशा बड़े नेताओं के पीछे-पीछे फाइल लिए नजर आता था। स्मार्ट, पढ़ा-लिखा और हर मुद्दे पर तैयार, ये हैं राघव चड्ढा। जनलोकपाल आंदोलन के बाद जब पार्टी केंद्र सरकार और बड़े उद्योगपतियों के खिलाफ आक्रामक रुख में थी, तब राघव बैकग्राउंड में रहकर डेटा और पॉलिसी की समझ के साथ अपनी पहचान बना रहे थे। धीरे-धीरे वही लड़का प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद मीडिया के सवालों को समझाने लगा और फिर पार्टी का ऑफिशियल प्रवक्ता बन गया। टीवी डिबेट्स में आक्रामक अंदाज में पार्टी का पक्ष रखने वाले राघव जल्द ही AAP की रणनीतिक टीम का अहम हिस्सा बन गए।
जब पार्टी की दिल्ली में दूसरी बार सरकार बनी तो दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष बनाए गए। इसके साथ ही पार्टी के मुखिया और उस वक्त के तात्कालिक उपमुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सबसे खास सिपहसालारों में नजर आने लगे। एक दौर ये भी जब पार्टी के पुराने साथी प्रशांत भूषण से लेकर कुमार विश्वास तक एक-एक कर के जा रहे थे, तब तमाम मौकों पर अरविंद केजरीवाल और उनकी नीति को बढ़-चढ़कर डिफेंड करने वाले मुखर वक्ता के तौर पर उभरकर सामने आए राघव चढ्ढा।
पार्टी ने 2019 में राघव चड्ढा को साउथ दिल्ली से लोकसभा उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ाया पर रमेश बिधूड़ी से चुनाव हार गए। इसके बावजूद भी राघव का बढ़ता कद उनको दिल्ली के अलावा बाहर के राज्यों में भी पार्टी का कामकाज संभालने की जिम्मेदारी मिलनी शुरू हो गई। 2017 के विधानसभा चुनाव में जब संजय सिंह की नेतृत्व में पंजाब में पार्टी को सफलता नहीं मिली तो पार्टी ने इसके बाद राघव चढ्ढा को पंजाब की जिम्मेदारी दी। इधर राघव ने अपने आप को चुनावी राजनीति के भी दांव आजमाने के लिए 2020 में दिल्ली के राजेंद्र नगर से विधायक चुने गए। पर असल जीत उनको पंजाब में 2022 में विधानसभा चुनाव में मिली पर उनकी पार्टी ने भगवंत मान के नेतृत्व में सरकार बनाई। जीत का सेहरा राघव चड्ढा के माथे चढ़ा और इसका फल भी उनको मिला जब पार्टी ने 2022 में उनको पंजाब से राज्यसभा के लिए मनोनीत किया।
राघव की गिनती पार्टी के टॉप के नेताओं में होने लगी। राज्यसभा में पहले से मौजूद दिल्ली से राज्यसभा के सांसद संजय सिंह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर राघव सरकार को घेरते नजर आए। वहीं पंजाब में भगवंत मान की सरकार के दिल्ली से भेजे गए रिमोट कंट्रोल के तौर पर काम करने का आरोप भी लगा। कांग्रेस-अकाली दल समेत राजनीति दलों ने आरोप लगाया कि राघव चड्ढा दिल्ली के उस वक्त के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के इशारे पर पूरी सरकार का न केवल संचालन कर रहे हैं बल्कि मुख्यमंत्री सचिवालय में बैठकर फाइलों की निगरानी और अपने मुताबिक बदलाव करने का निर्देश भी दे रहे हैं। हालांकि पार्टी से लेकर खुद राघव चड्ढा इस बात से इनकार करते रहे, पर इतना जरूर है कि उनके काफिले में पंजाब पुलिस का कार्केट से लेकर दिल्ली के कोपरनिकस मार्ग स्थित पंजाब भवन में उनका पार्लियामेंट ऑफिस, उनके पीआर टीम के लोगों का बैठना, साथ में उनकी खुद की पीआर टीम का पार्लियामेंट के आकर मीडिया वालों के वन-टू-वन करना, कई बार पंजाब भवन में मीडिया से इंटरेक्शन इस बात की गवाही देते थे कि ये एक आम राज्यसभा सांसद नहीं बल्कि सरकार में गहरी पकड़ रखने वाले सांसद का प्रोटोकॉल हैं।
खैर, समय बीतता गया। इधर जब दिल्ली में पार्टी के एक-एक कर से सभी बड़े नेता एक्साइज घोटाले में जेल गए तो पार्टी को उम्मीद थी कि पार्टी ने जिनको इतना कुछ दिया, वो पार्टी के बड़े नेताओं के समर्थन में आगे केंद्र सरकार का विरोध करेंगे। साथ में दुख के घड़ी में दिल्ली में कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाने के लिए दिल्ली में रहेंगे। पर उस वक्त आंख के ईलाज कराने के नाम पर राघव लगातार दिल्ली से बाहर रहे। यही नहीं, सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाले राघव वहां भी चुपचाप नजर आए। बिना नाम लिए पार्टी के भीतर दबे रूप से आवाज भी आई कि वो लोग कहां हैं जिनको पार्टी ने सबकुछ दिया। ये भी कहा गया कि पंजाब चुनाव में फंडिंग से लेकर दिल्ली जल बोर्ड में हुए बिलिंग के घपले के चक्कर में कहीं राघव ने पाला तो नहीं बदल लिया। इधर दिल्ली से राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल वाले मामले पर भी राघव अलग नजर आए।
बाद में राज्यसभा में पार्टी की लाइन से ज्यादा राघव खुद की ब्रीडिंग के तहत आम लोगों से जुड़े मुद्दे उठाकर काफी चर्चा में रहे। मामला एयरपोर्ट पर मिलने वाले महंगे स्नेक्स का हो या फिर ट्रेनों के बेहतर सुविधा से लेकर बढ़ते एजुकेशन खर्च का मुद्दा। राघव ने अपने आप को राज्यसभा में मिडिल क्लास की आवाज बनकर अपनी एक अलग ब्रांडिंग की। हाल के दिनों में राघव पार्टी के किसी भी बड़े एक्टिविटी में भी नज़र नहीं आए। पर दिल्ली एक्साइज पॉलिसी में केजरीवाल समेत नेताओं को कोर्ट से राहत मिली तब भी पार्टी में हो रहे जश्न में कहीं नजर नहीं आए। साथ ही सोशल मीडिया में भी कहीं नजर नहीं आए। ऐसा नहीं कि सोशल मीडिया से उन्होंने दूरी बना ली हो। अपनी खुद की ब्रांडिंग से लेकर एयरपोर्ट्स पर खोले नए उड़ान कैफे पर खुद चाय पीकर खुद को तो प्रमोट करते नजर आए। अपनी निजी जिंदगी को लेकर गाहे-बगाहे सोशल मीडिया पोस्ट के सहारे नजर आए पर पार्टी को डिफेंड करने से लेकर पार्टी लाइन को लेकर सरकार को घेरते कम दिखे हैं।
टर्निंग पॉइंट तब आया जब दिल्ली एक्साइज पॉलिसी मामले में पार्टी के बड़े नेता जेल जाने लगे। उस वक्त पार्टी को उम्मीद थी कि राघव खुलकर सामने आएंगे, लेकिन वे आंखों के इलाज के नाम पर लंबे समय तक दिल्ली से दूर रहे। सोशल मीडिया पर भी उनकी चुप्पी ने कई सवाल खड़े किए। पार्टी के भीतर भी धीरे-धीरे ये चर्चा होने लगी कि जिन लोगों को पार्टी ने आगे बढ़ाया, वे मुश्किल वक्त में कहां हैं। स्वाति मालीवाल विवाद हो या अन्य राजनीतिक घटनाक्रम, राघव का रुख अलग नजर आने लगा। हाल के समय में वे पार्टी के बड़े कार्यक्रमों और विरोध प्रदर्शनों से भी दूर दिखे। यहां तक कि जब कोर्ट से राहत मिलने के बाद पार्टी जश्न मना रही थी, तब भी उनकी गैरमौजूदगी चर्चा का विषय बनी रही। हालांकि, अपनी पर्सनल ब्रांडिंग और अलग मुद्दों पर वे लगातार एक्टिव रहे।
और आखिरकार वही हुआ जिसकी आशंका थी। पार्टी ने उनको अपनी पार्टी के राज्यसभा में उपनेता के पद से हटा दिया और इनकी सूचना सचिवालय को दे दी। इससे ज्यादा पार्टी कर ही क्या सकती है। पहले ही दिल्ली से सांसद स्वाति मालीवाल बगावत कर चुकी हैं। ऐसे राघव चड्ढा की बारी थी। खैर बतौर सांसद राघव चड्ढा को बोलने की आजादी तो होगी पर पार्टी के कोटे से मिलने वाले समय और मौके का फायदा नहीं मिल पाएगा। पर ये सब इतनी जल्दी होगा उम्मीद नहीं थी। खैर कहावत है कि जितना जल्दी मिलता है वो खत्म भी उतना ही जल्दी होता है।
कभी जो पार्टी के सबसे भरोसेमंद चेहरों में गिने जाते थे, आज वही धीरे-धीरे साइडलाइन होते नजर आ रहे हैं। राजनीति में उभरना जितना तेजी से होता है, उतनी ही तेजी से हालात बदल भी जाते हैं, राघव चड्ढा इसका ताजा उदाहरण हैं। ब्लू-आइड बॉय की छवि वाले इस युवा नेता ने पार्टी के भीतर जो तेजी से तरक्की की, उसी तेजी से आज साइडलाइन पर आ गए हैं। पार्टी के पुराने साथियों के जाने के बाद राघव ने जो जगह भरी, वो जगह आज खाली पड़ गई है। पर ये सब इतनी जल्दी होगा, उम्मीद नहीं थी। खैर कहावत हैं कि जितना जल्दी मिलता हैं, वो खत्म भी उतना ही जल्दी होता हैं। कभी आंखों के तारे रहे, आज आंखों में खटकने लगे।
लेखक के निजी विचार हैं। इसे ओपिनियन के तौर पर लिया जाए।
कुन्दन सिंह
डेप्युटी एडिटर, वन इंडिया
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