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गुजरात चुनाव का सियासी गणित और निर्वाचन आयोग का फार्मूला!

नई दिल्ली। आप यह मान लीजिए कि गुजरात विधानसभा चुनाव भी कमोबेश हिमाचल चुनाव के साथ ही होगा। पर, गेम यह है कि हिमाचल विधानसभा चुनाव के तिथि की घोषणा हो गई और गुजरात के बारे में यह नहीं बताया गया वहां किस तारीख को चुनाव कराए जाएंगे। सरकारी, गैर सरकारी अमलों से जुड़े अमूमन हर व्यक्ति को यह पता होता है कि चुनाव आयोग यानी इलेक्शन कमीशन (ईसी) द्वारा मतदान की तिथि घोषित करते ही उस राज्य में किसी भी तरह के लोक-लुभावन वादे नहीं किए जा सकते। गुजरात में चुनाव की तिथि घोषित न होने से वहां की सियासी गणित को चुनाव आयोग के फार्मूले की दृष्टि से देखा जाने लगा है। परिणामतः चुनाव आयोग पर दबी जुबान से यह संदेह किया जाने लगा है कि उसने गुजरात में मतदान की तिथि की घोषणा न करके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अन्य भाजपा नेताओं को वहां लोक-लुभावन वादे करने की एक मोहलत-सी दे दी है। यद्यपि अक्सर राजनीतिक पार्टियां अनौपचारिक रूप से चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ी करती रहती हैं लेकिन इस बार का मामला अपने तरह का बिल्कुल नया है। आमतौर पर यह मानकर चला जा रहा है कि गुजरात में भी मतदान हिमाचल प्रदेश की मतदान तिथि के दो-चार दिन आगे-पीछे ही होगा, फिर चुनाव आयोग को तिथि घोषित करने में क्या दिक्कत थी। यद्यपि विपक्षी दल चुनाव आयोग पर यह आरोप लगा रहे हैं कि उसने भाजपा नेताओं को गुजरात में खिसकती सियासी जमीन बचाने का एक मौका दिया है। आपको बता दें कि 16 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात के दौरे पर जाने वाले हैं। स्वाभाविक है, वे वहां कथित 'जुमलों' की बरसात करेंगे।

EC
हिमाचल विधानसभा चुनाव की तिथि घोषित होते ही देश की सियासत बेहद रोचक मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। 09 नवम्बर को हिमाचल प्रदेश में मतदान होगा और 18 दिसम्बर को मतगणना होगी। निःसंकोच यह सवाल हो रहा है कि आखिर किन मजबुरियों की वजह से चुनाव आयोग ने गुजरात चुनाव की तिथि घोषित नहीं की। जबकि चुनाव कराने की समय सीमा कमोबेश एक ही है। जानकार बताते हैं कि चुनाव आयोग भले ही स्वायतशासी महकमा है, फिर भी उस पर अनौपचारिक रूप से केन्द्र सरकार का अंकुश तो रहता ही है। राजनीति के जानकार स्पष्ट रूप से यह संकेत दे रहे हैं कि गुजरात में पिछले करीब 22 वर्षों से सत्तासीन भाजपा की हवा इसबार कुछ अनुकूल-सी प्रतीत नहीं हो रही है। वहां कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी बिल्कुल नए अवतार में नजर आ रहे हैं। यानी हवा प्रतिकूल होने के कारण जहां भाजपा रक्षात्मक मोड में है, वहीं कांग्रेस अक्रामक मोड में। कांग्रेस के लिए गुजरात में कैम्प कर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तथा मध्य प्रदेश के विधायक व कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव जीतू पटवारी तरह-तरह की रणनीतियां बना रहे हैं। परिणामस्वरूप एक तो वहां सत्ताविरोधी लहर चलने लगी है और दूसरे कांग्रेसी कार्यकाल के पुराने दिनों को याद कर गुजरात के लोग राहुल गांधी के करीब आते दिख रहे हैं। हाल ही में राहुल गांधी ने गुजरात के मंदिर में हवन, पूजन के साथ आदिवासी नृत्य किया था। दलितों, पाटीदारों का समर्थन भी कांग्रेस को मिलने लगा है। इससे कांग्रेस उत्साहित है, भाजपा में हताशा देखी जा रही है। हां, चुनाव आयोग ने गुजरात चुनाव की तिथि घोषित न कर उसे कथित रूप से वाक-ओवर देने की कोशिश जरूर की है।

गुजरात के मूल निवासी पीएम मोदी लोकसभा चुनाव में बड़े बहुमत से केंद्र की सत्ता में आए थे। उसके बाद कई राज्यों के चुनाव में बीजेपी को सफलता मिली है लेकिन बीबीसी ने यह संकेत दिए हैं कि अपने ही गृहराज्य गुजरात में उनकी पार्टी को इस बार काफ़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। विकास का नारा देने वाले मोदी और बीजेपी इस वक्त राज्य में कई सवालों से जूझ रहे हैं। साथ ही, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी उन्हें घेरने के लिए लगातार अक्रामक दिख रहे हैं। राहुल गांधी के जवाब और गुजरात में भाजपा की लहर पैदा करने के लिए भाजपा के पास सिर्फ हिन्दुत्व का नारा एक मुद्दा बचा है। अब यदि हिन्दुत्व की बात करें तो यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बेहतर चेहरा भाजपा के पास कोई नहीं है। यही वजह है कि गुजरात में शुरू हुई भाजपा की गौरव यात्रा में मुख्य चेहरा के रूप में योगी आदित्यनाथ को भेजा गया है। इससे पूर्व योगी आदित्यनाथ केरल में राजनीतिक हत्याओं के विरोध में बीजेपी की यात्रा में भी शामिल हुए थे। गुजरात में स्थानीय राजनीति की समझ रखने वालों का कहना है कि 2002 और 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़ा गया था, तब हिंदुत्व को एजेंडा बनाया गया था। जबकि मोदी ने 2012 के चुनाव में गुजरात के विकास की बात की और 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने गुजरात के विकास के मॉडल को देश के सामने रखा। लेकिन अब लोग इसे मानने को तैयार नहीं हैं। फलतः बीजेपी फिर से हिंदुत्व के सहारे गुजरात चुनाव जीतना चाहती है। इसीलिए योगी को लाया गया है।

गुजरात में पिछले कुछ महीनों से सोशल मीडिया पर 'विकास पगला गया है' जैसे ट्रेंड से मोदी और बीजेपी की किरकिरी हुई है। ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनाव में अपना गढ़ बचाने की जुगत में बीजेपी ने एक अक्तूबर से गौरव यात्रा की शुरुआत की, जिसका कई जगह पर विरोध भी देखने को मिला है। जबकि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की नवसर्जन यात्रा को अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। गौरव यात्रा को अच्छी प्रतिक्रिया न मिलने से संकेत मिलता है कि बीजेपी किस तरफ़ जा रही है, शायद फिर अपने पुराने फ़ॉर्मूले की तरफ़ बढ़ रही है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले 2017 का गुजरात चुनाव मोदी और बीजेपी के लिए नाक की लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा है। बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह की रणनीति के अच्छे परिणाम बीजेपी को कई राज्यों में मिल चुके हैं, लेकिन गुजरात का चुनाव आसान नहीं दिखता। नोटबंदी, जीएसटी से व्यापारियों की नाराज़गी, पटेल आरक्षण आंदोलन, दलितों की नाराज़गी जैसी कई मुश्किलें बीजेपी के सामने हैं। रही-सही कसर जय शाह की 16 हजार गुणा बढ़ी सम्पति ने पूरी कर दी है। इस बीच कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी गुजरात में पूरा दम लगा दिया है। लेकिन ज़मीनी स्तर पर बीजेपी की तैयारी मज़बूत मानी जाती है। क्योंकि बूथ लेवल तक बीजेपी अपने कार्यकर्ता तैयार करती है। सबके बावजूद नोटबंदी, जीएसटी समेत कई स्थानीय समस्याओं ने कांग्रेस में जान फूंक दी। इसकी शुरुआत राज्यसभा चुनाव में अहमद पटेल की जीत से हो गई थी।

उधर, पटेल आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हार्दिक पटेल भी ट्वीट करके राहुल गांधी का गुजरात में स्वागत कर रहे हैं। पाटीदार और हार्दिक पटेल को लेकर भाजपा में घबराहट है। बीते माह हार्दिक पटेल के ख़िलाफ़ मुकदमे हो रहे थे, अब स्थिति ये है कि सरकार पाटीदारों से समझौता चाह रही है। बहरहाल, चुनाव आयोग द्वारा गुजरात में चुनाव की तिथि घोषित न किए जाने पर हिन्दी पोर्टल नवजीवन ने लिखा है कि पीएम मोदी व बीजेपी नेता पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने का राग अलाप रहे हैं, लेकिन सिर्फ दो राज्यों के चुनाव भी एक साथ कराने में लगता है चुनाव आयोग सक्षम नहीं है। इसीलिए चुनाव आयोग ने सिर्फ हिमाचल के लिए ही चुनाव तारीखों का ऐलान किया और गुजरात को टाल दिया। हालांकि इन दोनों ही राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल जनवरी 2018 में खत्म हो रहा है। हिमाचल विधानसभा का कार्यकाल 7 जनवरी तक है जबकि गुजरात का 23 जनवरी तक। नवजीवन के अनुसार, 16 अक्टूबर को पीएम मोदी का गुजरात दौरा होने वाला है। माना जा रहा है कि इस दौरे में वे गुजरात के लिए कुछ घोषणाएं कर सकते हैं। ऐसे में अगर आयोग हिमाचल के साथ गुजरात चुनाव की तारीखों का भी ऐलान कर देता तो आचार संहिता लागू हो जाती। फिर कोई घोषणा नहीं हो सकती थी। सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री के गुजरात दौरे और संभावित घोषणाओं के बाद ही गुजरात चुनाव की तारीखों का ऐलान होगा। कांग्रेस ने इसे वोटरों को लुभाने की कोशिश बताया है, जिसमें चुनाव आयोग भी कथित भागीदार बनकर अपनी किरकिरी करा रहा है।

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