कोरोना: क्या लॉकडाउन में 'डायमंड सिटी' ने अपनी चमक खो दी है?
सूरत को गुजरात का 'डायमंड सिटी' कहा जाता है. हीरे के साथ-साथ यह शहर कपड़ा उद्योग के लिए भी मशहूर है.
गुजरात में कोरोना संक्रमण के सबसे अधिक मामले अहमदबाद के बाद सूरत में ही है. यह देश के उन 20 शहरों में है जहां कोरोना संक्रमण के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं.
केंद्र सरकार ने यहाँ की स्थिति का मुआयना करने के लिए एक टीम भेजने का फ़ैसला किया है.
कोरोना के इस संकट से जूझ रहे सूरत के सामने एक दूसरा संकट इसके हीरे और कपड़े उद्योग का ठप पड़ जाने का भी है.
इन दोनों ही उद्योगों से जुड़े लाखों मज़दूरों बदहाली के शिकार हो चुके हैं.
मज़दूर सड़कों पर निकल आए...
व्यापारियों और प्रशासकों का दावा है कि वो मज़दूरों की मदद कर रहे हैं.
लेकिन ऐसे कई उदाहरण पिछले दिनों सामने आए हैं जिनमें प्रवासी मजदूरों का असंतोष ज़ाहिर हुआ है.
22 मार्च को हुए जनता कर्फ़्यू और लॉकडाउन के तीसरे चरण के दौरान यह नाराज़गी देखने को मिली थी. सूरत में मज़दूर सड़कों पर निकल आए और पत्थरबाज़ी की.
पुलिस के साथ उनकी झड़प होने की भी ख़बरें हैं.
गुजरात सरकार ने हाल ही में प्रवासी मजदूरों को अपने-अपने गांव जाने की इजाज़त दी है.
लेकिन दूसरे राज्यों से अनुमति नहीं मिलने की वजह से मज़दूर राजस्थान और मध्य प्रदेश की सीमा पर फंस गए.
हीरे के व्यवसाय पर असर
सूरत के हीरा व्यावसाय लाखों लोगों को रोज़गार देता है. इसमें मुख्य तौर पर राजस्थान, बिहार और उत्तर प्रदेश से आए मज़दूर काम करते हैं.
गुजरात के जेम एंड ज्वैलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन दिनेश नवाड़िया का कहना है कि हीरा उद्योगपतियों ने मार्च की तनख्वाह के साथ-साथ मज़दूरों को ढेर सारी खाने-पीने की चीज़ें दी हैं.
प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा के बारे में बात करते हुए दिनेश नवाड़िया कहते हैं, "चूंकि गुजरात में 22 मार्च के जनता कर्फ़्यू से पहले ही सोशल डिस्टेंसिंग का पालन शुरू हो गया था इसलिए यहां कई कंपनियों में काम बंद कर दिया गया था."
उनका कहना है कि देश से हीरे का 95 फ़ीसदी निर्यात अमरीका, चीन, हांगकांग और यूरोपीय देशों में होता है. इनमें से अमरीका के साथ 40 फ़ीसदी, हांग कांग के साथ 38 फ़ीसदी, चीन के साथ चार से पांच फ़ीसदी और यूरोपीय देशों के साथ 15 फ़ीसदी व्यापार होता है.
सूरत और मुंबई
वो कहते हैं, "कोरोना वायरस के संक्रमण से चूंकि दुनिया भर के बाज़ार बंद पड़े हुए हैं इसलिए गुजरात के हीरा व्यापार पर इसका असर पड़ा है. वो कहते हैं कि जब तक सूरत रेड ज़ोन में है तब तक कोई काम यहां शुरू नहीं हो सकता है."
"राजकोट, जूनागढ़ और सौराष्ट्र के अमरेली और पालनपुर जैसे ज़िलों की छोटी इकाइयाँ भी तब तक काम नहीं करेंगी जब तक कि सूरत और मुंबई में डायमंड के चमकाने का काम शुरू नहीं हो जाता है."
हालांकि दिनेश नवाड़िया ने बीबीसी को बताया कि सूरत से हांग कांग निर्यात शुरू हो चुका है और कुछ इकाइयों में काम भी शुरू हो चुका है.
कुछ व्यावसायियों का कहना है कि चूंकि हीरा एक लग्ज़री आइटम है ना कि अनिवार्य ज़रूरत की चीज़ इसलिए अभी के अनिश्चितता भरे माहौल में लोग हीरा खरीदने के बारे में नहीं सोचेंगे.
'मुश्किल वक्त आने वाला है'
दिनेश नवाड़िया बताते हैं कि "सूरत के हीरा मार्केट में सात लाख मज़दूर काम करते हैं जिसमें से अब तक क़रीब दो लाख मज़दूर अपने-अपने घरों को लौट चुके हैं."
उनके मुताबिक़ अगर लॉकडाउन में राहत दी जाती है तब भी सूरत में सिर्फ 30-35 फ़ीसदी इकाइयां ही शुरू हो सकती है क्योंकि बाज़ार में न तो कोई मांग है और न ही सूरत में अब पर्याप्त मज़दूर बचे हैं.
उनका कहना है, "मज़दूरों को भी स्थिति का अंदाजा है और वो समझ रहे हैं कि आने वाला वक्त मुश्किल भरा होगा और हीरा व्यावसाय को फिर से खड़ा होने में वक्त लगेगा. वो अपने-अपने घर पहुँचने के लिए बेचैन हैं."
वो कहते हैं कि आने वाले वक्त में व्यापारियों को मज़दूरों को सैलरी देने में मुश्किलें खड़ी होंगी.
कपड़ा उद्योग के मज़दूर
श्री राम कृष्ण एक्सपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक और चेयरमैन गोविंद ढोलकिया ने बीबीसी से कहा, "हीरा उद्योग में काम करने वाले अधिकतर मज़दूर गुजरात के दूसरे प्रदेशों से आते हैं और सिर्फ 20 फ़ीसदी मज़दूर दूसरे राज्यों से आते हैं. हीरे के उद्योगपति और इस उद्योग में काम करने वाले कामगार एक परिवार की तरह हैं. वो कामगारों का पूरा ख़याल रखते हैं. सूरत में मज़दूरों के बीच जो असंतोष है वो मुख्य तौर पर कपड़ा उद्योग के मज़दूरों का है. सूरत में एक बड़ा कारोबार कपड़े के उद्योग का भी है."
उनका यह भी कहना है, "हीरा उद्योगपतियों ने मज़दूरों को मार्च की सैलरी दी है. कुछ ही ऐसी कंपनियां होंगी जिन्हें मजरों को सैलरी देने में कठिनाई आई होगी."
उन्होंने कहा कि कपड़ा उद्योग के 90 फ़ीसदी मजदूर दूसरे राज्यों से आते हैं और वो मुश्किल हालत में यहां रहते हैं.
गोविंद ढोलकिया की कंपनी में लगभग पांच हज़ार मज़दूर काम करते हैं.
वो कहते हैं, "यह एक अभूतपूर्व स्थिति है किसी को इसका अनुभव नहीं है. अगर सरकार ने लॉकडाउन की घोषणा से पहले दो दिनों का समय मज़दूरों को घर जाने के लिए दिया होता तो हमें ये अंसतोष नहीं देखना पड़ता."
इलाज की व्यवस्था
नाम ना छापने के शर्त पर एक दूसरी कंपनी के मालिक का कहना है कि सौराष्ट्र में मज़दूर अपने-अपने गांवों पहुंच कर खेती के काम में लग गए होते, अगर उनकी सूरत से जाने की व्यवस्था कर दी गई होती.
वो कहते हैं, "यह हर किसी के लिए मुश्किल वक्त है और हीरा उद्योग को आने वक्त में अपने काम करने के तरीके को बदलना होगा. मौजूदा वक्त में सरकार क्वारंटीन और इलाज की व्यवस्था कर रही है लेकिन आने वाले वक्त में जब उद्योग-धंधे खुलेंगे तब सारी ज़िम्मेदारी व्यापारियों को उठानी होंगी."
उन्होंने यह भी कहा कि सूरत का हीरा उद्योग लोगों की मदद के लिए सामने आया है.
दिनेश नवाडिया का दावा है कि मौजूदा मुश्किल दौर में कई स्वयंसेवी संगठनों ने आगे बढ़कर मदद की है. उनका कहना है कि उनकी काउंसिल ने मज़दूरों के लिए पांच करोड़ की मदद की है.
कपड़ा व्यावसाय पर क्या प्रभाव पड़ा है?
सूरत के कपड़ा उद्योग में लाखों मज़दूर काम करते हैं. इसमें से 80-90 फ़ीसदी मज़दूर प्रवासी हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि कपड़ा उद्योग अपना 35-40 फ़ीसदी कारोबार मार्च, अप्रैल और मई के महीने में करता है, क्योंकि इन महीनों के दौरान शादियों और त्यौहारों का मौसम होता है.
लेकिन इस साल इन महीनों में व्यापारियों को लॉकडाउन की वजह से भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है.
कपड़ा उद्योग की तीन शाखाएं होती हैं- बुनकर, प्रोसेसर और व्यापारी. ये एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते है. लेकिन अभी कपड़ा उद्योग का सारा काम काज ठप पड़ा हुआ है.
दस लाख से ज़्यादा मज़दूर
दक्षिण गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जीतू भाई वखाड़िया का कहना है कि फिलहाल 325 टेक्सटाइल प्रोसेसिंग हाउस बंद है, पांच से छह लाख करघे जहाँ बुनाई का काम होता है, सब बंद पड़े हैं. कर्फ़्यू के कारण 60 से 65 हज़ार कपड़े की दुकानें सूरत में बंद हैं.
जीतू भाई कहते हैं कि पांच से छह लाख कारीगर बुनाई का काम करते हैं और दस लाख से ज़्यादा मज़दूर इस उद्योग में काम करते हैं.
सूरत के व्यापारियों का कहना है कि व्यापारियों को 20 मार्च के क़रीब सोशल डिस्टेंसिंग के पालन करने को लेकर गाइडलाइन आने के बाद काम बंद कर देना था.
व्यापारियों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि लॉकडाउन खुलने के बाद भी कपड़ा उद्योग को पहले की बुलंदी तक पहुँचने में वक्त लगेगा.
एक तरफ समुद्र तो दूसरी तरफ खाई
कुछ व्यावसायियों का कहना है कि जनवरी, फरवरी और मार्च का भुगतान थोक बाज़ार में अब तक नहीं हुआ है जिस कारण काम शुरू करने के लिए उनके पास अब पैसा नहीं है.
जीतू भाई अनुमान लगाते हैं, "एक मिल को हर महीने औसतन एक करोड़ का नुकसान हो रहा है. सूरत के कपड़ा उद्योग को हर रोज़ तकरीबन 100-125 करोड़ का नुकसान हो रहा है."
वो कहते हैं, "हमारे सामने अभी आगे समुद्र पीछे खाई वाली स्थिति पैदा हो गई है. सराकर ने मज़दूरों को सैलरी, खाना और दूसरी सुविधाएँ देने को कहा है लेकिन जब उद्योग-धंधे बंद पड़े हुए हैं और कमाई ठप पड़ी हुई है तो फिर हम कैसे पैसे देंगे?"
उनका कहना है कि सरकार ने मज़दूरों की समस्या को लेकर बात की है, बिजली बिल को लेकर भी छूट दी है लेकिन व्यापारियों को ब्याज भी चुकाना होता है.
वो कहते हैं "हमारे जैसे मिडल क्लास के व्यापारी के लिए कहाँ कोई राहत है?"
कोरोना वायरस की महामारी
फ़ेडरेशन ऑफ़ सूरत टेक्सटाइल ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज अग्रवाल कहते हैं, "जीएसटी की वजह से कपड़ा उद्योग पहले से ही संकट में था और अब इस कोरोना वायरस की महामारी ने पूरी दुनिया के बाज़ार को हिला कर रख दिया है."
उनका कहना है कि करोड़ों का सामान कपड़ा उद्योग के बुनकर, प्रोसेसर, ट्रांसपोर्टर और व्यापारियों के चेन के बीच फंस कर रह गया है.
उन्होंने बताया, "सूरत के कपड़ा बाज़ार में क़रीब 65,000 दुकानें खुली हैं. कपड़ा थोक बाज़ार में पांच से छह लाख मज़दूर काम करते हैं. ये मज़दूर अलग-अलग शिफ्ट में काम करते हैं और अमूमन छोटे-छोटे कमरों में रहते हैं. जब से कोरोना वायरस का संक्रमण शुरू हुआ और बाज़ार बंद हुआ तब से उनके लिए छोटे-छोटे कमरों में रहना मुश्किल हो गया है."
उनका कहना है कि "पड़ोसी राज्य के मज़दूर बस और गाड़ियां किराए पर लेकर अपने-अपने घरों के लिए रवाना हो गए हैं. जो पैसे नहीं दे पाए वो पैदल ही चल दिए. उनकी इतनी जल्दी लौटने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं. आने वाले दिनों में सिर्फ 10-20 फीसदी उद्योग ही खुल पाएँगे."
क्या कहते हैं अधिकारी?
मनोज अग्रवाल के मुताबिक़ उनकी फैक्ट्री में काम करने वाले मज़दूर झारखंड में अपने गांव लौट गए हैं. उनका कहना है कि कपड़ा उद्योग में काम करने वाले मज़दूरों मार्च में सैलरी दी गई थी और उन्हें अप्रैल के महीने में भी पैसा और खाने को दिया गया था.
मनोज अग्रवाल का कहना है कि अब भी सूरत में बड़ी संख्या में मज़दूर है जो घर जाना चाहते हैं.
लॉकडाउन के पहले चरण से ही सूरत में मज़दूरों के असंतोष की ख़बरें आनी शुरू हो गई थीं. सरकार को मज़दूरों को उनके घरे भेजने के लिए विशेष ट्रेन चलाने में एक महीने से ज़्यादा का वक्त लग गया.
सूरत में जब मज़दूरों को बसों का किराया खुद से देने के लिए कहा गया तो इसे लेकर भी विवाद हुआ. मज़दूरों ने खाना और पैसे नहीं देने की शिकायतें कीं और ना ही उन्हें यह बताया गया कि उन्हें कहाां से कैसे मदद मिलेगी.
मज़दूरों का बवाल
नवसारी से बीजेपी के सांसद सीआर पाटिल ने बीबीसी को बताया कि सूरत में बड़ी संख्या में मज़दूर लॉकडाउन के दौरान आराम से रह रहे हैं.
उनका कहना है, "मुंबई के बाद सूरत एकमात्र शहर है जहाँ इतनी बड़ी संख्या में प्रवासी मज़दूर रहते हैं."
सीआर पाटिल का दावा है कि कुछ लोगों ने मज़दूरों को बवाल काटने के लिए उकसाया था. जब उनसे पूछा गया कि मज़दूरों को किसने भड़काया था और क्या उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई की गई, तब उनका जवाब था कि अभी कोरोना वायरस को नियंत्रित करने पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए.
सूरत के माजुरा क्षेत्र से विधायक हर्ष सांघवी ने बीबीसी से कहा, "प्रवासी मज़दूर सूरत शहर के अभिन्न हिस्सा हैं. वो जिन परिस्थितियों में रहते हैं, उसमें सुधार की जरूरत है."
वो कहते हैं, "प्रवासी मज़दूरों की देखभाल का ज़िम्मा व्यापारियों का होना चाहिए. व्यापारी इन मज़दूरों की कड़ी मेहनत की बदौलत बहुत कमाते हैं. उन्हें इन मज़दूरों की मानवीय आधार पर मदद करनी चाहिए."
सरकार की मदद का वादा
सीआर पाटिल और हर्ष संघवी का दावा है कि सूरत में एक भी मज़दूर भूखा नहीं सो रहा है क्योंकि स्वंयसेवी संगठनों ने उन्हें खाने-पीने की चीज़ें देकर उनकी मदद की है.
उन्होंने आने वाले वक्त में सूरत के उद्योग-धंधे को फिर से उठ खड़े होने के लिए सरकार की मदद का वादा भी किया है.
वो कहते हैं, "आने वाले दिनों में मज़दूरों के बिना काम नहीं शुरू होने वाला. इसलिए इस बात पर ज़ोर देना ठीक नहीं होगा कि जो वाकई में जरूरतमंद है, वो घर वापस लौट जाएं."
हालांकि हर्ष संघवी ने कहा कि सरकार लौट गए मज़दूरों को वापस लाने की योजना पर भी काम करेगी.
लेकिन तमाम दावों के बावजूद यह सवाल उठता है कि लाखों मज़दूर जिनके पास न काम है और न पैसे, उनका ख़याल कौन रखेगा?
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