शांति प्रक्रिया पर अनिश्चितता के कारण बढ़ाया गया अफस्पा?

जनवरी 2021: नागालैंड के दीमापुर में अफस्पा के विरोध में निकाले गए एक शांति मार्च की तस्वीर

नई दिल्ली, 04 अक्टूबर। नागा शांति प्रक्रिया पर जारी अनिश्चितता के कारण ही केंद्र को असम के कुछ हिस्सों के अलावा, मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफस्पा) को और छह महीने के लिए बढ़ाना पड़ा है. लेकिन नागालैंड में इसका विरोध शुरू हो गया है. यह विवादास्पद अधिनियम अरुणाचल के कुछ जिलों को छोड़कर नागालैंड, असम, मणिपुर में लागू है. इसे वर्ष 2015 में त्रिपुरा, 2018 में मेघालय और 1980 के दशक में मिजोरम से हटा लिया गया था.

केंद्र सरकार ने शुक्रवार को नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के 12 जिलों और दो पूर्वोत्तर राज्यों के पांच अन्य जिलों के कुछ हिस्सों में इस विशेषाधिकार कानून की मियाद और छह माह के लिए बढ़ा दी थी. उग्रवाद और आतंकवाद पर काबू पाने के लिए सुरक्षा बलों को इस कानून के तहत असीमित अधिकार दिए गए हैं.

11 सितंबर, 1958 को बने सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (अफस्पा) को पहली बार नागा पहाड़ियों में लागू किया गया था. वह उस समय असम का ही हिस्सा थीं. उग्रवाद के पांव पसारने के साथ इसे धीरे-धीरे पूर्वोत्तर के तमाम राज्यों में लागू कर दिया गया. इस विवादास्पद कानून के दुरुपयोग के खिलाफ बीते खासकर दो दशकों के दौरान तमाम राज्यों में विरोध की आवाजें उठती रहीं हैं. लेकिन केंद्र व राज्य की सत्ता में आने वाले सरकारें इसे खत्म करने के वादे के बावजूद इसकी मियाद बढ़ाती रही हैं.

इम्फाल में स्थित मणिपुर असेंबली की इमारत

अमित शाह कह चुके हैं 2024 से पहले सुलझेगी समस्या

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बीते महीने 15 सितंबर को कहा था कि सरकार वर्ष 2024 से पहले इलाके में तमाम राज्यों के बीच चल रहे सीमा विवाद को सुलझाने और तमाम हथियारबंद उग्रवादी गुटों के साथ समझौते का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है. इससे पहले बीती दस मई को उन्होंने असम के तमाम इलाकों से उक्त अधिनियम खत्म करने का भी भरोसा दिया था.

यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि केंद्र सरकार नागा राजनीतिक मुद्दे के समाधान के लिए वर्ष 1997 से ही नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नागालैंड (इसाक-मुइवा गुट) और सात अन्य नागा संगठनों के साथ बातचीत कर रही है. बातचीत में शामिल इसाक-मुइवा गुट नागालैंड के अलावा पड़ोसी असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के नागा बहुल इलाकों को मिला कर ग्रेटर नागालैंड या नागालिम का गठन करने के साथ ही अपने लिए अलग झंडे और अलग संविधान की मांग करता रहा है.

अफस्पा को बढ़ाने के पीछे दलीलें

नागालैंड के एक शीर्ष पुलिस अधिकारी बताते हैं कि सीमावर्ती इलाकों में उग्रवादी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए अफस्पा को बढ़ाना जरूरी था.

मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह कहते हैं, "राज्य के कुछ हिस्सों से उक्त अधिनियम हटाने के बाद 78 उग्रवादी राष्ट्र की मुख्यधारा में सामिल हो चुके हैं. ज्यादातर उग्रवादी संगठन सरकार के साथ युद्ध विराम पर हस्ताक्षर कर चुके हैं."

मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह भी अफस्पा हटाने के पक्ष में बयान दे चुके हैं

फिलहाल नागालैंड और म्यांमार से लगे राज्य के सीमावर्ती इलाकों में ही उक्त अधिनियम लागू है. मणिपुर तो लंबे अरसे तक इस कानून के खिलाफ विरोध और आंदोलन का केंद्र रहा है.

लौह महिला के नाम से मशहूर इरोम शर्मिला ने इसके खिलाफ वर्षों लंबी भूख हड़ताल की थी. इसके अलावा मनोरमा नामक युवती से रेप के बाद उसकी हत्या के विरोध में महिलाओं ने राजधानी इंफाल में असम पुलिस के मुख्यालय कांगला फोर्ट के सामने निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया था. वर्ष 2004 में उस तस्वीर ने पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थी.

इसी तरह अरुणाचल प्रदेश में असम से सटे तिराप, चांगलांग और लांगडिंग जिलों के अलावा नामसाई जिले के दो थाना इलाके में इस अधिनियम को बढ़ा दिया गया है.

असम के विशेष पुलिस महानिदेशक जी.पी.सिंह के मुताबिक असम के उन इलाकों में ही अफस्पा बहाल रखा गया जो नागालैंड की सीमा से सटे हैं. वह कहते हैं, "नागालैंड में शांति प्रक्रिया जारी है. उसके पूरी होने के बाद इस अधिनियम के तहत शामिल इलाकों को कम करने पर विचार किया जाएगा."

फैसले का विरोध

इलाके में उग्रवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य नागालैंड में अफस्पा बढ़ाने के केंद्र के फैसले का विरोध शुरू हो गया है. छात्र संगठन नागा स्टूडेंट्स फेडरेशन (एनएसएफ) ने इसकी कड़ी निंदा करते हुए इस अधिनियम के लागू रहने तक आम लोगों से सशस्त्र बलों के साथ सहयोग नहीं करने की अपील की है.

राजधानी कोहिमा में जारी एक बयान में संगठन ने आरोप लगाया है कि अफस्पा असंवैधानिक है क्योंकि यह सशस्त्र बलों की ओर से दुर्व्यवहार और गंभीर मानवाधिकारों के उल्लंघन को प्रोत्साहित करता है.

नागालैंड के ज्यादातर राजनीतिक दल और गैर-सरकारी संगठन इस कानून को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं. बीते साल दिसंबर में नागालैंड के मोन जिले में सुरक्षाबलों की फायरिंग में 14 लोगों की मौत और 30 अन्य के घायल होने के बाद मांग तेज हो गई थी. उस समय कई सामाजिक संगठनों ने इस अधिनियम को खत्म करने की मांग में पदयात्रा आयोजित की थी.

मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो भी केंद्र से अफस्पा हटाने की मांग कर चुके हैं. इसके समर्थन में विधानसभा में एक प्रस्ताव भी पारित किया जा चुका है. नागा संगठन एनएससीएन के इसाक-मुइवा गुट ने भी साफ कर दिया है कि अफस्पा खत्म नहीं होने तक शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाना संभव नहीं है.

Source: DW

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