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लोकाचार में बढते भ्रष्टाचार पर मारक प्रहार का इंतजार

दुनिया वैश्विक मंदी की आहट से घबराहट में है, लेकिन अपने यहां नकद बरामदगी की बाढ सी आ गई है। यहां वहां जहां तहां बस बेशुमार दौलत की बरामदगी हो रही है। क्या कोलकाता, क्या कन्नौज, क्या रांची, क्या अमरावती। बस सब जगह रिकार्ड तोड़ नकद ही नकद की बरामदगी।

Rising cases of black money recovery

बीते जुलाई महीने में केंद्रीय एजेसियों ने काली कमाई के खिलाफ कार्रवाई करते हुए कोलकाता में ममता सरकार के मंत्री और झारखंड कांग्रेस के तीन विधायकों समेत झारखंड, महाराष्ट्र व गुजरात के विभिन्न ठिकानों से दो सौ करोड़ रुपए से ज्यादा की नकद धनराशि जब्त की है। बरामद की गई यह धनराशि या तो केंद्रीय एजेंसियां की अतिरिक्त सक्रियता का नतीजा है या फिर हमारे तंत्र के खोखला होने का अंदेशा।

जीएसटी और डबल टैक्सेशन में फंसी जनता के लिए जहां मेहनत से दो जून की रोटी कमाना मुश्किल हो रहा है वहीं गोरखधंधे में माहिर खिलाड़ियों के लिए फटाफट कमाई से करोड़ों रुपए अर्जित कर लेना चुटकियों का काम हो गया है।
संयोग है कि सुप्रीम कोर्ट ने बीते 27 जुलाई को प्रिवेंशन ऑफ मनी लाउंडरिंग एक्ट (पीएमएलए) पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। इससे धनशोधन के खिलाफ मुहिम छेड़ने वाली केंद्रीय एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को पर्याप्त मजबूती मिल गई है। यह विपक्ष के लिए डरने तो सत्तापक्ष के लिए खुश होने की बात है।

सुप्रीम कोर्ट के 545 पन्नों के फैसले से ईडी को प्रेडिकेट ऑफेंस दर्ज होने से पहले ही आरोपी के यहां छापेमारी करने और संपत्ति कुर्क करने का अधिकार मिल गया है। प्रेडिकेट ऑफेंस उस बड़े अपराध का अनुमान होता है जिसमें अपराधी के मनी लांड्रिंग में संलिप्त होने की आशंका होती है। तुरंत कुर्की नहीं किए जाने की स्थिति में अपराधी अर्जित आय को विभिन्न तरीकों से गायब अथवा समाप्त कर सकता है।

केंद्रीय एजेंसियां ही नहीं, कोलकाता में तो ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल पुलिस ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ पीआईएल दर्ज करने की मुहिम चला रखे वकील राजीव कुमार के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए पचास लाख रुपए नकद बरामद कर लिया। उससे पहले पाला बदलकर झारखंड सरकार के लिए मुसीबत का सबब बनने जा रहे तीन कांग्रेस विधायकों की कार से पचास लाख रुपए नकद बरामद किए गए।

यह भ्रष्टाचार के खिलाफ सुलग रही आग में घी डालने की कार्रवाई है। कोलकाता पुलिस की इस कार्रवाई से ऐन पहले प्रवर्तन निदेशालय ने ममता बनर्जी सरकार के मंत्री पार्थो चटर्जी के ठिकानों से पचास करोड़ रुपए से ज्यादा नकद बरामद कर इतिहास रचने का काम किया।

पार्थो चटर्जी और उनकी सहयोगी अर्पिता मुखर्जी का रो रोकर बुरा हाल हुआ जा रहा है। दोनों साफ तौर पर यह नहीं बता पा रहे हैं कि शिक्षक भर्ती घोटाले की यह रकम उनके ठिकानों तक कब और कैसे पहुंची। इस रकम में किसकी कितनी हिस्सेदारी थी, उसका पता लगने से पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया बवंडर खड़ा होने की आशंका जताई जा रही है।

सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि देर से ही सही भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अब रंग जमाने लगी है। गौर करने वाली बात है कि आठ साल पहले केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार विदेशी बैंकों में जमा कालाधन निकाल लाने के दावों के साथ आई थी। यह दावा लोकाचार से भ्रष्टाचार मिटाने की सोच के तहत किया जाता रहा है। बीते दशक की शुरुआत में ही यह सोच परिवर्तित होने लगी थी जिसकी वजह से यूपीए-2 की सरकार ने अपना हक गंवा दिया था।
कांग्रेस अध्यक्ष बनने से पहले राहुल गांधी तक प्रेस क्लब में अपनी ही सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ कागज फाड़कर वाहवाही लूटते नजर आ रहे थे।

मनमोहन सिंह का तख्ता उलटने के ख्वाब में यूपीए सरकार के कई कैबिनेट मंत्री सिविल नाफरमानी पर उतर आए सामाजिक कार्यकर्ता को गुलाब का गुलदस्ता थमा रहे थे। मौके का तात्कालिक लाभ अरविन्द केजरीवाल ने इंडिया एगेन्ट करप्शन का दांव लगाकर खूब उठाया। भ्रष्टाचार के खिलाफ बने माहौल से दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार आसानी से बना ली। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की कांग्रेस सरकार के साथ आम जनता भी ठगी सी रह गई।

तब कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर उछला भ्रष्टाचार का मसला और बीमारी को जड़ से खत्म करने का संकल्प अब तक कितना पूरा हुआ? विदेशों में फंसा कालाधन कितनी मात्रा में अर्थव्यवस्था में लौटकर आ पाया? इसका लेखा जोखा न तो केंद्र की नरेन्द्र मोदी की सरकार की ओर से दिया गया है, न ही कट्टर ईमानदार का तमगा लेकर राज करने वाले स्वयंभू अरविन्द केजरीवाल बता पा रहे हैं। उनके पास तो इसका भी जवाब नहीं है कि तपे तपाए लोग मंत्री बनने के बाद कदाचार में फंसकर क्यों निलंबित हो रहे हैं।

ऐसे में आम आदमी के मन में कहीं न कहीं ये सवाल जरूर उठता है कि ईमानदारी का अलाप लगाकर सत्ता में चले आए लोग दनादन भ्रष्टाचार के दलदल में क्यों और कैसे फंसते जा रहे हैं? यह सवाल चाहकर भी कोई आम आदमी अपने आका अरविन्द से नहीं पूछ पा रहा है। सत्ता से माल बनाने के क्रम में मुख्यमंत्री केजरीवाल ने परिवर्तन के साथी मनीष सिसोदिया तक को जेल के मुहाने तक पहुंचवा दिया है।

उपराज्यपाल के आदेश के बाद सक्रिय हुई जांच एजेंसियां दिल्ली में शराब नीति से गाढ़ी कमाई कर लेने का ठीकरा अब किसके सिर पर फोड़ती है, यह देखने की बात है। फिलहाल तो थमी सांस से सिसोदिया और केजरीवाल ने एक झटके में दिल्ली में घर घर शराब परोसने की नीति को घबराहट में आकर उलट दिया है।

जब भी कालेधन पर प्रहार की बात होती है, तो भ्रष्टाचार से परेशान जनता की निराशा बढ जाती है। स्वीट्जरलैंड की सरकार के साथ समझौते की आड़ में स्विस व अन्य विदेशी बैंको में कालाधन पार्क करने का धंधा तेजी से बढा है। स्विट्जरलैंड के केंद्रीय बैंक एसएनबी ने अपने वार्षिक आंकड़ों में बताया है कि उनके खातों में भारतीयों और उनकी कंपनियों का धन 2021 के दौरान 50 फीसदी बढ गया है।

यह रकम 14 सालों के उच्चस्तर 3.83 अरब स्विस फ्रैंक यानी 30,500 करोड़ रुपए से अधिक पर पहुंच गया है। इसमें भारत में स्विट्जरलैंड़ के बैंकों की शाखाओं औऱ अन्य वित्तीय संस्थानों में जमा धन भी शामिल हैं। इससे पहले वर्ष 2020 के अंत तक स्विटजरलैंड के बैंकों में भरातीयों का धन 2.55 अरब स्विस फ्रैंक अर्थात् 20,700 करोड़ रुपये था। स्विट्जरलैंड के एसएनबी के इन आंकड़ों में भारतीयों, प्रवासी भारतीयों या अन्य लोगों के पास स्विस बैंकों में किसी तीसरे देश की इकाइयों के नाम पर होने वाले खातों में जमा धन का ब्योरा शामिल नहीं है।

साफ है कि विदेशों में जमा काला धन पर कहर बरपाने का काम अभी भी बाकी है। उसको अर्थव्यवस्था में वापस लाने से कई अधूरे सपने पूरे होने हैं। काली कमाई को विदेशों में पहुंचाकर मौज करने वाले आर्थिक अपराधियों की संख्या में इजाफा चिंता का सबब है। सरकारी एजेंसियों की शिथिलता का लाभ उठाकर विदेश भागने वाले आर्थिक अपराधियों की तादाद में बेशुमार वृद्धि हुई है। मेहुल चौकसी और विजय माल्या के खिलाफ कठोर कारवाई की उम्मीद दिन ब दिन धाराशाई हो रही है। विपक्ष के लिए सरकार के खिलाफ यह बड़ा मुद्दा बन सकता है लेकिन जिसने अपराध न किया हो, वही तो पत्थर मार सकता है।

लिहाजा, आर्थिक अपराधियों के लिए आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो औऱ राज्यों की सतर्कता एंजेंसियों को चकमा देकर करोड़ों अरबों का वारे न्यारे कर लेने का खेल आसान लग रहा है। हालांकि अनवरत छापेमारी से नकदी बरामदगी ने सरकार से निराश लोगों को जरुर संदेश देने की कोशिश किया है कि जरुरत से ज्यादा घबराने की जरुरत नहीं है। हमारी नजर भ्रष्टाचारियों पर बनी हुई है। भ्रष्टाचार के खिलाफ सक्रिय लोगों के लिए ईडी पर आये सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से भी उम्मीद जगी है।

अब ईडी के अधिकारी हेराफेरी की आशंका मात्र से आरोपी के खिलाफ बिना किसी शिकायत या आवेदन का इंतजार किए जांच शुरु कर सकते हैं। इसके साथ ही अब कार्रवाई के बाद विभाग के आंतरिक जानकारी के लिए प्रवर्तन सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) बनानी होगी। ईसीआईआर को हासिल करने का अधिकार अपराधी को नहीं होगा। उम्मीद करनी चाहिए कि अब राजनीतिक गुणा गणित से अलग होकर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ सरकारी तंत्र सख्त कार्रवाई जारी रखेगा।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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