• search
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts
Oneindia App Download

पार्टी के भीतर सहजता से सत्ता हस्तातंरण का सबक भाजपा से सीखे कांग्रेस

Google Oneindia News

राहुल गांधी भारत जोड़ों यात्रा कर रहे हैं और उधर राजस्थान में कांग्रेस टूटने के कगार पर पहुंच गई है। राजस्थान के मुख्यमंत्री और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के दहलीज पर खड़े अशोक गहलोत के मौन समर्थन से राजस्थान कांग्रेस के विधायकों ने कांग्रेस में अनुशासन और चरित्र के चीथड़े उड़ा दिए हैं। कांग्रेस हाईकमान ने राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन करने की जो रणनीति अपनाई वह बताती है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व ऐतिहासिक गलतियों के बाद भी सुधरना नहीं चाहता और अपनी मुख्य प्रतिद्वंदी भाजपा की कार्यशैली से सीखना नहीं चाहता।

rajasthan political crisis congress learns from BJP this lesson

भाजपा में सत्ता का हस्तातंरण जिस सहजता, स्वीकार्यता और सभी की सहभागिता के साथ होता हैं वह कांग्रेस के संस्कारों में कभी नहीं रहा। एक दल के रूप में दयनीय हालत में पहुंचने के बाद भी सत्ता के लिए आपस में मार काट पर उतर आना, पार्टी से बगावत करना और राजनीतिक दुर्दशा के बाद भी कांग्रेस का रत्तीभर न सुधरना बताता हैं कि कांग्रेस को मिट्टी में मिलाने की तैयारी विपक्ष नहीं, कांग्रेस के नेता खुद कर रहे हैं।

बीजेपी ने उत्तराखण्ड में त्रिवेंद्र सिंह रावत की जगह सांसद तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बना दिया था। मुख्यमंत्री बनाए जाने के चार महीने बाद ही तीरथ सिंह रावत को भी हटा दिया गया और दो बार के विधायक पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी दे दी। धामी के नेतृत्व में भाजपा ने सत्ता में तो वापसी की लेकिन धामी खुद चुनाव हार गए। भाजपा ने फिर से हारे हुए विधायक धामी को मुख्यमंत्री बना दिया। उत्तराखण्ड में भाजपा के छह पूर्व मुख्यमंत्री जिनमें भगत सिंह कोश्यारी, भुवन चंद्र खंडूरी, रमेश पोखरियाल निंशक, त्रिवेन्द्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत और विजय बहुगूणा शामिल हैं, ने एक बार भी भाजपा हाईकमान से नहीं पूछा कि हारे हुए नेता को मुख्यमंत्री क्यों बनाया जा रहा है?

मोदी प्रधानमंत्री बनकर दिल्ली आए तो गुजरात में आनंदीबेन पटेल को मुख्यमंत्री बनाया, बाद में आनंदीबेन पटेल की जगह विजय रूपानी मुख्यमंत्री बने। पिछले साल सितंबर में, भाजपा ने विजय रूपानी को हटाकर भूपेंद्र पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने के साथ पूरा मंत्रिमंडल बदल दिया। हटाए गए मुख्यमंत्री विजय रुपानी और उनकी पूरी कैबिनेट के मुंह से आवाज तक नहीं निकली। इसी तरह कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलते हुए भाजपा ने लिंगायत समुदाय से आने वाले भाजपा के बड़े नेता बी एस येदियुरप्पा की जगह एक अन्य लिंगायत नेता बसवराज एस बोम्मई को कर्नाटक का मुख्यमंत्री बना दिया जो कांग्रेस से भाजपा में आये थे। लेकिन कर्नाटका भाजपा में कहीं बगावत के सुर सुनाई नहीं दिये।

असम में पिछले साल विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा ने पांच साल मुख्यमंत्री रहे सर्बानंद सोनोवाल की जगह हिमंत बिस्वासरमा को मुख्यमंत्री बनायी था। त्रिपुरा में बिप्लब कुमार देब की जगह माणिक साहा को मुख्यमंत्री बना दिया। अभी तीन माह पूर्व महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंन्द्र फड़नवीस को उपमुख्यमंत्री बना दिया। फड़नवीस ने नहीं कहा कि 105 विधायक होने के बाद भी मुझे मुख्यमंत्री क्यो नहीं बनाया और 45 विधायकों के समर्थन वाले एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री क्यों बना दिया? अनुशासित पार्टी कार्यकर्ता की तरह देवेन्द्र फड़नवीस ने चुपचाप उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली और काम पर लग गए। कोई चू चपड़ नहीं, कोई विरोध नहीं। किसी को कानों कान खबर नहीं कि क्या होने जा रहा है। मीडिया को भनक तक नहीं। कोई विद्रोह, विरोध और बगावत नहीं।

अनुशासन का ऐसा कोड़ा और नेतृत्व का ऐसा भय कि एक शब्द नहीं निकला। संगठन मजबूत और नेतृत्व ताकतवर हो तब ऐसा ही होता है। लेकिन कांग्रेस को देखें तो राहुल गांधी उनकी मां सोनिया गांधी और बहन प्रियंका गांधी एक साथ राजनीति में सक्रिय हैं, उसके बाद भी पार्टी पर गांधी परिवार की पकड़ बहुत कमजोर दिखती है। आंतरिक गुटबाजी के आगे ये तीनों बेबस दिखते हैं। इसका परिणाम है कि देशभर में कांग्रेस आज जितनी कमजोर है, इससे ज्यादा कमजोर पहले कभी नही थी। यह पारिवारिक तिकड़ी पार्टी में पकड़ और जनता में असर को लगातार खोती जा रही है। लेकिन आश्चर्य है कि कांग्रेस की लगातार होती भौगोलिक सिकुड़न के बीच सोनिया और राहुल कुछ ऐसा नहीं कर पा रहे हैं कि कांग्रेस अपने भीतर गुटबाजी को कम कर सके।

भारत के 30 राज्यों में से कांग्रेस केवल दो राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सत्ता में है। दो अन्य राज्यों बिहार और झारखण्ड में सत्तारूढ़ गठबंधनों में जूनियर पार्टनर हैं। कांग्रेस हाईकमान ने कर्नाटक, मध्य प्रदेश और पुडुच्चेरी में अपने ही नेताओं के पाला बदलने के कारण अपनी सरकारें गिरती देखा हैं। मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भाजपा की सरकार बनवा दी और खुद केन्द्र में मंत्री बन गए। मध्य प्रदेश और कर्नाटक की सरकार गिरी तो गांधी परिवार मूक दर्शक बना रहा।

राजस्थान में सचिन पायलट का अशोक गहलोत से खुला युद्ध राजस्थान में सरकार बनने के बाद से ही कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व लाचार होकर देखता रहा और उसका कोई हल नहीं निकाल सका। इस लाचारी का परिणाम आज सबके सामने हैं। पंजाब में सत्ता का संघर्ष, अमरिंदर की बगावत और पंजाब में सत्ता गंवाना ज्यादा पुराना किस्सा नहीं है। पार्टी तेलंगाना, मणिपुर और गोवा में, जहां वह सत्ता में नहीं है, बड़े पैमाने पर दलबदल की गवाह बनी हैं और पार्टी के विधायक भाजपा और दूसरे दलों का दामन थाम चुके हैं। कांग्रेस हाईकमान ने उन्हे रोकने और वापस पार्टी में लाने को लेकर कोई पहल नहीं की।

राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के नेता आपस में ही गुटबाजी कर रहें हैं। अपने आपसी संघर्ष से वो खुद ही विपक्ष को सत्ता मे आने का मौका मुहैया करा रहे हैं। कांग्रेस उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तेलगांना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और दिल्ली सरीखे राज्यों में जहां से लोकसभा की 543 में से कुल 240 सीटें आती है, मुख्य विपक्षी पार्टी तो दूर अपने अस्तित्व को बचाने की क्षमता में भी नहीं बची है। इन राज्यों में कांग्रेस के ज्यादातर ताकतवर और वफादार नेता या तो फीके पड़ गये हैं, दरकिनार कर दिए गए है या फिर कांग्रेस को छोड़कर अन्य दलों का दामन थाम रहे हैं।

सोनिया गांधी ने अपने गिरते स्वास्थ के चलते दस जनपथ से निकलना लगभग बंद कर दिया हैं। कार्यकर्ताओं से तो दूर की बात है, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से भी सोनिया गांधी का संवाद बेहद कम हो गया है। सोनिया और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच की कड़ी अहमद पटेल के निधन के बाद कांग्रेस में सोनिया से संवाद की स्थिति और भी जटिल और मुश्किल हो गई हैं। राहुल गांधी भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से दूर रहते हैं और अपनी चौकड़ी पर ज्यादा निर्भर रहते हैं। कांग्रेस के देशभर में गिरते ग्राफ को देखने के बाद भी सोनिया गांधी ने पार्टी संगठन का ढांचा सुधारने की कोई कोशिश नहीं कर रहे हैं और न ही प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की अगुआई में भाजपा के बढ़ते कारवां का मुकाबला करने के लिए कोई रणनीतिक योजना बनाते दिख रहे हैं।

संभवत: लंबे समय तक निरंतर सत्ता में रहने के कारण और कांग्रेस पर गांधी परिवार के लगातार नियंत्रण ने कांग्रेस को एक अलग सांचे में ढाल दिया हैं। निरतंर सत्ता में रहने के कारण कांग्रेस को भ्रष्टतम बनाया है तो गांधी परिवार के लंबे नियत्रंण ने कांग्रेस में संगठन को खत्म कर दिया है। कांग्रेस के खिलाफ देशभर में उपजे असंतोष और कमजोर संगठन ने विपक्षी दलों को अपने खोटे सिक्कों को भी आसानी से चुनाव जीतने में मदद की है।

कांग्रेस का स्वस्थ होना देश के स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी हैं। लेकिन स्वस्थ होने के लिए कांग्रेस को अपनी काया में अंदर तक समा गए भ्रष्टाचार और वंशवाद से मुक्ति पाना होगा। एक परिवार की बजाय जिस दिन कांग्रेस अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं की पार्टी बन जाएगी उस दिन यह कांग्रेस, पहले वाले संस्करण की तुलना में काफी संशोधित, परिवर्तित एवं रूपांतरित पार्टी के रूप में सामने होगी। यही कांग्रेस सही मायने में सच्ची कांग्रेस होगी। फिलहाल ऐसी कांग्रेस बन सके इसकी संभावना बेहद कम दिखाई देती है।

यह भी पढ़ेंः राहुल गांधी की अदूरदर्शी सोच का नतीजा है राजस्थान कांग्रेस का राजनीतिक कलह

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

Comments
English summary
rajasthan political crisis congress learns from BJP this lesson
देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
For Daily Alerts
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X