क्या न्यूनतम आमदनी की गारंटी से लोग निकम्मे हो जाएंगे?
नई दिल्ली। जब राहुल गांधी ने सबके लिए न्यूनतम आय यानी 'न्याय' की घोषणा हुई, तो देश राजनीतिक कारणों से पक्ष और विपक्ष में बंट गया दिखने लगा। वजह स्पष्ट है कि घोषणा करने वाला व्यक्ति, घोषणा का समय और जिनके लिए घोषणा की जा रही है, वे सब राजनीति के महाकुम्भ यानी आम चुनाव का हिस्सा हैं। मगर, इस मौके पर वैसे व्यक्ति, जिनमें राजनीति से ऊपर उठकर सोचने-समझने का सामर्थ्य है वे भी कुछ चौंकाने वाले तरीके से सोचते दिखे। यह नज़रिया चौंकाने वाला है या नहीं, इस मतभिन्नता का अधिकार पाठकों को है। फिर भी इस पर बात करना बहुत जरूरी है।

जब हम आय की बात करते हैं तो उसका मतलब आमदनी होता है। आमदनी बगैर मेहनत या पुरुषार्थ (स्त्रीवादी क्षमा करें) के नहीं हुआ करती। इसलिए अब तक न्यूनतम आय का मतलब वही होता आया है जो अंग्रेजी में मिनिमम वेजेज़ का होता है यानी न्यूनतम मजदूरी। राहुल गांधी के 'न्याय' की वजह से इसका मतलब अब बदलने वाला है। सवाल ये है कि क्या इसे आय कहना सही होगा? सवाल ये भी है कि इसे आय के अलावा और क्या कह सकते हैं?
मुफ्तखोरी की आदत हो जाएगी?
इस वक्त ये मान लिया गया है कि महीने में जीने के लिए ज़रूरी न्यूनतम रकम 12 हज़ार रुपये महीना एक परिवार को चाहिए। इससे जितनी कम रकम चार सदस्यों वाले परिवार के पास होगी, उसे उपलब्ध कराने की ज़िम्मेदारी केन्द्र सरकार लेने जा रही है। (अगर राहुल गांधी की कांग्रेस पार्टी सत्ता में आए) इसका मतलब ये हुआ कि हर हिन्दुस्तानी को (सम्मान के साथ?) जीने के लिए आवश्यक रकम मिलेगी। यहीं पर वह चौंकाने वाला नज़रिया सवाल बनकर सामने आता है कि अगर सबकुछ मुफ्त में ही मिल गया तो लोग मेहनत क्यों करेंगे? खेतों में मज़दूर होंगे, मगर मज़दूरी क्यों करेंगे? क्या अकर्मण्य नहीं हो जाएंगे लोग?
रईसों के घर क्या मुफ्तखोर होते हैं?
जरा सोचिए। अम्बानी-अडानी-टाटा-बिड़ला (मतलब धनाढ्य) के घर उनके परिजनों को क्या सबकुछ मुफ्त में नहीं मिल जाता? क्या वे परिश्रम नहीं करते या करना नहीं चाहते? अपवाद भी होंगे, मगर ज्यादातर लोग धनाढ्य वर्ग में भी काम करना या परिश्रम करना चाहते हैं, करते हैं। ऐसे वे तब भी करते हैं जबकि ज़िन्दगी के लिए ज़रूरी न्यूनतम रकम से बहुत ऊपर, बल्कि कहें कि 'सहूलियत के स्वर्ग' (सिर्फ स्वर्ग कहना नहीं चाहता क्योंकि 'स्वर्ग' एक व्यापक अर्थ शब्द है) में पहुंच चुके हैं। फिर भी उन्हें काम करना है क्योंकि काम के बिना जीवन नीरस है। काम का मतलब समाज में योगदान है। योगदान जितना अधिक होगा, सम्मान उतना अधिक बढ़ेगा। वे अपने स्वभाव के अनुसार काम खोजते हैं जिनमें उन्हें आनन्द आए।
ज़िन्दगी की तलाश में है हर पांचवां व्यक्ति
देखा आपने! जीने की मजबूरी में श्रम और ज़िन्दगी के लिए श्रम में कितना फर्क है! जब हम जीने के लिए ज़रूरी न्यूनतम रकम भी नहीं जुटा पाते हैं तो पूरी ज़िन्दगी ही बोझ बन जाती है और सबसे बड़ी बात ये है कि जीने वाले को इस बोझ का पता भी नहीं चलता। वह दबता चला जाता है। उसे पता ही नहीं होता कि जीना कहते किसको हैं। ऐसे में ज़िन्दगी कहीं खो जाती है। अगर देश के हर पांचवें व्यक्ति की ज़िन्दगी ही कहीं खो चुकी है, तो उनके लिए जीवन की तलाश कौन करेगा?
सरकार असमानता दूर करती है खैरात नहीं बांटती
सवाल अब भी बाकी है। क्या वह रकम जो 'न्याय' के तहत दी जाएगी, उसे खैरात कहा जा सकता है या कहा जाना चाहिए? सवाल उठाने वाले अगर अपने घर से रकम दें, तो उनकी मर्जी कि वे इसे खैरात कहें या जो उचित समझें कहें। या फिर लेने वाले की मर्जी कि वे सुनें या न सुनें। मगर, जब सरकार यही काम करती है तो उसे खैरात नहीं कहा जा सकता।
प्राकृतिक न्याय का हिस्सा है जीने के लिए न्यूनतम रकम
सरकार किसकी होती है?- लोगों की। अन्याय न रहे, असमानता दूर हो, सबको विकास के समान अवसर मिले, इसे ध्यान में रखकर अगर सरकार जीने के लिए ज़रूरी कोई भी व्यवस्था व्यक्ति, व्यक्ति सूमह, या क्षेत्र के लिए करती है, तो वह न्याय होता है। सामाजिक न्याय की अवधारणा भी यही है। यही प्राकृतिक न्याय भी है। अन्याय को ख़त्म करने के तरीकों के नाम चाहे जो रखे जाएं, वह अंतत: प्राकृतिक न्याय ही होगा। अब बात समझ में आ रही होगी कि न्याय यानी न्यूनतम आय में 'आय' शब्द क्यों सार्थक है।
समाज ने बेचैन होना भी छोड़ दिया
आदमी बेचैन कब होता है? जब उसे लगता है कि जीना मुश्किल हो चला है। चाहे प्राकृतिक रूप में ऐसा हो या फिर अप्राकृतिक रूप में। मगर, दुनिया के सबसे प्रदूषित राजधानी दिल्ली में लोगों ने इस बेचैनी से बेचैन होना भी छोड़ दिया है। प्रदूषित नदियों ने जिन्दगियां बर्बाद कर दी, खेती तबाह कर दी, जीव-जन्तुओं को नदियों से गायब कर दिया। सरकार पर भरोसा करते-करते हम इस अवस्था तक पहुंचे हैं। प्राकृतिक पर्यावरण ही नहीं, सामाजिक पर्यावरण भी तहस-नहस हो चुका है, पर शिकायत करना बंद हो गया है। ये उदाहरण ये बताने के लिए है कि दबी-कुचली पीड़ित जनता जो जीने के लिए परिश्रम में जुटी हो, उसे इन चीजों को महसूस करने तक का वक्त नहीं होता। 'न्याय' के बाद वंचित तबकों पर थोपा गया यह अन्याय ख़त्म होने का रास्ता खुलेगा।
किनकी जरूरत नहीं है दो शाम की रोटी?
दो शाम की रोटी तो जीव-जन्तुओँ को भी चाहिए, फिर इंसान को क्यों नहीं? इंसान के लिए इतनी रकम सुनिश्चित क्यों नहीं होनी चाहिए कि वह जीव-जन्तुओं के समान जीने की न्यूनतम अवस्था तक पहुंच सके? जब हम ये कहते हैं कि खेतों को काम करने वाले मज़दूर नहीं मिलेंगे अगर उनके पेट भर जाएंगे, तो कहीं न कहीं मान लेते हैं कि इन मजदूरों को पेट भरने तक की ही गारंटी होनी चाहिए। विदेश का किस्सा बताते हुए आपको लोग मिल जाएंगे कि वहां ड्राइवर भी बस चलाने की ड्यूटी करते समय उतनी बड़ी गाड़ी से आता है जितनी हम सोच नहीं सकते। जिस दिन हिन्दुस्तान के ड्राइवर विदेश के ड्राइवर से तुलना करने की स्थिति में पहुंच जाएंगे, आप देखेंगे कि उनका स्वभाव भी बदलने लगेगा। मगर, उन्हें विदेश दिखाएगा कौन? क्या एक विदेश घूमने-घुमाने की फ्री ट्रिप नहीं लगनी चाहिए? फिर आप पूछेंगे कि उस दौरान देश में गाड़ी चलाएगा कौन?
(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)
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