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दोबारा नहीं लौटी है गैर कांग्रेसी सरकार, क्या मोदी कर पाएंगे वो करिश्मा?

By प्रेम कुमार
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नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक करियर गैरकांग्रेसवाद की विफलता की बुनियाद पर है जब 1980 में इसका जन्म हुआ। जनसंघ के पुराने रूप में पार्टी नहीं लौटी, बल्कि 'जनता पार्टी' की विरासत से जुड़े रहने की ललक और इस नाम का वारिस होने की मंशा से नये संगठन का नाम 'जनता पार्टी' में 'भारतीय' जोड़कर कर दिया गया, जो आज बीजेपी है।

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जनसंघ के रूप में एक पूर्ण रूप से विफल राजनीतिक दल का अतीत बीजेपी के साथ है जो चुनाव नतीजों के आईने में कतई गौरवपूर्ण नहीं है। जब जनता ने पूरी तरह से जनसंघ को नकार दिया, तो इसने अपने अस्तित्व तक को 'जनता पार्टी' में विलीन कर दिया। यहां तक कि जब आरएसएस से संबंध और दोहरी सदस्यता के मामले में मोरारजी देसाई की सरकार गिरी, तो जनता पार्टी से जनसंघी अलग हो गये। अलग होने के बावजूद इसने जनसंघ नाम से जुड़ने उचित नहीं समझा और अपना नया नाम रख लिया।

3 लोकसभा सीटों से शुरू हुआ था जनसंघ का सफर

3 लोकसभा सीटों से शुरू हुआ था जनसंघ का सफर

जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर 1951 में हुई। श्यामा प्रसाद मुखर्जी पहले अध्यक्ष थे। 1952 में हुए आम चुनाव में में जनसंघ ने 3 सीटें जीती थीं। वोटों का प्रतिशत महज 3.1 फीसदी था। यह भी संयोग विचित्र है कि जब 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनी तो इसने भी 1984 के आम चुनाव में पहली बार चुनाव लड़ते हुए महज 2 सीटें ही जीती थी। 1957 में जनसंघ ने 5.9 फीसदी वोट लाकर 4 सीटें जीतने में कामयाब रहा। वहीं 1962 में उसे 6.4 फीसदी वोट और लोकसभा की 14 सीटें मिलीं।

1967 जनसंघ का यौवनकाल था जब इसने 9.4 फीसदी वोट और 35 सीटें हासिल की। विधानसभा चुनावों में भी यह गैरकांग्रेसवादी पार्टियों के उत्थान का समय था। तब मध्यप्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश समेत हिन्दी भाषी राज्यों में गठबंधन की सरकार बनी, जिसमें जनसंघ भी शामिल था। मगर, 1971 में एक बार फिर जनसंघ की लोकप्रियता गिर गयी। पार्टी को 7.37 फीसदी वोट और 22 सीटें हासिल हुईं। 1975 में आपातकाल के बाद आमचुनाव 1977 में ही हो सका। मगर, तब तक जनसंघ का वजूद ही जनता पार्टी में विलीन हो चुका था।

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जनता सरकार में विलीन हो गया जनसंघ का अस्तित्व

जनता सरकार में विलीन हो गया जनसंघ का अस्तित्व

जनसंघ का अस्तित्व 25 साल में मिट गया। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि जब जनसंघ ने अपन दम पर कांग्रेस का विरोध करने और वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था देने में खुद को विफल पाया, तो उसने गैरकांग्रेसवादी संगठनों के साथ खुद को जोड़कर एक मुकाम पाने की कोशिश की। यही वजह है कि अपनी स्थापना के 25 साल बाद जनसंघ 1977 में जनता पार्टी की सरकार का हिस्सा बना।

अतीत से बीजेपी ने लिया सबक

बाद के दिनों में बीजेपी ने इस गलती से सबक लिया। उसने 1989 में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार का समर्थन भी किया और खुद के अस्तित्व को न सिर्फ बचाए रखा, बल्कि और मजबूत करता रहा। यही वजह है कि स्थापना के 16 साल बाद बीजेपी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाने कामयाब रही। हालांकि यह 1996 में महज 13 दिन के लिए, 1998 में 13 महीने के लिए और 1999 में पांच साल के लिए सत्ता में रही।

1989 के आम चुनाव में बीजेपी को 86 सीटें मिली थीं। यह उल्लेखनीय इसलिए है कि इससे पहले उसके पास महज 2 सीटें थीं। जब वीपी सिंह सरकार ने मंडल कमीशन लागू किया, उसके बाद लालकृष्ण आडवाणी ने 1990 में रथयात्रा थाम ली। 1991 में हुए चुनाव में एक बार फिर गैरकांग्रेस दलों को करारी हार मिली, मगर बीजेपी की ताकत बढ़ गयी। पार्टी ने 120 लोकसभा की सीटें जीतीं। राम मंदिर आंदोलन जारी रहा और बाबरी विध्वंस की पृष्ठभूमि में जब 1996 में आम चुनाव हुए तो बीजेपी देश में पहली बार सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। उसे 161 सीटें मिलीं। सरकार बनी, मगर महज 13 दिन के लिए।

एनडीए बनाकर बीजेपी आ सकी ड्राइविंग सीट पर

एनडीए बनाकर बीजेपी आ सकी ड्राइविंग सीट पर

अब बीजेपी ने जनता पार्टी के बजाए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का प्रयोग किया और 1998 में पार्टी एनडीए की सरकार बनाने में कामयाब रही। टीडीपी के सहयोग से 13 महीने यह सरकार चली, मगर अन्नाद्रमुक के समर्थन हटा लेने से इस सरकार को 1999 में अंत हो गया। 1999 में हुए आम चुनाव में बीजेपी को 183 सीटें और एनडीए को 303 सीटें मिलीं। इस सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 5 साल तक चलने वाली यह पहली गैर कांग्रेस सरकार रही। मगर, यह सरकार अपने आपको दोहरा न सकी। 2004 के आमचुनाव में एनडीए 186 सीटों पर सिमट गयी। बीजेपी के पास 138 सीटें रह गयीं।

कभी दोबारा नहीं आ सकी है गैरकांग्रेसी सरकार

2009 में बीजेपी को और भी करारी हार का सामना करना पड़ा। पार्टी महज 116 सीटों पर सिमट गयी। मगर, बीजेपी ने 2014 में वापसी की। पार्टी ने अपने दम पर 282 सीटें हासिल करते हुए एनडीए के लिए 336 सीटें जोड़ीं। यह देश की दूसरी गैरकांग्रेस सरकार है जो पूरे पांच साल तक चली है। सवाल यही है कि क्या गैरकांग्रेस सरकार अपने आपको नहीं दोहराने के इतिहास को तोड़ सकेगी? क्या 1999 में 303 सीटें लाने वाला एनडीए जिस तरीके से 2004 में 186 सीटों पर सिमट गया था, उसकी फिर पुनरावृत्ति होने वाली है? 2014 में 336 सीटें लाने वाली बीजेपी 2019 में क्या नतीजे लेकर आने वाली है, इस पर देश की नज़र है। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि एनडीए की ताकत घटेगी। मगर, कितनी? क्या यह ताकत घटने का बाद भी सरकार बनाने लायक रहेगी या कि हश्र पिछले अनुभवों जैसा रहने वाला है।

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English summary
Lok Sabha Elections 2019: Non Congress government not return again, will Narendra Modi be able to do?
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