अपने ही बनाये इस्लामिक चक्रव्यूह में फंस गया ईरान
पिछले सप्ताह हिजाब ठीक से न पहनने के कारण मोरल पुलिस की हिरासत में महशा अमीनी की मौत के बाद ईरान में उथल पुथल मची हुई है। ईरान के हर बड़े शहर में इस समय महशा अमीनी के समर्थन और हिजाब के विरोध में प्रदर्शन चल रहे हैं। प्रदर्शन के आठवें दिन शुक्रवार को भी ईरान में हिजाब विरोधी प्रदर्शन जारी रहे।

ईरान सरकार ने इन प्रदर्शनों को फैलने से रोकने के लिए सोशल मीडिया साइटों पर रोक लगा दी है। इंटरनेट को भी सीमित कर दिया गया है, फिर भी अंतरराष्ट्रीय समाचार एजंसियों का आकलन है कि ईरान में शुक्रवार तक 50 से अधिक लोग इन प्रदर्शनों में मारे जा चुके हैं। हजारों लोग घायल हैं। इस समय हिजाब विरोधी प्रदर्शन ईरान के 30 शहरों में फैल चुका है लेकिन विरोध का सबसे ज्यादा असर ईरान के कुर्द इलाकों में हैं क्योंकि मोरल पुलिस की हिरासत में मरनेवाली महशा अमीनी स्वयं एक कुर्द थीं।
ईरान में लंबे समय से हो रहा है हिज़ाब का विरोध
ईरान में महशा अमीनी के समर्थन और हिजाब के विरोध में जो प्रदर्शन हो रहे हैं उन्हें झेल पाना ईरान के लिए आसान नहीं है। इसका कारण सिर्फ ये नहीं है कि वहां कुछ प्रगतिशील लोग हैं और दो चार दिन नारेबाजी करके शांत बैठ जाएंगे। ईरान में हिजाब की अनिवार्यता आम मुस्लिम महिलाओं के लिए बहुत बड़ा मुद्दा है। लंबे समय से इसके खिलाफ छुट पुट विरोध होते रहे हैं। 1979 की कथित इस्लामिक क्रांति के बाद मुस्लिम महिलाओं के लिए हिजाब को अनिवार्य किया गया था लेकिन इसे ईरान की महिलाओं ने कभी स्वीकार नहीं किया।
मुस्लिम महिलाओं के सिर पर हिजाब की रखवाली के लिए ईरान में सऊदी अरब की देखा देखी मोरल पुलिस की स्थापना भी की गयी लेकिन ईरान अरब जैसा नहीं है। ईरान की अपनी तासीर अरब से बिल्कुल अलग है। ईरान के लोग अरबी लोगों की तरह इस्लाम के नाम पर हर बात सिर झुकाकर स्वीकार नहीं करते। इसलिए मोरल पुलिस जैसी इस्लामिक व्यवस्थाओं के खिलाफ छुटपुट झड़प हमेशा होती रही है। कभी सार्वजनिक रूप से किसी लड़की ने हिजाब को उतारकर हवा में लहरा दिया तो कभी उसे जला दिया। इस समय तो ईरान में महिलाओं द्वारा हिजाब जलाने और बाल काटकर विरोध दर्ज करने की लहर चल रही है।
ईरान के सर्वोच्च इस्लामिक धर्मगुरु और अयातोल्लाह खोमैनी के उत्तराधिकारी अली खामनेई भी इस बात को समझ रहे हैं। इसलिए महशा अमीनी की मौत पर उनकी ओर से दुख जताया गया है। जो कुछ हुआ उसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया गया है। ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी ने भी महशा अमीनी के परिवार से संपर्क किया है और इस घटना की जांच का भरोसा दिया है। लेकिन ये मामला खामनेई के "दुर्भाग्यपूर्ण" कह देने या राष्ट्रपति के जांच का भरोसा देने भर से शांत नहीं होगा। इसे समझने के लिए ईरान के उस हालात को समझना पड़ेगा जिसमें से यह विरोध प्रदर्शन निकला है।
कुर्द, कुर्दिस्तान और ईरान
महशा अमीनी जिस कुर्द कबीले से आती है वह कुर्द कबीला ईरान, इराक, सीरिया और तुर्की के सीमावर्ती इलाके में रहनेवाली जाति है। कुर्द लोगों की कुल आबादी तीन से चार करोड़ के बीच है। इनमें सबसे अधिक कुर्द तुर्की में रहते हैं। इसके बाद इराक और ईरान में। कुर्द लोगों की सबसे कम आबादी सीरिया में है। कुर्द लोगों की एक बड़ी संख्या इस समय अमेरिका में भी पायी जाती है जो नौकरी करने और रोजी रोटी कमाने के लिए अमेरिका जाकर बस गये हैं।
कुर्द लंबे समय से अलग कुर्दिस्तान की मांग कर रहे हैं। इसमें हालांकि अब तो वो सफल नहीं हो पाये हैं लेकिन इराक ने उन्हें ऑटोनॉमस रीजन का दर्जा जरूर दे दिया है जहां उनकी अपनी संसद और अपने कानून हैं।
एक दशक पहले जब ईराक में आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट का उदय हुआ था तो उस समय कुर्द कबीले ने अपने दम पर उनसे लंबी लड़ाई लड़कर अपने शहर किरकुक और इरबिल को उनके कब्जे से छुड़ाया था। इस्लामिक स्टेट के आतंकियों से लड़ने में कुर्द कबीले की महिलाओं ने भी बढ चढकर हिस्सा लिया था जो संसारभर की मीडिया में सुर्खियां बना था।
कुर्द मुख्यरूप से सुन्नी मुसलमान हैं। लेकिन सुन्नी मुसलमान होते हुए भी उनके भीतर कट्टरता या असहिष्णुता नहीं है। उनकी अपनी जनजातीय पहचान उनके लिए इस्लाम से अधिक महत्वपूर्ण है इसलिए वो आज भी सूर्य को पवित्र मानते हैं जबकि इस्लाम में चांद को पवित्र माना जाता है। उनकी स्त्रियों पर वो कोई ऐसा पहनावा वाला प्रतिबंध नहीं लगाते जैसा कि संसार भर के मुसलमान इस्लाम के नाम पर करते हैं। उनकी स्त्रियां ज्यादातर अपनी परंपरागत वेषभूषा में ही रहती हैं जो कि अरबी पहनावे से बिल्कुल अलग है।
ईरान के कई सीमावर्ती शहर कुर्द इलाकों में आते हैं। इसमें महबाद, सक्केज, बीजर, सनन्दाज और करमनशाह प्रमुख हैं। महशा अमीनी स्वयं सक्केज शहर की थी और अपने परिवार के साथ ईरान आयी थी जहां उसकी मौत हुई। इसलिए ईरान में यह विरोध प्रदर्शन हिजाब से शुरु जरूर हुआ है लेकिन महशा के कुर्द कबीले से जुड़ी होने के कारण यहीं तक सीमित नहीं रहेगा। एक बार फिर अलग कुर्दिस्तान की मांग उठेगी या कम से कम इराक की तर्ज पर ईरान में भी कुर्द इलाकों को ऑटोनॉमस दर्जा देने की बात होगी ताकि वो ऐसे दमनकारी इस्लामिक कानूनों से अपने आप को बचाकर रख सकें।
अमेरिका को मिला हिसाब चुकाने का मौका
महशा अमीनी की मौत के बाद अमेरिका को भी अपना पुराना हिसाब चुकता करने का मौका मिल गया है। इसलिए न केवल अमेरिका में महशा अमीनी के समर्थन और हिजाब के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं बल्कि अमेरिका के राष्ट्रपति जो बिडेन ने ईरान में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को अपना समर्थन भी दिया है। यह स्वाभाविक भी है।
1979 की कथित इस्लामिक क्रांति असल में तो ईरान में अमेरिकी हस्तक्षेप के खिलाफ ही हुई थी। ईरानी शासक शाह पहलवी पर आरोप था कि वो अमेरिका के पिट्ठू हैं। जब खोमैनी ईरान के सर्वोच्च प्रशासक बने तो अमेरिकी लोगों को या तो गिरफ्तार कर लिया गया या फिर तत्काल देश छोड़ने का आदेश दिया गया। उस समय ईरान में मौजूद अमेरिकी सैनिकों को गिरफ्तार करके सार्वजनिक रूप से अपमानित भी किया गया था।
खोमैनी के शासन में ईरान और अमेरिका की जो दुश्मनी शुरु हुई वो आज तक जारी है। हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिका ईरान की राह में रोड़े अटकाता है और इन सबके बावजूद ईरान अमेरिका से अपनी दुश्मनी निभाता है। ईरान के पूर्व राष्ट्रपति अहमदीनेजाद तो घोषित तौर पर अमेरिका विरोध के नाम पर ही ईरान के राष्ट्रपति बने थे। ऐसे में अमेरिका ईरानी महिलाओं के साथ खड़ा होकर उन इस्लामिक कानूनों को हटाने का समर्थन करेगा ही जिसकी वजह से उसे ईरान में अपमानित होकर बाहर निकलना पड़ा था।
ईरान में इस्लाम छोड़ रहे हैं लोग?
ईरान के इस ताजा विद्रोह के पीछे एक बड़ा कारण ईरान में इस्लाम से बढती दूरी है। ईरान में सरकारी कानून ऐसे हैं कि आप अपने आप को नास्तिक घोषित नहीं कर सकते। आपको यह बताना ही पड़ता है कि आप किस धर्म को मानते हैं। 2011 के सरकारी आंकड़े हैं कि ईरान में 99.98 प्रतिशत लोग इस्लाम को मानते हैं। इसमें 90 प्रतिशत लोग शिया है। लेकिन सच्चाई वैसी है नहीं, जैसा ईरानी प्रशासन दावा करता है।
नीदरलैंड स्थित एक रिसर्च एजेंसी गम्मान (GAMMAN) मुख्य रूप से ईरान पर ही काम करती है। इस संस्था की ओर से 2020 में ईरान में एक आनलाइन सर्वे करवाया गया था। इस सर्वे में बहुत चौंकाने वाले नतीजे सामने आये थे। गम्मान सर्वे में यह बात निकलकर सामने आयी कि ईरान में सिर्फ 40 प्रतिशत लोग ही इस्लाम को मानते हैं जबकि 60 प्रतिशत लोगों का इस्लाम पर कोई भरोसा नहीं बचा है।
इस सर्वे में यह बात भी उभरकर सामने आयी कि लोग सरकारी कॉलम में अपने आप को इसलिए मुसलमान घोषित करते हैं क्योंकि ईरान में इस्लाम छोड़ने की सजा मौत है। लेकिन सरकारी कागजों में अपने आपको मुसलमान बताने वाले लोग ही इस्लामिक सिद्धांतों और अकीदों को मानना बंद कर चुके हैं।
जाहिर है, ईरान की जिस कथित इस्लामिक क्रांति से ईरान में सच्चे इस्लामिक युग की शुरुआत हुई थी, वह अब उसके अपने लिए ही ऐसा चक्रव्यूह बन गया है जिसमें उसका फंसना तय है। लंबे समय तक सेकुलर शासन में स्वतंत्र जीवन जी चुके ईरान के "आर्य" लोगों को अपना सुनहरा अतीत याद आ रहा है। जिस इस्लाम ने उनसे उनकी वह आजादी छीन ली अब वो उसके ही खिलाफ खुलकर मैदान में उतर आये हैं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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