इंडिया गेट से: अशोक गहलोत की राजनीतिक जादूगरी अब काम आएगी
अशोक गहलोत का कठपुतली कांग्रेस अध्यक्ष बनना अब तय है। उनके सामने कोई भी हो, जीतेंगे वही, क्योंकि वह गांधी परिवार के उम्मीदवार हैं। गांधी परिवार ने एक तीर से तीन निशाने साधे हैं। पहला यह कि खुद अध्यक्ष पद से बाहर होकर अपना ही कठपुतली अध्यक्ष बनवा रहे हैं, वह भी ओबीसी जाति का। कांग्रेस यह समझती है कि ओबीसी मोदी के सामने ओबीसी अध्यक्ष कांग्रेस के लिए मददगार साबित होगा। दूसरा यह कि गहलोत मुख्यमंत्री पद छोड़ने को तैयार नहीं थे, जबकि गांधी परिवार सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने का वायदा कर चुका था। तो इस रणनीति से उन्होंने अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री पद खाली करने को मजबूर कर दिया है।

अगर यह बात अशोक गहलोत को पहले से पता होती कि गांधी परिवार उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ने को मजबूर करेगा तो वह अध्यक्ष पद स्वीकार भी नहीं करते। जयपुर में विधायक दल की बैठक में वह यह कह कर दिल्ली आए थे कि वह मुख्यमंत्री भी बने रहेंगे। लेकिन दिल्ली आकर तस्वीर पूरी तरह बदल गई। क्योंकि जैसे ही सचिन पायलट को उनके इरादों का पता चला, वह राहुल गांधी की यात्रा में शामिल होने केरल पहुंच गए। जहां उन्होंने राहुल गांधी से बयान दिलवा दिया कि पार्टी में एक व्यक्ति एक पद का सिद्धांत कायम रहेगा।
शुरू में अशोक गहलोत ने यह कहा कि पार्टी अध्यक्ष पर यह नियम लागू नहीं होता लेकिन आखिर में उन्हें घुटने टेकने पड़े और उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कह दिया कि एक साथ दोनों जिम्मेदारियां नहीं संभाली जा सकती। अब सवाल यह है कि क्या गांधी परिवार सचिन पायलट से किया गया वायदा भी निभा पाएगा? क्या अशोक गहलोत आसानी से हार मान लेंगे? तो अशोक गहलोत को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा।
34 साल की उम्र में जब वह प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बने थे, तो उन्होंने मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी की कुर्सी हिला दी थी। हरिदेव जोशी से उनका छत्तीस का आंकड़ा बना और तेरह महीनों में हरिदेव जोशी को इस्तीफा देना पड़ा था। तीन और घटनाएं याद दिलाता हूँ| 1998 में सब सोच रहे थे कि परसराम मदेरणा मुख्यमंत्री बनेंगे, तब अशोक गहलोत ने ऐसी जादूगरी की थी कि कांग्रेस हाईकमान से नजदीकी के कारण सब सीनियर को पछाड़ते हुए मुख्यमंत्री बन गए थे।
फिर दस साल बाद 2008 के विधानसभा चुनाव के समय सी.पी.जोशी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे। तय था कि चुनाव जीतने पर वही मुख्यमंत्री बनेंगे, लेकिन सी.पी.जोशी एक वोट से विधानसभा चुनाव हार गए। अशोक गहलोत सबको पछाड़कर दूसरी बार भी मुख्यमंत्री बन गए। अब लोग तो यह भी कहते हैं कि सी.पी.जोशी को हराया गया था।
तीसरी घटना तो सिर्फ चार साल पुरानी है। याद करिए 2018 में सचिन पायलट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे, चुनावों में उन्होंने दिन रात एक कर दिया था। अशोक गहलोत उस समय कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव थे। सचिन पायलट को राहुल और प्रियंका का समर्थन भी हासिल था, इसलिए माना यही जा रहा था कि सत्ता आने पर सचिन ही मुख्यमंत्री बनेंगे। लेकिन अशोक गहलोत ने सोनिया और अहमद पटेल का ऐसा दांव चला कि राहुल और प्रियंका चाहकर भी सचिन पायलट को मुख्यमंत्री नहीं बनवा पाए थे।
अशोक गहलोत राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं। वह सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनने से रोकने के लिए कुछ भी करेंगे। जैसे वह विधायक दल से चुनाव का फार्मूला ले आएँगे। विधायक दल में बहुमत सचिन पायलट के पास है नहीं है। विधायकों के समर्थन बिना चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाने का खामियाजा कांग्रेस भुगत चुकी है। पंजाब में कांग्रेस का क्या हाल हुआ, लगभग सारी कांग्रेस अब भाजपा में शामिल हो चुकी है। वही हाल राजस्थान में होगा।
याद करिए दो साल पहले जब सचिन पायलट ने आलाकमान पर दबाव बनाने के लिए मानेसर में अपने समर्थक विधायकों के साथ डेरा डाला था तो उनके साथ सिर्फ 20 विधायक गए थे। बात बागियों की सदस्यता खत्म करने तक जा पहुंची थी। उस समय पायलट की भाजपा से भी बात चल रही थी, वह बात नहीं बनी और सचिन पायलट को भी समझ में आ गया कि वह कांग्रेस में रह कर ही मुख्यमंत्री बन सकते हैं, तो वह सब कुछ गवां कर लौट आए थे। पायलट उप मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष दोनों पदों से हाथ धो बैठे थे।
इसलिए अशोक गहलोत को रणनीतिक तौर पर इतना कमजोर नहीं समझना चाहिए। जब अशोक गहलोत ने अल्पमत में आने के बावजूद अपनी सरकार भी बचा ली थी और सचिन पायलट को पैदल भी कर दिया था तो अब तो वह कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे।
गहलोत के बारे में कहा जाता है कि वह अपनी सभी जेबों में एक एक कार्ड रखते हैं। जब उन्हें दाईं जेब वाला कार्ड चलना होता है तो वह बाईं ओर वाला कार्ड निकालते हैं। उनके उत्तराधिकारी की चर्चा भी एक महीने से चल रही है। जो लोग अशोक गहलोत को जानते हैं, वे यह भी जानते हैं कि वह सचिन पायलट को रोकने की हर संभव कोशिश करेंगे। इसलिए गहलोत कैंप से ही एक महीने से स्पीकर सी.पी जोशी का नाम चल रहा है।
गहलोत जादू की कौन सी छड़ी घुमाएंगे, कोई नहीं कह सकता। उनकी एक जेब में सी.पी. जोशी की पर्ची होगी, दूसरी जेब में रघु शर्मा के नाम की पर्ची होगी। लेकिन चुनाव सर पर हैं और एक ओबीसी की जगह ब्राह्मण को सी.एम. बनाना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना होगा इसलिए अशोक गहलोत की तीसरी जेब में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोबिंद सिंह डोटासरा की पर्ची होगी।
हालांकि सचिन पायलट इस गलतफहमी में हैं कि राहुल गांधी ने उन्हें हरी झंडी दे दी है, इसलिए वही मुख्यमंत्री होंगे। सी.पी. जोशी से वह भावी मुख्यमंत्री के नाते विधानसभा स्पीकर को मिलने गए थे जबकि गहलोत का मास्टर स्ट्रोक अभी बाकी है। वह सचिन पायलट को रोकने की हर संभव कोशिश करेंगे, सबसे बड़ा हथियार तो विधायक दल में सहमति का है। फिर भी गांधी परिवार सचिन पायलट को ही सीएम बनाने पर अड़ गया तो वह पायलट को बाकी का बचा एक साल का कार्यकाल पूरा नहीं करने देंगे।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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