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मीडिया मैनेजमेंट के सहारे भ्रष्टाचार छुपाना चाहते हैं केजरीवाल?

यह भी एक किस्म का भ्रष्टाचार ही है कि जब जो सवाल उठ रहे हो, उनका जवाब न देकर विषयांतर करने की कोशिश की जाए और दूसरे मुद्दों को ढाल के तौर पर इस्तेमाल किया जाए। किसी भी ईमानदार व्यक्ति, सरकार या प्रशासन को उठ रहे हर सवाल का सटीक और तथ्यसम्मत जवाब देना चाहिए। लेकिन दिल्ली सरकार की वापस ली जा चुकी नई शराब नीति में भ्रष्टाचार के आरोपों पर जब उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया और उनसे जुड़े ठिकानों पर सीबीआई के छापे पड़े तो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत आम आदमी पार्टी के तमाम नेता और प्रवक्ता अपनी शराब नीति पर लग रहे आरोपों का जवाब नहीं दे रहे, बल्कि इस बात का ढिंढोरा पीट रहे हैं कि उनका शिक्षा और स्वास्थ्य मॉडल कथित रूप से देश और दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है।

delhi arvind Kejriwal using media to hide corruption

केजरीवाल और उनके प्रवक्ताओं की तरफ से नयी शराब नीति में हुए भ्रष्टाचार पर किसी भी सवाल या आपत्ति का सीधा जवाब नहीं दिया गया है। ये बार-बार केवल इतना ही कह रहे हैं कि चूंकि उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य नीति का ढिंढोरा पूरी दुनिया में पीटा जा रहा है, इसीलिए केंद्र सरकार शराब नीति के नाम पर उन्हें पीट रही है। इसे प्रमाणित करने के लिए वे न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी जिस रिपोर्ट का हवाला दे रहे हैं, वह भी कई स्पष्ट कारणों से प्रोपगंडा या स्पॉन्सर्ड न्यूज़ जैसा लग रहा है।

न्यूयॉर्क टाइम्स की वेबसाइट पर जो खबर "Clean Toilets, Inspired Teachers: How India's Capital Is Fixing Its Schools" शीर्षक से 16 अगस्त 2022 को ही छप गई थी, उसे ही मनीष सिसौदिया की फोटो लगाकर "Our Children are worth it" शीर्षक से 18 अगस्त 2022 को उसके अखबार के अंतरराष्ट्रीय संस्करण में फ्रंट पेज पर लीड स्टोरी के तौर पर छापा गया।

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    मीडिया से जुड़ा कोई सामान्य व्यक्ति भी इस बात को जानता है कि आम तौर पर कोई भी प्रतिष्ठित अखबार अपनी स्पेशल स्टोरी को पहले अपने अखबार में छापता है, उसके बाद वेबसाइट पर। जो खबर वेबसाइट पर दो दिन पहले ही छपकर पूरी दुनिया में सर्कुलेट हो चुकी है, वह दो दिन बाद किसी प्रतिष्ठित अखबार के फ्रंट पेज की लीड स्टोरी कैसे हो सकती है? यानी न्यूयॉर्क टाइम्स इस मामले में स्पष्ट रूप से उल्टी गंगा बहाता हुआ दिख रहा है, जो कि प्रचलित मीडिया प्रैक्टिस के सर्वथा विपरीत है।

    दुबई के अखबार खलीज टाइम्स ने भी इसी रिपोर्टर की इसी खबर को बिल्कुल उन्हीं तस्वीरों के साथ अपने 19 अगस्त के संस्करण में पूरे पेज पर छापा। उसने खबर के नीचे न्यूयॉर्क टाइम्स का सौजन्य भी दिया। लेकिन यहां सवाल यह है कि खलीज टाइम्स भी एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय अखबार है। उसे दूसरे देश की एक पॉजिटिव सरकारी खबर को एक तीसरे देश के अखबार से सौजन्य लेकर फुल पेज पर छापने की क्या आवश्यकता थी? आम तौर पर दुनिया का कोई भी बड़ा अखबार किसी दूसरे देश की पॉजिटिव सरकारी खबर को छापने से पहले सौ बार सोचता है और बिना मज़बूत प्रेरक कारणों के किसी अन्य अखबार से सौजन्य तो बिल्कुल भी नहीं लेता।

    यहां यह भी गौर करने की बात है कि जो खबर न्यूयॉर्क टाइम्स में 16 अगस्त को ही छप चुकी थी, उसे सौजन्य से छापने के लिए खलीज टाइम्स ने 19 अगस्त का इंतज़ार क्यों किया? अगर खलीज टाइम्स को वह खबर इतनी ही प्रेरक और ज़रूरी लगी थी, तो वह उसे 16, 17 या 18 अगस्त को भी छाप सकता था, क्योंकि उसे न्यूयॉर्क टाइम्स की वेबसाइट से केवल कॉपी-पेस्ट ही तो करना था। लेकिन इसे छापने के लिए उसने न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार के इंटरनेशनल एडिशन में इसके छपने का इंतज़ार किया। यानी क्रोनोलॉजी पहले से स्पष्ट थी।

    न्यूयॉर्क टाइम्स में केजरीवाल सरकार की तारीफ में छपी इस खबर का आकार और उसमें छपी तस्वीरों की संख्या भी चौंकाती है। अखबार ने इसे फ्रंट पेज पर दो बड़ी तस्वीरों के साथ छापने के अलावा चौथे पेज पर भी जारी किया है और उस पर भी कई तस्वीरें छापी हैं। आखिर दिल्ली के सरकारी स्कूलों की स्टोरी बिना किसी लाभ या एजेंडे के उसके लिए इतनी महत्वपूर्ण कैसे हो गई?

    मीडिया से जुड़े लोग जानते हैं कि इस तरह की पॉजिटिव खबरें मुख्य रूप से तीन तरीकों से अखबारों में छपवाई जाती हैं। पहला तरीका रिपोर्टर को मैनेज करके, जो कि सबसे आसान होता है। दूसरा तरीका अखबार के विज्ञापन विभाग के द्वारा सहमति बनाकर। तीसरा तरीका किसी पीआर एजेंसी के द्वारा। आजकल ढेर सारी ऐसी पीआर एजेंसियां हैं, जो ग्राहकों से पैसे लेकर दुनिया भर के अखबारों में खबरें छपवा दिया करती हैं। देखा जाए, तो यह पूरी दुनिया में भ्रष्ट होते मीडिया की भी कहानी है, जिसमें पेड या स्पॉन्सर्ड न्यूज़ अब धड़ल्ले से प्रचलित है।

    स्वयं केजरीवाल के मुंह से अपने वीडियो में यह निकल गया कि "न्यूयॉर्क टाइम्स में खबर छपाने के लिए बड़ा मुश्किल रहता है।" इससे भी स्पष्ट है कि न्यूयॉर्क टाइम्स में यह खबर "छपाने" के लिए केजरीवाल जी को कितनी मुश्किलें पेश आई हैं। यहां यह भी गौर करने की बात है कि एक तरफ जहां अमेरिका के प्रभावशाली फोर्ड फाउंडेशन से केजरीवाल के पुराने संबंध बताए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी अखबारों की नीति भी आम तौर पर यही रही है कि भारत सरकार की आलोचना की जाए और उसके विरुद्ध यहां उठ रही आवाज़ों को प्रोत्साहित किया जाए। इसलिए जब अमेरिका का कोई अखबार केजरीवाल सरकार की तारीफ में फ्रंट पेज स्टोरी करता है, और उसे दुबई का अखबार भी सौजन्य से छापता है, तो यह अपने आप में संदेहास्पद मामला बन जाता है।

    दरअसल, केजरीवाल ने अपनी छवि चमकाने और मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए शुरू से ही मीडिया मैनेजमेंट को अपना प्रमुख हथियार बनाया है। हालांकि मीडिया मैनेजमेंट का सहारा देश की लगभग सभी सरकारें लेती हैं, लेकिन केजरीवाल दो कदम आगे हैं। वे भारत के पहले ऐसे नेता हैं, जिन्होंने बड़ी संख्या में मीडिया संस्थानों के केवल फील्ड रिपोर्टरों को ही नहीं, बल्कि डेस्क पत्रकारों को भी मैनेज किया, ताकि डेस्क पत्रकारों से भी पॉजिटिव खबरें व समीक्षाएं लिखवाई जा सकें।

    इतना ही नहीं, उन्होंने बड़ी संख्या में पत्रकारों को राजनीति में आने का लालच दिया, जिनमें कई फंसे भी और आशुतोष जैसे कुछ चर्चित पत्रकार ठगे जाने के कारण वापस भी लौटे। और जबसे दिल्ली में उनकी सरकार बनी है, तब से तो वे राष्ट्रीय मीडिया को उदारतापूर्वक विज्ञापन देते हैं। कोई भी अन्य राज्य सरकार राष्ट्रीय मीडिया को इस उदारता से विज्ञापन नहीं देती। इसका लाभ भी केजरीवाल को मिलता है और आम तौर पर राष्ट्रीय मीडिया में उनकी आलोचनात्मक ख़बरें कम ही दिखाई देती हैं और मजबूरी में थोड़ी-बहुत जो दिखाई भी देती हैं, उनमें संयम और चतुराई का समन्वय स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है।

    इस बार भी, क्या इस तथ्य से इनकार किया जा सकता है कि मनीष सिसौदिया के कथित शिक्षा मॉडल के बारे में न्यूयॉर्क टाइम्स की पॉजिटिव खबर दिल्ली के उपराज्यपाल द्वारा उनकी शराब नीति को लेकर सीबीआई जांच की सिफारिश के बाद और सीबीआई छापे पड़ने से ठीक पहले छपी है? क्या यह महज संयोग है या एक सोचा-समझा प्रयोग? यूं ही जब एक बड़े समाचार चैनल के प्रमोटर पर सीबीआई के छापे पड़े थे और उनकी गर्दन फंसी हुई थी, तब उनके एक पत्रकार को मैगसेसे पुरस्कार दिलवाया गया था, और इस तरह अंतरराष्ट्रीय दवाब पैदा करके चैनल की रक्षा की गई थी।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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