नीतीश कुमार के लिए दिल्ली अभी भी बहुत दूर है
बिहार में सब झटपट में हो गया। फटाफट साथी बदला। इस्तीफा हुआ। विपक्ष के नेता से गलबहियां हुई। भौचक रह गई बीजेपी ने कोई शुरुआती बखेड़ा खड़ा नहीं किया। नई सरकार का आका बनकर मुख्यमंत्री ने फिर शपथ ले ली। न कोई हंगामा। न ही शोर। न धनबल, न बाहुबल का प्रयोग। न ही मौजूदा दौर के चलन वाला विधायकों को बंधक बनाने का खेल। न कोई बागी न ही कोई विद्रोह।

हालांकि आगे बवंडर के संकेत मिलने शुरु हो गए हैं। लगने लगा है कि सत्ता परिवर्तन जितने सस्ते में हो गया, नीतीश कुमार के लिए भविष्य उतना ही जटिल बनने वाला है। राज्यसभा सांसद सुशील मोदी ने कहा है कि नई सरकार में राष्ट्रीय जनता दल कोटे से बने आधा दर्जन से ज्यादा मंत्रियों का आपराधिक रिकार्ड है।
सुशील मोदी के मैदान में उतरने से हडकंप मचा है। बीमार लालू प्रसाद यादव ने बचाव में उतरने के लिए खुद को दिल्ली से पटना शिफ्ट करने का फैसला ले लिया है। बचाव की तमाम कोशिशों के बीच आपराधिक रिकार्ड वाले मंत्रियों के होते मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सुशासन वाली छवि आगे कैसे बची रह पाएगी, यह चुनौती का विषय है।
बीजेपी से पल्ला झाड़ "ऑपरेशन लालटेन" के तहत सेकुलर सरकार बनाने की जल्दीबाजी के लिए खरमास का भय भी दिखाया गया। बिहार में सावन महीने की खास मान्यता है। उसके बाद खरमास शुरु हो जाता है। टोटका है कि सावन में हुआ काम फलदायी और खरमास का काम ज्यादा श्रमसाध्य होता है। इसलिए इस्तीफे को लेकर राज्यपाल से मिलने, नई सरकार की दावेदारी पेश करने औऱ मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री के शपथ लेने का काम सावन में ही कर लिया गया। लेकिन गैर बीजेपी सात पार्टियों की नई सरकार के विस्तृत मंत्रिमंडल का तुरंत गठन कर लेना आसान नहीं था। आखिरकार 16 अगस्त को खरमास में ही 31 मंत्रियों को शपथ दिलाने और सरकार को आकार देने का काम पूरा हो पाया।
अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को आगे के काम पर लगना है। अपने सपने को साधने के लिए खरमास में दिल्ली कूच करना है। अब यह किसी से छिपा नहीं रहा कि उनका सपना भविष्य में प्रधानमंत्री बनने का है। सपने को पूरा करने के लिए ही वह विपक्ष को एकजुट करने की मुहिम में लगने जा रहे हैं। विपक्ष के ग्रह नक्षत्र की दशा को देख खरमास का हावी होना स्वाभाविक है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की किस्मत है कि बीते आठ साल के कालखंड में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन दिन प्रतिदिन कमजोर हुआ जा रहा है। अब शिथिल होकर निस्तेज पड़ा हुआ है। विपक्ष का बिखराव प्रधानमंत्री के रणनीतिक कौशल का चमत्कार है या उनके मजबूत भाग्य का, यह विचारणीय विषय है।
केंद्र में विपक्ष की पतवार नीतीश कुमार के हाथों में आने की उम्मीद रखनेवालों की मान्यता है कि कांग्रेस की हालत पतली है। वह अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। कांग्रेस के अलावा जो कोई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राजयोग में गोचर बना, उसकी हालत खस्ता हुई पड़ी है। विपक्ष यत्र तत्र सर्वत्र बिखरा पड़ा है। उत्तर प्रदेश का पिछले चुनाव का नतीजा मिसाल है। बसपा ने सपा का विरोध करके खुद को हाशिए पर डाल दिया।
कांग्रेस हर मोर्चे पर हारने के बावजूद सपा को प्रमुख विपक्षी दल मानने से इंकार कर हंसी का पात्र बनी हुई है। किसान आंदोलन की दमदार गोलबंदी का फायदा उठाने के लिए अखिलेश औऱ जयंत चौधरी की कोशिश बेकार रही। नतीजे पूरी तरह से योगी आदित्यनाथ के हक में आ गए। पंजाब की कहानी केजरीवाल के हक में गई। कांग्रेस औऱ अकाली दल में बिखराव का सीधा लाभ भगवंत मान को मिला।
पंजाब की जीत से प्रधानमंत्री बनने का अरविन्द केजरीवाल का सपना मजबूत हुआ है। मजबूती में वह हिमाचल प्रदेश औऱ गुजरात के आगामी विधानसभा चुनाव के अखाड़े में दांव आजमा रहे हैं। बिहार में केजरीवाल अब तक नीतीश कुमार का परोक्ष समर्थन देते हुए आम आदमी पार्टी का विस्तार करने से बचते रहे थे। पर नीतीश कुमार की बढी दावेदारी से केजरीवाल का चौकस होना लाजिमी है। ममता बनर्जी से अच्छे संबंध के बावजूद आप ने गोवा चुनाव में टीएमसी को चुनौती देने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
सिर्फ केजरीवाल ही नहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जिस उम्मीद में दिल्ली के अखाड़े में उतरने को आतुर हैं, उसमें बड़े बड़े दिग्गज पहले से मौजूद हैं। कांग्रेस के राहुल गांधी, महाराष्ट्र से शरद पवार, पश्चिम बंगाल से ममता बनर्जी, तमिलनाडु से एमके स्टालिन, उत्तर प्रदेश से अखिलेश यादव, तेलंगाना से चंद्रशेखर राव प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल हैं। मौका मिलने पर आंध्र के चंद्रबाबू नायडू व जगनमोहन रेड्डी और झारखंड के हेमंत सोरेन जैसे दर्जन भर नाम भी शामिल हो सकते हैं।
इसमें विपक्ष की जीत तब ही सुनिश्चित हो सकती है जब बीजेपी के खिलाफ जबरदस्त गोलबंदी हो औऱ एकजुट होकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कुर्सी से उतारने के लिए सामूहिक मुहिम छेड़ी जाए। पहला तो कांग्रेस को समझना होगा कि वह विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए अब फिट नहीं है। मगर बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष मदन मोहन झा का नया बयान नीतीश की चाहत को नए सिरे से चुनौती पेश कर रहा है। उन्होंने कहा है कि 2024 में राहुल गांधी ही कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। जबकि पाला बदलने से पहले कांग्रेस आलाकमान से हुई बातचीत में नीतीश कुमार की उम्मीद बंधी थी कि कांग्रेस की ओर से विपक्ष को एक करने के अभियान की कमान उनके हाथ आने वाली है। एनडीए के संयोजक जार्ज फर्नाडिस की तरह ही नीतीश कुमार में यूपीए का संयोजक बनने की उम्मीद जगी है। पिछली बार इस उम्मीद के धूमिल होने के साथ ही नीतीश कुमार 2017 में बीजेपी के पाले में लौट आए थे।
विपक्ष की आपसी फूट और अंदरुनी तौर पर कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की दावेदारी को किसी भी सूरत में नहीं छोड़ने की जिद ने ही नीतीश कुमार के बीजेपी के पास वापस लौटने का आधार बनाया था। इस वजह से उस वक्त नीतीश ही नहीं शरद पवार, मुलायम सिंह यादव, ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू समेत कई दिग्गज नेताओं ने राह बदलकर सीधे या परोक्ष रुप से बीजेपी के ही साथ हो लेने का फैसला लिया था।
संभव है कि नए हालात में गांधी परिवार आगे प्रधानमंत्री का उम्मीदवार होने की जिद से पीछे हट जाए और विकल्प की ढेरों संभावना पैदा कर दे। नीतीश कुमार ऐसी ही किसी संभावना का फायदा उठाने के फिराक में आगे की राजनीतिक पारी खेलना चाहते हैं। मगर उनकी इस चाहत पर विपक्ष में ही टकटकी लगाए नेताओं की फौज खड़ी है।
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अखिलेश यादव ने नीतीश कुमार की संभावना पर यह कहकर पानी फेर दिया है कि विपक्ष की ओर से तीन लोग 2024 की संभावना पर काम कर रहे हैं। इसमें चंद्रशेखर राव, शरद पवार और ममता बनर्जी का नाम उन्होंने लिया लेकिन नीतीश को लेकर अखिलेश यादव ही 2024 में कोई संभावना नहीं देख रहे हैं। ऐसे में नीतीश कुमार के लिए दिल्ली अभी भी बहुत दूर है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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