Anti-hijab protests: ईरान के घरों में मौजूद मोरल पुलिसिंग का खात्मा एक दिन में नहीं हो सकता
ईरान में सत्ता, धर्म और संस्कृति के घालमेल की कीमत स्त्रियों ने सबसे ज्यादा चुकाई है। लेकिन अब वक्त आ गया है कि ईरानी महिलाओं के हक में आवाज उठाई जाए।

Anti-hijab protests: "बात 2014 की है, ईरान सरकार ने फज्र इंटरनेशनल म्यूजिक फेस्टिवल में कविता पाठ के लिए मुझे आमंत्रित किया था। सफर के सारे बंदोबस्त ईरान सरकार की तरफ से थे, मुझे बस मुंबई के ईरानियन कल्चर सेंटर पहुंचना था। कल्चर सेंटर पर एक ईरानी महिला मेरी मदद के लिए थीं, जिन्हें मेरे कागजात देखने थे।"
"उन्होंने मुझे कुछ देर इंतजार के लिए कहा और आहिस्ता से यह भी कह दिया कि "जानती हूं आपको इन चीजों को आदत नहीं होगी, पर ईरान जा रही हैं तो सिर ढक कर रखना होगा, नहीं तो आप मुसीबत में पड़ सकती हैं।" यूं इन सब बातों के लिए मैं तैयार थी, मैंने पूरी बाजू का कुर्ता और सलवार पहन रखा था, एक शॉल भी अपने पास रख रखा था। मैंने सहमति में सिर हिला दिया, पर मैं तब हैरान रह गई जब वह वीजा सहित जरूरी कागजात लेकर मेरे पास आईं... मैंने देखा कि मेरी एक फोटो पर इंक से सिर कवर किया गया था।"
कवयित्री रति सक्सेना अपनी ईरान यात्रा के इन अनुभवों को एक किताब की शक्ल देने जा रही हैं। पर वे चाहती हैं कि जो सूरते हाल ईरान का उन्होंने देखा, वो उनकी किताब आने तक बदल जाना चाहिए। हालांकि वे यह भी कहती हैं कि मोरल पुलिसिंग अब वहां हर घर में है।
उन्होंने बताया कि तेहरान में एक मीनार की सैर करते हुए एक महिला सर्जन से मुलाकात हुई थी। सर्जन ने बताया कि ऑपरेशन करते हुए भी उन्हें हिजाब पहनना पड़ता है। अगर वे ऐसा नहीं करे तो उनका पति ही उन्हें मार डालेगा। महिला सर्जन ने यह भी कहा कि हो सके तो मेरी आवाज दुनिया तक पहुंचाना...।
रति कहती हैं, आज ईरान की महिलाओं की आवाज पूरी दुनिया सुन रही है, लेकिन मुक्ति की यह राह आसान नहीं है। कट्टरवाद ने ईरान के पुरुषों की सोच में बड़ा बदलाव किया है। ऐसा लगता है कि लोगों का डीएनए ही बदल गया है। वहीं स्त्रियों के बारे में उनका अनुभव जरा अलग रहा।
वे बताती हैं, ईरान में एक मित्र के यहां गई तो उनकी जवान बच्ची ने जानना चाहा कि क्या भारत में नाइट क्लब है? वह रातभर नाइट क्लब में डांस करना चाहती थी। बाहर हिजाब में रहने वाली स्त्रियां घर के भीतर कुछ और होती हैं, हंसती हैं, नाचती हैं, गाती हैं, पर ऐसा करते हुए फोटो नहीं खिंचवा सकतीं। ईरानी महिलाएं बेहद खूबसूरत और फैशनपरस्त होती हैं। खुद को हर वक्त ढके रहना होता है, ऐसे में वे अपनी आंखों, नाखूनों और पैरों के मेकअप पर बेहद ध्यान देती हैं।
मशहूर साहित्यकार असगर वजाहत अपने ईरान यात्रा वृत्तान्त 'चलते तो अच्छा था' में इसी बात की तस्दीक करते हैं। वे लिखते हैं, "चेहरे पर जितना शानदार 'मेकअप' आपको तेहरान में देखने को मिलेगा, उतना सम्भवत: दिल्ली या मुंबई में भी न मिले। लड़कियां बहुत प्यार से, ध्यान से, कोशिश से और ढेर सारा पैसा खर्च करके अपने चेहरों को सजाती और संवारती हैं। शायद लगता होगा शरीर का यही तो एक हिस्सा खुला है। इस पर ही ध्यान दे सकते हैं।"
"इसी तरह पैरों का मेकअप भी देखने लायक होता है। पैरों का नेल पॉलिश से ही नहीं बल्कि चप्पलों और सैण्डिलों के नए-नए डिजाइनों से आकर्षण बढ़ाया जाता है। कभी-कभी तो आधे सिर पर रुमाल बांधे, चुस्त और करारे कपड़े पहने, जीन्स ऊपर चढ़ाए लड़कियां 'हिजाब' करने के धार्मिक कानून को ठेंगा दिखाती लगती हैं।"
अपने तरीके से ईरानी स्त्रियां हिजाब से उपजी बेचैनी को कम करने में जुटी थीं कि एक घटना ने उनके सब्र का बांध तोड़ दिया। मोरल पुलिस ने बाइस बरस की महसा अमीनी की जिंदगी छीन ली। स्त्रियां विरोध प्रदर्शन के लिए सडक़ों पर आ गईं। खुले विचार वाले पुरुषों का भी उन्हें साथ मिला तो विरोध देशभर में फैल गया।
इस बगावत को दुनियाभर से समर्थन मिला, शायद इसी वजह से मॉरल पुलिसिंग को वापस लेने का बयान बीते रविवार को ईरान के अटॉर्नी जनरल मोहम्मद जफर मोंताजेरी ने दिया। हालांकि अभी तक आधिकारिक बयान वहां की हुकूमत की ओर से जारी नहीं हुआ है, पर निश्चित रूप से दबाव बना हुआ है।
यूं क्रांति करने का मौका ईरानी स्त्रियों के पास पहली बार नहीं आया है। इससे पहले भी उन्होंने ईरान की इस्लामिक क्रांति में अहम भूमिका निभाई थी। ईरान की इस्लामिक क्रांति (1979) से पहले ईरान पर यूरोपियन संस्कृति का पूरा असर था। इस आधुनिक देश में न तो पहनावे को लेकर कोई पाबंदी थी और न ही धार्मिक पाबंदी।
शाह मोहम्मद रजा पहलवी आधुनिक विचारधारा के थे, लेकिन उन पर आरोप लगा कि वे अमेरिका के पिट्ठू हैं। ईरान की तेल संपदा पर अमेरिका की नजर रही। ऐसे में शाह का विरोध शुरू हुआ। इस विरोध का नेतृत्व धार्मिक नेता अयातुल्लाह रूहोल्लाह खोमैनी का रहा। इस्लामिक गणराज्य बनने के साथ ही स्त्रियों के लिए हिजाब को जरूरी कर दिया गया, पर खुलापन ईरान के डीएनए में है।
दुनिया की प्राचीनतम समृद्ध संस्कृति वाले इस देश में इस्लाम से पहले जोरोएस्ट्रिनिज्म (पारसी) धर्म का प्रभाव था। यह बहुत खुला धर्म था, जिसने सभी संस्कृतियों को स्वीकारा। जब ईरान पर अरबों ने विजय हासिल की, तो इन अग्निपूजकों को यहां से जाना पड़ा या फिर धर्म बदलना पड़ा।
सत्ता, धर्म और संस्कृति के इस घालमेल की कीमत स्त्रियों ने सबसे ज्यादा चुकाई है। पर अब वक्त है कि इन सभी चीजों को अलग-अलग करके देखा जाए, ईरानी महिलाओं के हक में आवाज उठाई जाए, क्योंकि घर में मौजूद मोरल पुलिसिंग का खात्मा एक दिन में नहीं हो सकता।
यह भी पढ़ें: Anti-hijab protests: हिजाब को लेकर अलग मापदंड क्यों?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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