जो बल्लेबाज पिछले 10 साल में दोहरे अंक तक नहीं पहुंच सका उससे डबलसेंचुरी लगवाएंगे प्रशांत किशोर!
नई दिल्ली, 18 अप्रैल। प्रशांत किशोर और कांग्रेस एक दूसरे को पसंद करते हैं। मिलते-जुलते भी हैं। लेकिन रिश्ता नहीं बना पाते। रिश्ते शर्तों पर नहीं बनते। रिश्ते मजबूरी में भी नहीं बनते। रिश्तों को गढ़ने और बढ़ने के लिए भरोसा जरूरी है। लेकिन बदकिस्मती से दोनों के बीच एक अविश्वास की खाई है जो तमाम कोशिशों के बाद भी पट नहीं पायी है। पिछले साल भी प्रशांत किशोर के कांग्रेस में जाने की चर्चा थी। लेकिन मेल की बेल परवान न चढ़ी।

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अब फिर दोनों के बीच उम्मीदों के चिराग के रौशन होने की चर्चा है। आखिर प्रशांत किशोर और कांग्रेस खुल कर एक दूसरे हाथ क्यों नहीं थाम रहे ? इतनी गोपनीयता और पर्देदारी की क्या जरूरत है ? जो बल्लेबाज यूपी की पिच पर पिछले 10 साल में दोहरे अंकों तक नहीं पहुंच सका उससे पीके कैसे डबल सेंचुरी (272) लगवाएंगे ?

खुल कर साथ क्यों नहीं आते ?
कांग्रेस जब हारती है तो हताशा में सहारा खोजने लगती है। उसकी मुश्किल ये है कि वह खुल कर किसी की मदद भी नहीं लेना चाहती। 16 अप्रैल को सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की प्रशांत किशोर के साथ एक अहम बैठक हुई है। कांग्रेस इस बैठक के बारे में खुल कर कुछ नहीं बता रही। कांग्रेस की हालत उस उजड़े जमींदार की तरह है जो अपनी फटेहाली छिपाने के लिए तरह तरह का स्वांग करता है। लेकिन मखमल में लगा टाट का पैबंद झलक ही जाता है। गांधी परिवार का अंतिम मोहरा (प्रियंका गांधी) भी उत्तर प्रदेश में पिट गया। जिस प्रियंका गांधी को कांग्रेस का तारणहार समझा जा रहा था उनकी सरपरस्ती में पार्टी की लुटिया डूब गयी। महिला कार्ड, स्कूटी कार्ड सब फेल हो गया। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें मिलीं। 2017 से भी ज्यादा शर्मनाक हार हुई। सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जब चुनावी पिच पर क्लीनबोल्ड बोल्ड हो चुके हैं तब कांग्रेस की ढहती पारी को कौन संभालेगा ? क्या प्रशांत किशोर ऐसा करेंगे ? क्या चुनाव कोई गणित का सवाल है कि किसी फारमूले से हल कर लिया जाएगा ? जिस कांग्रेस को पिछली परीक्षा में 543 में से सिर्फ 52 अंक मिले थे उसे दो साल बाद 272 मार्क्स कैसे दिलाएंगे ?

राज्यों में चुनावी जीत दिलाना अलग बात है
अब सवाल ये है कि प्रशांत किशोर कैसे कांग्रेस को तख्त दिलाएंगे ? दिल्ली की तख्त का रास्ता, उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। उत्तर प्रदेश फतह के बिना दिल्ली का सपना देखना, ख्याली पुलाव पकाने की तरह है। उत्तर प्रदेश में 136 साल पुरानी कांग्रेस की हालत अब क्षेत्रीय दलों से भी कमतर हो गयी है। अपना दल, निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी जैसे नये दलों की हैसियत अब कांग्रेस से अधिक है। जो बल्लेबाज पिछले 10 साल में दहाई का आंकड़ा नहीं छू सका उससे दोहरा शतक लगाने की उम्मीद करना दुष्साहस है। प्रशांत किशोर बहुत अच्छे कोच हैं। उन्होंने कई टीमों को जीत दिलायी है। लेकिन यह भी देखना होगा कि उन्होंने उन्हीं टीमों को जीत दिलायी है जो पहले से अच्छा खेल रही होती हैं। किसी फिसड्डी टीम के माथे पर जीत का सेहरा नहीं बांधा है। दूसरी बात ये कि उन्होंने अभी तक राज्य स्तर की टीमों को ही जीत दिलायी है। राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में उन्होंने एक मात्र जीत 2014 में दिलायी थी जब वे भाजपा के साथ थे। राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाजपा के खिलाफ उनकी योग्यता की परीक्षा अभी तक नहीं हुई है। किसी एक दल के लिए रणनीति बनाना आसान है। लेकिन किसी गठबंधन के लिए रणनीति बनाना शायद ही संभव है। पिछले साल उनकी कांग्रेस से डील इसलिए नहीं हो पायी थी क्यों कि वे फ्रीहैंड जिम्मेदारी चाहते थे। जब कि कांग्रेस उन पर आंख मूंद कर भरोसा करने के लिए राजी नहीं थी। अब क्या स्थिति बदल गयी है ?

क्या है जीत के लिए सलाह ?
प्रशांत किशोर ने कांग्रेस को कुछ महत्वपूर्ण सलाह दी हैं। उनकी राय है कि कांग्रेस सभी 543 सीटों पर लड़ने की बजाय उन सीटों पर ध्यान केन्द्रित करे जहां वह जीती है या फिर दूसरे स्थान पर रही हो। इस तरह वह करीब 350 सीटों की पहचान करे। बाकी सीटें वह अपने गठबंधन के दलों के लिए छोड़ दे। गठबंधन के सहयोगी दल अपने अनकूल सीटों पर ही दावा करें। इसके लिए एक सर्वे कराया जाय जिससे सीटों की जमीनी सच्चाई का पता चल सके। लेकिन सवाल ये है कि विपक्ष के कितने दल कांग्रेस ने नेतृत्व में चुनाव लड़ने के लिए राजी होंगे ? पिछले 10 साल में आज तक ये ही तय नहीं हो पाया कि पीएम मोदी के खिलाफ विपक्ष का चुनावी चेहरा कौन होगा ? क्या ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, मायावती, नवीन पटनायक, अरविंद केजरीवाल, शरद पवार और स्टालिन राहुल गांधी को नेता मानेंगे ? ममता बनर्जी और शरद पवार खुद विपक्ष का केन्द्रबिन्दु बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं। खुद प्रशांत किशोर ममता बनर्जी को पीएम इन वेटिंग बनाने की मुहिम चलाते रहे हैं। अब वे यह काम कैसे राहुल गांधी के लिए कर सकते हैं ? प्रशांत किशोर कई मौकों पर कह चुके हैं कि जनसंवाद की कला में नरेन्द्र मोदी का कोई मुकाबला नहीं। राहुल गांधी उनसे बहुत पीछे हैं। प्रशांत किशोर कांग्रेस का नेता बन जाएं या फिर चुनावी रणनीतिकार, पार्टी को 272 नम्बर दिलाना आसान काम नहीं है।
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