2018 में पैदा होने वाले कहेंगे, पापा कहते थे...
वक्त के साथ दुनिया में हर चीज़ बदल रही है. दुनिया में समाज की दिशा बदलने वाले महान आविष्कारों को कभी दशकों लग जाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा.
जिस तेज़ी से नई तकनीक आगे बढ़ रही है, लगता है कि चीज़ें इस कदर बदल जाएंगी कि एक ही पीढ़ी में लोगों के अनुभव एक दूसरे से काफी अलग होंगे.
वो क्या नए बदलाव होंगे जिनके बारे में साल 2018 में जन्म होने वाले कह सकेंगे, 'पापा कहते थे.....'
"पापा कहते थे, उनकी भाषा ही नहीं समझ आई"
साल 1979 में अपनी किताब 'गैलेक्टिक ट्रैवलर्स गाइड' में डगलस एडम ने लिखा था, "छोटी सी पीले रंग की जोंक की तरह दिखने वाली 'बेबल मछली' ब्रह्मांड की सबसे अद्भुत चीजों में से एक थी."
ऐसी एक मछली आप अपने कान में डाल लीजिए और इसके बाद आप किसी भी भाषा को तुरंत समझ सकेंगे.
वक़्त की बात है ये मछली तकनीक के साथ इतनी आगे तैरती चली गई कि अब इसने भाषा के फर्क को लगभग ख़त्म ही कर दिया है.
स्काइप और गूगल ने तुरंत (इन्सटैंट) ट्रान्सलेशन कर सकने की तकनीक बना ली है ताकि आप भले ही भाषा को न जानते हैं, पर उसे साफ-साफ समझ सकें.
यही नहीं बल्कि कई अन्य कंपनियां भी इस 'बेबल फिश' को बढ़िया तरीके से बनाने की कोशिश कर रही हैं. काफी हद तक संभव है कि आने वाले सालों में हमारे बच्चे एक ऐसी दुनिया में रहें जहां कोई किसी से भी आसानी से बात कर सकता है.
ये अलग बात है कि 'गैलेक्टिक ट्रैवलर्स गाइड' की इस 'बेबल फिश' ने अलग-अलग नस्लों और संस्कृतियों के बीच बातचीत कर सकने की राह में मौजूद सभी मुश्किलें तो हटा दीं लेकिन इसके कारण दुनिया में युद्ध और रक्तपात ही अधिक हुआ.
"पापा कहते थे... सफ़र बहुत दूर का है"
अमरीका के संस्थापकों में से एक बेन्जामिन फ्रैंकलिन के दौर में (1706-1790) उन्होंने अटलांटिक महासागर को अपने जीवनकाल में कुल आठ बार लांघा था. ये एक ख़तरनाक यात्रा हुआ करती थी जिसमें छह सप्ताह से लेकर दो से तीन महीने तक लग सकते थे.
हम लोगों की बात करें तो अटलांटिक पार करना इतना मुश्किल काम नहीं रहा. कुछ रास्तों पर विमान के ज़रिए आठ घंटे में आप अटलांटिक महासागर को लांघ सकते हैं. फ्रैंकलिन ने जिस तरह तरह ये यात्राएं पूरी की थीं उस बारे में हम कल्पना भी नहीं कर सकते.
जिस यात्रा को हम आसानी से स्वीकार कर लेते हैं, वो इस साल जन्म होने वालों के लिए उनकी सबसे लंबी यात्रा हो सकती है.
हवाई जहाज़ों की स्पीड बीते एक दशक में कुछ खास नहीं बढ़ी है. लेकिन कोनकोर्ड विमान इसमें एक अपवाद था जो बदलाव का संकेत था. दो हज़ार मील प्रति घंटे (माक 2.02) की क्रूज़ स्पीड से उड़ सकने वाले इन विमानों को साल 2003 के बाद उड़ाया नहीं गया.
हालांकि यात्री परिवहन के तौर पर इन्हें फिलहाल काम में नहीं लाया जाएगा लेकिन सुपरसोनिक विमान जल्द ही आसमान में उड़ान भर सकते हैं. ये विमान यात्रा का खर्च उठा सकने वालों के लिए यूरोप और अमरीका के बीच की दूरी को मात्र 3.5 घंटे कर देंगे.
लेकिन जो लोग सुपरसोनिक स्पीड में यात्रा का खर्च नहीं वहन कर सकते उनके लिए हाइपरलूप तकनीक काम आ सकती है.
अंतरिक्ष यात्रा के क्षेत्र में काम करने वाली 'स्पेस एक्स' नाम की कंपनी वैक्युम ट्यूब के ज़रिए लोगों और सामान को लाने-ले जाने के लिए इस तकनीक पर काम कर रही है.
इसके ज़रिए यात्रा का समय काफी कम हो जाएगा और एक शहर से दूसरे शहर जाने में वक्त नहीं लाएगा. मौजूदा वक़्त की बात करें तो ट्रेन से न्यूयॉर्क से वॉशिंगटन जाने में 5 घंटे लगते हैं लेकिन हाइपरलूप तकनीक से ये सफर आधे घंटे में तय हो जाएगा.
"पापा कहते थे... सुबह चिड़िया का गीत सुनोगे"
शहरों का विस्तार कोई नई समस्या नहीं है लेकिन जिस बात पर कम बहस होती है वो है इस कारण से ध्वनि प्रदूषण का बढ़ना.
संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि साल 2100 तक दुनिया के 10.8 अरब नागरिकों में से 84 फीसदी शहरों में रहेंगे और वो लगातार अलग-अलग तरह की आवाज़ों में घिरे रहेंगे.
इसका मतलब यह होगा कि आज जन्म लेने वाले कई बच्चे ये कभी नहीं जान पाएंगे कि शांति क्या होती है.
"पापा कहते थे... कागज़ और धातु के टुकड़ों से चलता है जीवन"
नकद लेन-देन को लगा पहला झटका था क्रेडिट कार्ड. लेकिन नकद लेन-देन अभी ख़त्म नहीं हुआ है.
आज हम जिस दौर में हैं, उसमें क़ाग़ज़ का धन पेपाल, पेटीएम, वेन्मो, ऐप्पल पे और ऐसे कई वर्चुअल भुगतान के विकल्पों के साथ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है.
जब तक साल 2018 में जन्मे बच्चे अपनी खुद की कमाई करने लायक होंगे उनके पास भुगतान करने के लिए कई और विकल्प होंगे और ये पूरी तरह संभव है कि नकद लेन-देन पूरी तरह ग़ायब हो जाए.
उस वक्त क्रिप्टोकरेंसी को संग्रहालय में टिकटों के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकेगा.
ब्लॉकचेन तकनीक वर्चुएल लेन-देन के लिए सुरक्षा बढ़ाने की हससंभव कोशिश कर रही है. हालांकि मौजूदा दौर में एन्क्रिप्शन बाज़ार अस्थिर है लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि अब भी इसमें काफी क्षमता है.
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