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FACT CHECK: CAA के खिलाफ नहीं जा सकते हैं राज्य, कपिल सिब्बल ने खोले झूठे दावों के पोल!

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बेंगलुरू। संसद के दोनों सदनों से सर्वसम्मति से पारित नागरिकता संशोधन विधेयक राष्ट्रपति की मुहर के बाद पूरे देश में नागरिकता संशोधन कानून लागू हो चुका है, जिसका नोटिफिकेशन भी केंद्र सरकार द्वारा जारी किया जा चुका है। सीएए जब सीएबी (नागरिकता संशोधन विधेयक) था तब से शुरू हुआ विपक्ष का विरोध अभी तक जारी है। कुछ राज्यों ने सीएए के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव पास भी किया है, जिसकी संवैधानिकता जीरो हैं। इनमें पहला राज्य केरल है, जहां वामपंथी सरकार है और दूसरा राज्य है पंजाब, जहां कांग्रेस की सरकार है।

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संवैधानिक दृष्टि से किसी भी राज्य के पास से सीएए के खिलाफ प्रस्ताव पास करने और सीएए लागू करने का अधिकार ही नहीं है। इसकी पुष्टि खुद पूर्व कानून मंत्री और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने भी कर दी है। एक बयान जारी कर सिब्बल ने उन राज्य सरकारों की आंखें खोलने की कोशिश की है, जो सीएए (नागरिकता संसोधन विधयेक) के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव ला चुकी है अथवा प्रस्ताव लाने का विचार कर रही हैं।

मालूम हो अभी तक केरल की लेफ्ट सरकार की अगुवाई करने वाले मुख्यमंत्री पिन्नराई विजयन और पंजाब में कांग्रेस सरकार का नेतृत्व कर रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह सीएए के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव लेकर आए हैं। दिलचस्प बात यह है कि उन्हें पता ही नहीं कि ऐसा करके दोनों राज्य भारतीय संविधान के विरूद्ध जा चुके हैं। निःसंदेह देश में संविधान और कानून दोनों को लेकर लोगों की जागरूकता की कमी के चलते पार्टियों ने लोगों को गुमराह किया और राज्य सरकारें मोदी विरोध में इतनी अंधी हो गईं कि खुद भेड़चाल का हिस्सा बन गई हैं।

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हैरानी की बात यह है कि इसी भेड़ चाल में पिछले दो महीने से पूरे देश में सीएए को लेकर त्राहिमाम मचा हुआ है, जबकि कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा सदन और सदन के बाहर लोगों को भरोसा दिलाया गया कि सीएए भारतीय नागरिकों के खिलाफ नहीं है, यह कानून नागरिकता छीनने के लिए नहीं बल्कि नागरिकता देने के लिए है।

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गौरतलब है नागरिकता संशोधन कानून एक खुली किताब की तरह है, जिसके बारे में पूरी जानकारी ऑनलाइन मुफ्त उपलब्ध है, जिसे आसानी से कोई भी पढ़कर अपनी जानकारी बढ़ा सकता है कि सीएए आखिर बला क्या है, लेकिन अभी तक जारी विरोध के देखते हुए स्पष्ट हो चुका है कि सीएए का विरोध व्यक्तिगत नहीं बल्कि राजनीतिक हैं। दिल्ली के शाहीन बाग में जारी धरना प्रदर्शन का सच बाहर आ चुका है। शाहीन में जारी धऱने का सच ठीक वैसा है जैसा जामिया कैंपस में सीएए के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन था।

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सीएए की आड़ में वोट बैंक की सियासी रोटियां सेंकने के लिए दिल्ली के डिप्टी सीएम ने झूठी तस्वीर जारी करके दिल्ली पुलिस को ही दंगा भड़काने का जिम्मेदार ठहरा दिया और जब तस्वीर की सच्चाई सामने आई तो उन्हें छुपाना पड़ गया। AAP विधायक अमानतुल्ला खान द्वारा भीड़ को भड़काने वाले वायरल वीडियो, जामिया कैंपस में मिले फर्जी आईडी कॉर्ड और जामिया कैंपस से चली गोलियों के खोखे चीख-चीख कर गवाही दे चुके हैं।

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राजधानी दिल्ली में सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू से लेकर अब तक महज एक सियासी नौटंकी साबित हो चुका है, जिसे विभिन्न विपक्षी दल वोट बैंक के लिए प्रायोजित तरीके से करवा रही हैं। चूंकि विपक्षी राजनीतिक पार्टियों द्वारा भारत के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को अधिक टारगेट किया जा रहा है, इसलिए इसे मुस्लिम तुष्टिकरण की नज़र से भी देखा जा सकता है। असलियत यह है कि सीएए में किसी मुस्लिम की नागरिकता नहीं छीनी जा रही है।

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सीएए की संवैधानिकता और राज्यों पर सीएए के अधिकारों की समीक्षा के बाद पता चला है कि सीएए को लेकर विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा किए गए दावे महज एक झूठ के पुलिंदे हैं, क्योंकि राज्य सरकारों को अधिकार ही नहीं है कि वो केंद्रीय सूची में निर्मित किसी को कानून को चुनौती दे सके या उसके खिलाफ विधानसभा मे कोई प्रस्ताव पास कर सके।

रही बात सीएए राज्यों में नहीं लागू करने की घोषणाओं की तो यह भी कोरी राजनीति है, क्योंकि नागरिकता से जुड़ा कोई कानून बनाने और लागू करने का अधिकार सिर्फ संसद को है, जिसके खिलाफ चर्चा करने, प्रस्ताव करने और लागू नहीं करने का अधिकार राज्यों को हासिल ही नहीं हैं।

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इसकी पुष्टि कई संविधान विशेषज्ञ बहुत पहले कर चुके हैं। संविधान विशेषज्ञों का मत है कि सीएए पूरी तरह से केंद्र सरकार का विषय है। इस पर राज्य कोई फैसला ले ही नहीं दे सकते। उनका कहना है कि भारत का नागरिक कौन होगा, यह तय करने का अधिकार सिर्फ केन्द्र सरकार को है न कि राज्यों सरकार को।

देश के पूर्व कानून आयोग के मुताबिक नागरिकता शुरू से ही केन्द्र की सूची में शामिल रही है। नागरिकता से जुड़े किसी भी नियम में बदलाव का आधार और अधिकार केवल केन्द्र का ही है, जिसमें किसी तरह का बदलाव राज्य सरकारों को करने का अधिकार ही नही हैं।

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संविधान विशेषज्ञों के शब्दों में कहें तो सीएए लागू नहीं करने की घोषणा कर चुकी राज्य सरकारों को थक-हारकर संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित सीएए कानून को अपने राज्यों को लागू करना ही होगा, क्योंकि सीएए को लेकर किसी भी राज्य सरकार के पास बस इतना अधिकार नहीं है कि वो उसको राज्यों में लागू करने से इनकार कर सकती है।

हालांकि कानून व्यवस्था को लेकर राज्य सरकारें केंन्द्र सरकार से अपनी नाराजगी दिखा सकती हैं, लेकिन सीएए को लागू करने से बिल्कुल भी इनकार नहीं कर सकती है, क्योंकि ऐसा करके राज्य सरकारें देश के संविधान का अपमान करेंगी और राज्यपाल की सिफारिश में ऐसी राज्य की सरकारें बर्खास्त भी की जा सकती है।

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सीएए के बार में पूर्व कानून सचिव पीके मल्होत्रा का कहते हैं कि संसद द्वारा पारित कानून को लागू करने से राज्य सरकारें मना नहीं कर सकती हैं। यह संविधान की सातवीं अनसूची की सूची 1 में इसका उल्लेख है। सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े के मुताबिक किसी भी व्यक्ति को नागरिकता देना केन्द्र का मामला है, राज्यों की इसमें कोई भूमिका नहीं है।

वरिष्ठ वकील हेगड़े ने बताया कि अगर केन्द्र सरकार नागरिकों के लिए पूरे देश में नेशनल रजिस्टर बनाती है तो ही इसे लागू कराने में राज्यों की मदद की जरूरत पड़ सकती है, जिसे हम अभी एनआरसी के रूप मे जानते है, जो असम में सबसे पहले लागू किया जा चुका है।

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उल्लेखनीय है केंद्र सरकार द्वारा नागरिकता, जनगणना और जनसंख्या से जुड़े मामलों को संविधान की केंद्रीय सूची में रखा गया है। इसका मतलब यह है कि इन मुद्दों पर कानून बनाने का अधिकार सिर्फ संसद को है। संविधान के अनुच्छेद 11 में भी स्पष्ट रूप से लिखा है कि नागरिकता को लेकर कानून बनाने का अधिकार केवल भारतीय संसद को है।

दरअसल, संसद द्वारा पारित कानून को रोकने का अधिकार राज्यों की विधानसभाओं के पास है ही नहीं। ऐसा माना जा रहा है कि जैसे-जैसे लोगों में सीएए की वैधानिकता और सीएए के बारे जागरूकता बढ़ेगी विपक्षी दलों का विरोध बहुत जल्द ठंडा पड़ जाएगा।

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोगों को जागरूक करने के लिए गत 5 जनवरी से पूरे देश में सीएए के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए एक मुहिम छेड़ा था और बीजेपी सांसदों और बीजेपी विधायकों को घर-घर जाकर लोगों को सीएए के खिलाफ फैली भ्रांतियों और गलतफहमियों को दूर करने की कोशिश की गई, जिसका नतीजा भी आया और पूरे देश में सीएए के पक्ष में रैलियां निकलनी शुरू हो गईं।

पूरी संभावना है कि जल्द वो लोग भी सड़कों से घर लौट आएंगे, जो सीएए के खिलाफ जारी धरने में शामिल है, क्योंकि सीएए के प्रति जागरूकता के बाद सियासी दलों की वोट बैंक की राजनीति का भी पता चल सकेगा, जिन्हें साधने के लिए गैर-बीजेपी शासित राज्य सरकारें झूठ फैलाई जा रही हैं कि वो सीएए को नही लागू करेंगे।

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पूरे देश में करीब दो महीने से अधिक समय तक अराजकता और हिंसा फैलाने के लिए जिम्मेदार ऐसे राजनीतिक दलों से देश की जनता को पूछना चाहिए कि सीएए में ऐसा क्या है, जिससे भारतीय मुस्लिम समेत किसी भारतीय की नागरिकता खतरे में पड़ गई है। साथ ही, उन राज्यों से वहां की जनता को यह भी पूछना चाहिए जब उन्हें केंद्रीय सूची में शामिल विषयों पर निर्मित कानून का विरोध करने का कोई अधिकार नहीं है, तो किस बिना पर ऐसा बयान दे रही हैं।

यही वजह है कि सीएए के खिलाफ जारी विरोध के बावजूद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सीएए को लेकर राज्य सरकारों के विरोध को गंभीरता से नहीं लिया और यहां तक कह दिया कि सीएए को लेकर उनके साथ कोई बातचीत भी नहीं होगी। हालांकि इस मामले में केंद्र सरकार पहले ही अपना रूख स्पष्ट कर चुकी थी।

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अब यह पूरी तरह से स्पष्ट हो चुका है कि गैर-बीजेपी शासित सरकार वाले राज्यों में जानबूझकर सीएए का विरोध किया जा रहा है। जबकि नागरिकता संशोधन कानून के पास होने से पहले सभी राज्यों से बातचीत कर ली गई थी। नियमानुसार, राज्यों से बातचीत करने के बाद ही नागरिकता (संशोधन) बिल संसद में पेश किया जाता है।

राज्यों की विधानसभाएं सिर्फ राज्य सूची के विषयों पर ही कानून बनाने का अधिकार रखती हैं। संविधान के अनुच्छेद 245 और 246 में भी संसद के कानून बनाने की शक्ति का विस्तार से जिक्र किया गया है। इस बाबत आम जनता को बताया जाएगा कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को देश की संसद ने पारित किया है। इसमें कोई राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की विधानसभा किसी भी तरह की कोई रोक नहीं लगा सकती। अगर केरल या कोई अन्य राज्य नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ कोई प्रस्ताव लाते हैं तो वो असंवैधानिक है।

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सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य सरकारें सिर्फ सीएए के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकती है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट भी नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ तभी फैसला सुनाएगा, जब वह सीएए को संविधान या मौलिक अधिकारों के खिलाफ पाएगा। इसके अलावा नागरिकता संशोधन कानून को खत्म करने या इसमें परिवर्तन करने का कोई विकल्प नहीं है।

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अंततः सभी गैर-बीजेपी शासित राज्यों को नागरिकता संशोधन अधिनियम को लागू करना ही होगा। इनमें पंजाब और केरल की सरकारें भी शामिल हैं, जो सीएए के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव पास कर चुकी हैं। केरल राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने केरल सरकार के प्रस्ताव की वैधानिकता पर सवाल उठाया तो खिसियाए केरल के मुख्यमंत्री पिन्नराई विजयन अब सुप्रीम कोर्ट की ओर रुख कर चुके हैं।

यह भी पढ़ें-जानिए, कैसे CAA का विरोध करके आप अल्पसंख्यकों पर हुई प्रताड़ना को सही ठहरा रहें हैं?

सीएए क्या है?

सीएए क्या है?

भारतीय नागरिकता कानून 1955 में लागू हुआ था, जिसमें बताया गया है कि किसी विदेशी नागरिक को किन शर्तों के आधार पर भारत की नागरिकता दी जाएगी। इस कानून में हाल ही में संशोधन किया गया। इसके बाद इसका नाम बदलकर सिटीजनशिप अमेंडमेंट एक्ट यानी सीएए हो गया। इसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आने वाले हिंदू, सिख, जैन, पारसी, बौद्ध और ईसाई धर्म के शरणार्थियों को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है। इन तीन देशों से आने वाले इन 6 धर्मों के शरणार्थियों को भारतीय नागरिक बनने के लिए 11 साल की जगह 5 साल रहना जरूरी होगा।

राज्य सरकारें केंद्र के बनाए CAA को मानने के लिए बाध्य

राज्य सरकारें केंद्र के बनाए CAA को मानने के लिए बाध्य

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 11 के तहत नागरिकता पर कानून बनाना पूरी तरह से संसद के कार्यक्षेत्र व अधिकार क्षेत्र में आता है। राज्यों को इस मामले में कोई अधिकार नहीं है। अगर ये इसे अपने यहां लागू नहीं करते हैं तो यह संविधान का उल्लंघन होगा। राज्यों के पास दो विकल्प हैं। वे इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं या अगले लोकसभा चुनाव में बहुमत मिलने पर कानून बदल सकते हैं। अगर सुप्रीम कोर्ट कहती है कि एनआरसी संविधान का उल्लंघन है तो फिर यह कहीं पर भी लागू नहीं होगा। लेकिन अगर यह संविधान का उल्लंघन नहीं माना गया तो सभी राज्यों को इसे अपने यहां लागू करना होगा।

अनुच्छेद 356 के तहत राज्यों पर राष्ट्रपति शासन लगाने का विकल्प

अनुच्छेद 356 के तहत राज्यों पर राष्ट्रपति शासन लगाने का विकल्प

अनुच्छेद 256 और 257 के तहत किसी भी राज्य के लिए केंद्रीय कानून को नहीं मानना कानूनी रूप से जायज नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 249 संसद को राष्ट्रहित में राज्यों से संबंधित विषयों पर भी कानून बनाने का अधिकार देता है। केंद्र सरकार अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति से यह सिफारिश कर सकती है कि कोई राज्य विशेष संवैधानिक प्रावधानों को अमल में नहीं ला रहा है और वहां राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए। संविधान की सातवीं अनुसूची केंद्र सरकार को नागरिकता पर कानून बनाने का अधिकार देती है, जिसे मानने के लिए राज्य सरकारें बाध्य हैं।

नागरिकता संशोधन कानून पर क्या है इन 4 राज्यों का रुख

नागरिकता संशोधन कानून पर क्या है इन 4 राज्यों का रुख

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली के मुख्यमंत्री भी नागरिकता कानून का विरोध कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने साफ तौर पर ये नहीं कहा है कि वे इसे लागू नहीं होने देंगे। मप्र और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने कहा है कि हमारा रुख वही होगा। तेलंगाना में सत्तारूढ़ टीआरएस ने संसद में इस बिल का विरोध किया था, लेकिन इसे लागू करने को लेकर उसका रुख साफ नहीं है।

भाजपा के विरोधी दल करा रहे हैं राज्यों में प्रदर्शन

भाजपा के विरोधी दल करा रहे हैं राज्यों में प्रदर्शन

नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन यानी एनआरसी को लेकर कुल 14 राज्यों में विरोध-प्रदर्शन देखे गए हैं। इन दोनों मुद्दों पर खासतौर पर कांग्रेस शासित राज्यों में विरोध हो रहा है। इन राज्यों में ममता बनर्जी की सरकार वाला पश्चिम बंगाल एवं भाजपा सरकार की अगुवाई वाला असम भी शामिल है। इनके अलावा त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों के अलावा तमिलनाडु, केरल, यूपी, बिहार, दिल्ली और तेलंगाना में भी हिंसक प्रदर्शन हो चुके हैं।

CAA के विरोध में खड़ी हैं देश में 30% आबादी वाली 9 राज्य सरकारें

CAA के विरोध में खड़ी हैं देश में 30% आबादी वाली 9 राज्य सरकारें

कांग्रेस की सत्ता वाले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री समेत सीएए का अब तक 9 मुख्यमंत्रियों ने विरोध किया है। ये मुख्यमंत्री उन 9 राज्यों में सरकार चला रहे हैं, जहां देश का एक तिहाई भूभाग आता है और लगभग 30% आबादी रहती है। इनमें से 18% आबादी वाले 5 राज्य ऐसे हैं, जहां के मुख्यमंत्रियों ने साफतौर पर कह दिया है कि हम इस कानून को लागू नहीं होने देंगे।

राज्य सरकारें सिर्फ सीएए के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकती है

राज्य सरकारें सिर्फ सीएए के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकती है

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य सरकारें सिर्फ सीएए के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जा सकती है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट भी नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ तभी फैसला सुनाएगा, जब वह सीएए को संविधान या मौलिक अधिकारों के खिलाफ पाएगा। इसके अलावा नागरिकता संशोधन कानून को खत्म करने या इसमें परिवर्तन करने का कोई विकल्प नहीं है।

सीएए के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव ला चुकी हैं केरल व पंजाब सरकार

सीएए के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव ला चुकी हैं केरल व पंजाब सरकार

अंततः सभी गैर-बीजेपी शासित राज्यों को नागरिकता संशोधन अधिनियम को लागू करना ही होगा। इनमें पंजाब और केरल की सरकारें भी शामिल हैं, जो सीएए के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव पास कर चुकी हैं। केरल राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने केरल सरकार के प्रस्ताव की वैधानिकता पर सवाल उठाया तो खिसियाए केरल के मुख्यमंत्री पिन्नराई विजयन अब सुप्रीम कोर्ट की ओर रुख कर चुके हैं।

थक-हारकर राज्य सरकारों को सीएए लागू करना ही होगा

थक-हारकर राज्य सरकारों को सीएए लागू करना ही होगा

संविधान विशेषज्ञों के शब्दों में कहें तो सीएए लागू नहीं करने की घोषणा कर चुकी राज्य सरकारों को थक-हारकर संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित सीएए कानून को अपने राज्यों को लागू करना ही होगा, क्योंकि सीएए को लेकर किसी भी राज्य सरकार के पास बस इतना अधिकार नहीं है कि वो उसको राज्यों में लागू करने से इनकार कर सकती है। हालांकि कानून व्यवस्था को लेकर राज्य सरकारें केंन्द्र सरकार से अपनी नाराजगी दिखा सकती हैं, लेकिन सीएए को लागू करने से बिल्कुल भी इनकार नहीं कर सकती है, क्योंकि ऐसा करके राज्य सरकारें देश के संविधान का अपमान करेंगी और राज्यपाल की सिफारिश में ऐसी राज्य की सरकारें बर्खास्त भी की जा सकती है।

सीएए पूरी तरह से केंद्र सरकार का विषय है

सीएए पूरी तरह से केंद्र सरकार का विषय है

कई संविधान विशेषज्ञ बहुत पहले कर चुके हैं। संविधान विशेषज्ञों का मत है कि सीएए पूरी तरह से केंद्र सरकार का विषय है। इस पर राज्य कोई फैसला ले ही नहीं दे सकते। उनका कहना है कि भारत का नागरिक कौन होगा, यह तय करने का अधिकार सिर्फ केन्द्र सरकार को है न कि राज्यों सरकार को। देश के पूर्व कानून आयोग के मुताबिक नागरिकता शुरू से ही केन्द्र की सूची में शामिल रही है। नागरिकता से जुड़े किसी भी नियम में बदलाव का आधार और अधिकार केवल केन्द्र का ही है, जिसमें किसी तरह का बदलाव राज्य सरकारों को करने का अधिकार ही नही हैं।

English summary
After reviewing the constitutionality of the CAA and the CAA's authority over the states, it has been found that the claims made by the various state governments regarding the CAA are merely a set of lies, as the state governments do not have the right to challenge or pass a resolution in the Vidhan Sabha against a law made in the central list. Proclamations not to apply in CAA states are politically motivated, because only Parliament has the right to make any law related to citizenship, against which states do not even have the right to discuss and propose.
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