हरिद्वार: लाखों कांवड़ यात्री शौच के लिए 'जाएं तो जाएं कहां'- ग्राउंड रिपोर्ट
हरिद्वार में कांवड़ यात्रा चरम पर है और हरिद्वार वासियों से दिल्ली-हरिद्वार सड़क पर चलने वालों की मुश्किलें भी. इस बार चार करोड़ कावंड़ियों के हरिद्वार आने का अनुमान ज़ाहिर किया गया था.

इतनी बड़ी संख्या के आगे व्यवस्थाओं के टिकने के दावों पर शायद ही किसी को विश्वास हुआ होगा.
पुलिस-प्रशासन की चुनौतियां और लोगों की परेशानियां एक तरफ़ हैं लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कांवड़ यात्रा से पैदा होने वाली एक अलग समस्या का उल्लेख कर यात्रा के आयोजन पर बहस को नया मोड़ दे दिया है.
हरीश रावत का कहना है कि सरकार ने कांवड़ियों की संख्या के अनुपात में पर्याप्त टॉयलेट नहीं बनाए.
इसकी वजह से कई जगह बदबू के मारे लोगों की नाक फट रही है और गंगा जी में कभी इतना मल नहीं गया था, जितना इस कांवड़ यात्रा के दौरान गया है.
वहीं ज़िला प्रशासन का दावा है कि शौचालयों की व्यवस्था इस बार सर्वाधिक की गई है और अन्य इंतज़ाम भी. लेकिन सवाल यही है कि क्या ये पर्याप्त रहे हैं?
कोरोना के चलते दो साल तक कांवड़ यात्रा नहीं हुई. अनुमान था कि इस बार रिकॉर्ड संख्या में कांवड़िए आएंगे और यह संख्या चार करोड़ तक पहुंच सकती है. अभी तक की गणना के हिसाब से यह अनुमान ठीक लग रहा है.
शौच की समस्या
उत्तराखंड सरकार कांवड़ियों का दिल खोलकर स्वागत कर रही है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हरिद्वार पहुंचने वाले कावंड़ियों के पैर धोए तो हर की पौड़ी पर कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा भी की गई. राज्य सरकार ने कांवड़ यात्रा के लिए अलग से बजट का प्रावधान भी किया है ताकि कांवड़ियों को कोई दिक्कत न हो.
कांवड़ियों के रास्ते में खाने-पीने के लिए तो कई विकल्प उपलब्ध हैं लेकिन शौचादि के लिए नहीं हैं. गढ़वाल विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर डॉक्टर एसपी सती ने इसको लेकर फ़ेसबुक पर टिप्पणी की है.
डॉक्टर सती कांवड़ियों के लिए पलक-पांवड़े बिछाने और सावन के दौरान प्रदेश के दो ज़िलों में शौच से पैदा होने वाली गंदगी को लेकर ख़ासे नाराज़ नज़र आते हैं.
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत इसी बात को अलग तरह से रखते हैं. वह कहते हैं, "आदरणीय मुख्यमंत्री जी ने कावड़ियों के पांव धोये व फूल बरसाये, अच्छा लगा. मगर जरा नीलधारा एरिया, दूसरे एरियाज़ में जाइये बदबू के मारे लोगों की नाक फटी जा रही है. गंगा जी में कभी इतना मल नहीं गया था, जितना इस कांवड़ में गया है. गलती कांवड़ियों की नहीं है.आपने टॉयलेट ही नहीं बनाए."
'इतना अच्छा इंतज़ाम पहले कभी नहीं हुआ'
हरिद्वार ज़िला प्रशासन के अनुसार रविवार, 24 जुलाई को 75 लाख कांवड़िए आए. 23 तारीख तक कुल 2.28 करोड़ कांवड़िए पहुंचे थे. सोमवार को भी 75-80 लाख कांवड़ियों के पहुंचने का अनुमान है और 26 तारीख तक कुल संख्या पौने चार, चार करोड़ तक पहुंच सकती है.
हरिद्वार के ज़िलाधिकारी विनय शंकर पांडेय कहते हैं कि चार करोड़ लोगों के लिए सारे इंतज़ाम करना संभव नहीं हो सकता, कुछ न कुछ कमी रह ही जाएगी.
पांडेय पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की बात पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर देते हैं लेकिन दावा करते हैं कि कांवड़ का जितना अच्छा इंतज़ाम इस बार हुआ है उतना पहले नहीं हुआ.
वह कहते हैं कि पहली बार ऐसा हुआ है कि कांवड़ मेले के दौरान खुले में शौच को काफ़ी हद तक रोका जा सका है. इसके लिए करीब 2700 शौचालय इंस्टॉल किए गए हैं.
इनमें से 1000 तो सचल शौचालय कांवड़ियों के लिए मंगवाए गए हैं. इसके अलावा नगर निगम, ज़िला पंचायत और सिंचाई विभाग सभी ने शौचालय बनवाए हैं. इनके अलावा शहर में जो सार्वजनिक शौचालय पहले से मौजूद थे, वह अलग हैं.
पांडेय कहते हैं शौचालय बनाने से भी महत्वपूर्ण बात यह होती है कि वह ठीक से काम भी करें. यह सुनिश्चित किया गया है कि हर शौचालय लगातार और ठीक से काम करे. इसके लिए उनमें लगातार पानी भरा जा रहा है, सक्शन मशीनों से सफ़ाई की जा रही है और दो-दो कर्मचारियों को नियुक्त किया गया है.
पहले कहा जाता था कि बैरागी कैंप शौच से पटा रहता था और सफ़ाई के लिए बारिश का इंतज़ार रहता था. लेकिन इस बार के इंतज़ामों की वजह ऐसी स्थितियां बिल्कुल नहीं हैं.
पांडेय कहते हैं कि इस बार से पहले कांवड़ यात्रा पुलिस की ज़िम्मेदारी रहती थी. इस बार ज़िला प्रशासन ने बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान दिया है. मंगलौर से शुरू कांवड़ पटरी में हर 30-40 मीटर पर लाइट के पोल लगे हैं, वॉच टावर बनाए गए हैं. 500 मीटर पर पीने के पानी का इंतज़ाम है और हर दो किलोमीटर पर शौचालय हैं.
इसके अलावा 27 स्थानों पर मेडिकल कैंप लगाए गए हैं. मंगलवार शाम तक एक लाख 42 हज़ार कांवड़ियों ने वहां स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक भी कांवड़िये को शहर के अंदर आने नहीं दिया गया है, इससे हरिद्वार वासियों की ज़िंदगी सामान्य ढंग से चलती रही.
दावों पर सवाल
हरिद्वार निवासी पत्रकार महावीर नेगी ज़िलाधिकारी के दावों पर सवाल उठाते हैं. वह कहते हैं कि ज़िला प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार ही मंगलवार तक 3 करोड़ कांवड़िये हरिद्वार आ चुके थे, इनके लिए 2700 शौचालय क्या करेंगे. एक कांवड़िये ने एक बार भी शौच किया हो तो खुद सोचिए कि वह अवशिष्ट कहां जाएगा.
नेगी कहते हैं कि सिर्फ़ कांवड़ मार्ग पर ही नहीं हरिद्वार भर में बदबू है लेकिन कांवड़ियों की संख्या इतनी ज़्यादा होती है कि पुलिस-प्रशासन भी कुछ नहीं कर सकते.
वह कहते हैं कि सालों से ऐसा हो रहा है कि जब कांवड़ यात्रा समाप्त होती है तो उसके बाद तेज़ बारिश होती है और सब धुल जाता है... ऐसा न हो तो हरिद्वार में महामारी फैल जाए.
जहां दिखा पानी, वहीं हुए फ़ारिग
मोटरसाइकिलों पर भागते और गाड़ियों-ट्रकों में डीजे बजाकर नाचते डाक कांविड़ियों को छोड़ दें तो भक्ति भाव से कांवड़ ले जा रहे लोगों को भी इस समस्या से दो-चार होना पड़ा है.
हरिद्वार से कांवड़ में गंगाजल लेकर नीलकंठ जाते हुए उत्तर प्रदेश केमुजफ्फरनगर ज़िले के पवन कुमार अपने साथियों के साथ हमें मिले. उनकी यात्रा पांच दिन की रहेगी.
वह बताते हैं कि रास्ते में खाने-पीने के इंतज़ाम की तो कोई कमी नहीं है. कई जगह भंडारे लगे हैं, जिनमें खाने-पीने का अच्छा इंतज़ाम है लेकिन शौचादि का कहीं इंतज़ाम नहीं है.
खाने से पहले या बाद में उन्हें जहां नल या पानी का इंतज़ाम दिखता है वहीं फ़ारिग हो लेते हैं और फिर हाथ धो लेते हैं. लाचारी के साथ वह कहते हैं कि शौच तो खुले में ही जाना पड़ता है.
महिलाओं की दिक्कत
खुले में शौच जाने के मामले में महिलाओं की दिक्कत ज़्यादा बड़ी होती है. उत्तराखंड के रुद्रपुर ज़िले के बाजपुर से अपने रिश्तेदारों के साथ आईं लक्ष्मी भी हरिद्वार से नीलकंठ महादेव की यात्रा पर हैं. चार दिन की इस यात्रा में उन्हें सबसे ज़्यादा दिक्कत शौच वगैरह को लेकर हो रही है.
वह भी कहती हैं कि खाने-पीने की समस्या तो बड़ी नहीं है. दिक्कत शौचादि जाने में होती है. कहीं सार्वजनिक शौचालय नज़र आ गया तो पैसे देकर फ़ारिग हो लेते हैं वरना खुले में ही जाना पड़ता है.
लक्ष्मी कहती हैं कि इस समस्या के चलते वह खाती-पीती भी कम हैं ताकि शौचादि कम से कम जाना पड़े.
ऊधम सिंह नगर के राजेंद्र सिंह राणा अपने पत्नी और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ हरिद्वार पहुंचे हैं. शहर के प्रवेश द्वार के नज़दीक आगे की यात्रा से पहले वह कुछ आराम करते मिले.
उनका कहना है कि बहुत ज़्यादा भीड़ के कारण समस्याएं बढ़ गई हैं. अगर सरकार को पता था कि इतने लोग आने वाले हैं तो वैसे ही इंतज़ाम भी करने चाहिए थें.
राजेंद्र की पत्नी मोनिका राणा कहती हैं कि खाने-पीने की तो दिक्कत नहीं है, रहने का इंतज़ाम नहीं हो पा रहा और सबसे ज़्यादा समस्या शौचादि को लेकर हो रही है. वह कहती हैं कि रास्ते में कहीं भी शौचालय नहीं दिखा. सरकार को इसका इंतज़ाम करना चाहिए.
खाने का बढ़िया प्रबंध... बाकी के लिए जंगल
देहरादून-हरिद्वार हाई-वे पर कावंड़ियों के लिए लंगर के भी इंतज़ाम नज़र आए, जैसे पूरे कांवड़ मार्ग पर दिखते हैं. ऐसे ही एक लंगर पर हमें मोंटी शर्मा मिले. उन्होंने बताया कि सुबह से ही भोले के भक्तों के लिए खाना तैयार करना शुरू कर दिया जाता है जो रात 12 बजे तक चलता है. चाय-कॉफ़ी और ब्रेड-मक्खन आदि 24 घंटे उपलब्ध रहते हैं.
इस शिविर में कांवड़िए खाना खाते, डीजे पर नाचते, दम लगाते और सोते नज़र आए... यानी कि आराम के सभी इंतज़ाम थे, शौचालय के सिवा.
शौच के इंतज़ाम के सवाल पर मोंटी शर्मा कहते हैं कि ज़्यादातर कांवड़िये दो-एक घंटे रुककर आराम करते हैं. शौचादि के लिए पीछे जो जंगल है, लोग खुद ही वहां चले जाते हैं.
हालांकि उनके साथ मौजूद एक शख्स कहते हैं कि अगली बारी से इसका ध्यान रखेंगे.
इस शिविर से 50 मीटर की दूरी पर ही एक शिविर और है. वहां भी खाने-पीने, आराम करने के साथ ही डीजे की व्यवस्था तो है लेकिन शौचालय नहीं.
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