पाकिस्तान की पहली राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के आख़िर क्या हैं मायने?
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने शुक्रवार को राजधानी इस्लामाबाद में देश की नई सुरक्षा नीति की घोषणा की है.
इसके बारे में दावा किया गया है कि यह देश की पहली सुरक्षा नीति है.
इस दस्तावेज़ के 100 पेज के 'ऑपरेशनल पार्ट' को गोपनीय क़रार देते हुए सार्वजनिक नहीं किया गया, लेकिन बाक़ी का हिस्सा ज़ाहिर कर दिया गया है.
नई सुरक्षा नीति किसी महत्वाकांक्षी रोडमैप की तरह है, जिसमें देश के भविष्य का विज़न बताया गया है. इसके साथ कोई समय सीमा तो तय नहीं की गई है, लेकिन हर महीने इस नीति की प्रगति की समीक्षा करने के लिए एक समिति बनाई गई है.
सेना के प्रवक्ता ने बताया कि इस नीति में तय किए गए विज़न को हासिल करने में सेना अपनी भूमिका निभाएगी.
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विश्वराजनीति की बजाय फ़ोकस विश्वअर्थव्यवस्था पर
अतीत में कई जानकार पाकिस्तान को एक 'सिक्योरिटी स्टेट' क़रार देते रहे हैं. पाकिस्तान की विदेश नीति का लक्ष्य दुनिया में अपनी विश्व-राजनीति (जियो-पॉलिटिक्स) की क्षमता को सुरक्षा के नज़रिए से दोहन करने का रहा है.
पाकिस्तान को अफ़ग़ानिस्तान से लगने वाली 2,600 किलोमीटर लंबी पश्चिमी सीमा रेखा का काफ़ी फ़ायदा मिला. पहले तो अफ़ग़ानिस्तान से सोवियत संघ को खदेड़ने के लिए मुजाहिद्दीनों को तैयार करने की मदद के लिए से पश्चिमी ताक़तों से ख़ूब मदद मिली.
पाकिस्तान को इन देशों ख़ासकर अमेरिका और सऊदी अरब से ख़ूब साजोसामान और आर्थिक मदद हासिल हुई. अमेरिका में 9/11 के हमले के बाद, तथाकथित चरमपंथ के ख़िलाफ़ लड़ाई में पाकिस्तान ने अमेरिका के मुख्य सहयोगी की भूमिका निभाई.
हालांकि, नई नीति के मुताबिक़, पाकिस्तान अब 'विश्व-अर्थव्यवस्था' (जियो-इकोनॉमिक्स) पर अपना फ़ोकस बनाना चाहता है. यह नीति ऐसा माहौल बनाना चाहती है, जिससे कि पाकिस्तान क्षेत्रीय संपर्क के लिए जोड़ने वाले पुल का काम कर सके.
इसमें ऊर्जा से समृद्ध मध्य एशियाई देशों को भारत और चीन जैसी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से जोड़ने के लिए 'व्यापार और ऊर्जा कॉरिडोर' बनाने का लक्ष्य रखा गया है. इस तरह, पाकिस्तान की जियो-इकोनॉमिक्स केंद्रित नई सुरक्षा नीति में 'क्षेत्रीय संपर्क' अहम चीज़ बनने जा रही है.
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आर्थिक सुरक्षा ले रही है सैन्य सुरक्षा की जगह
अब चूंकि पाकिस्तान को अहसास हो रहा है कि जब तक उसकी अर्थव्यवस्था मजबूत और स्वतंत्र नहीं होती, तब तक उसकी सैन्य सुरक्षा और देश हित दोनों ख़तरे में रहेंगे. पाकिस्तान अभी आईएमएफ़ और विश्व बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्त संस्थानों पर बुरी तरह निर्भर है. देश की अर्थव्यवस्था चलाते रहने के लिए इन संस्थानों से बार बार मदद मांगनी पड़ती है.
नई सुरक्षा नीति के तहत, पाकिस्तान इन संस्थानों पर अपनी आर्थिक निर्भरता घटाने की सोच रहा है. इसके लिए वो देश के सिस्टम में बड़े बदलाव और सुधार लाना चाहता है.
हालांकि देश की सुरक्षा से जुड़े कई उच्च अधिकारियों ने कहा है कि नई नीति में सेना को दी जाने वाली बजटीय मदद में कोई कटौती करने की बात नहीं कही गई है. हाल के ख़तरों को देखते हुए, अधिकारियों का कहना है कि सेना को देश को सुरक्षित रखने के लिए और संसाधनों की ज़रूरत है.
ऐसा होने पर ही पारंपरिक और नए उभरते ख़तरों से देश को सुरक्षित बनाया जा सकता है. नई नीति में सेना का मुख्य कार्य शांति बनाए रखना होगा. हालांकि, इंटरनेट पर दुश्मनों के प्रोपेगेंडा और ग़लत प्रचार से निबटना भी मुख्य प्राथमिकताओं में रहेगी.
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भारत के साथ संबंध
इस देश में किसी देश का नाम नहीं लिया गया है लेकिन ये ज़रूर कहा गया है कि पाकिस्तान साझेदारी बनाने के लिए लगातार कोशिश कर रहा है. उसने कहा है कि उसकी इच्छा अपने पड़ोसियों के साथ शांतिपूर्ण रिश्ते बनाने की है.
इस्लामाबाद को पता है कि क्षेत्रीय संपर्क क़ायम करने वाली भूमिका वो तब तक नहीं निभा सकता जब तक कि भारत के साथ उसके रिश्ते शांतिपूर्ण न हों और अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता न रहे. हालांकि नेशनल सिक्योरिटी डिवीज़न के एक सीनियर अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वो आने वाले समय में भारत के साथ रिश्ते सामान्य होते हुए नहीं देखते.
उन्होंने कहा कि भारत की मौजूदा मोदी सरकार ने पाकिस्तान को घरेलू मुद्दा बना दिया है और पाकिस्तान के विरोध को राजनीतिक फ़ायदे के लिए भुना रही है.
उनके अनुसार, पिछले साल दोनों देशों के बीच मुख्यधारा से इतर बातचीत की कोशिश हुई थी, लेकिन वो नाकाम रही. ऐसा इसलिए कि मोदी सरकार अभी पाकिस्तान विरोध की अपनी नीति छोड़ना नहीं चाहती.
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उन अधिकारी का कहना है कि भारत को पता है कि रिश्ते न सुधरने पर दोनों देशों को नुक़सान होगा.
नई सुरक्षा नीति में देश में एकजुटता बनाने पर ज़ोर दिया गया है. इस दस्तावेज़ में धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यक समूहों के साथ महिलाओं का भी साथ लेकर और उन्हें मुख्य धारा में जोड़कर विविधता बढ़ाने की बात कही गई है.
इसमें कहा गया है कि देश में सक्रिय हिंसक समूहों को दो हिस्सों में बांटकर देखा जाएगा. एक वो जिन्हें समझाया जा सकता है और दूसरा वो जिन्हें समझाना नामुमकिन है. इन दोनों के साथ सरकार का बर्ताव उनके रुख़ के अनुसार तय होगा. हालांकि कहा गया है कि ताक़त का इस्तेमाल आख़िरी विकल्प होगा.
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आलोचना
नई सुरक्षा नीति की विपक्ष ने अभी तक नरम आलोचना की है. उनकी मुख्य शिक़ायत ये है कि सरकार ने यह नीति तय करते वक़्त विपक्षी दलों से बात नहीं की. पाकिस्तान तहरीक़े इंसाफ़ के नेतृत्व वाली सरकार ने संसदीय समिति में इस नीति को पेश किया लेकिन विपक्षी दलों ने अपना विरोध दर्ज़ कराने के लिए उस बैठक का बॉयकॉट किया.
सरकार का कहना है कि नीति बनाने पर उसका अधिकार है संसद का नहीं. हालांकि, यह नीति एक गतिशील दस्तावेज़ है और इसकी हर साल समीक्षा की जाएगी. साथ ही आने वाली सरकारों के पास मौक़ा होगा कि अपनी ज़रूरतों के अनुसार इसमें संशोधन कर लें.
हालांकि सरकार कह रही है कि इस नीति पर बहस के रास्ते खुले हैं. कई ऐसे प्रावधान हैं जिन्हें समझाने की ज़रूरत है. वहीं कई कार्यकर्ताओं को आशंकाएं है कि 'हाइब्रिड वार' लड़ने के नाम पर कहने की आज़ादी की गुंजाइश को आगे कम किया जा सकता है.
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