कैसे काम करेंगे प्रशांत किशोर, क्या सोनिया-राहुल ‘राजा’ वाले मिजाज से मुक्त हो पाएंगे ?
नई दिल्ली, 21 अप्रैल। क्या सोनिया-राहुल के आलाकमान रहते पार्टी में क्रांतिकारी बदलव संभव हैं? क्या प्रशांत किशोर को वह आजादी मिल पाएगी कि वह अपना जिताऊ फार्मूला लागू कर सकें? एक बार अमिताभ बच्चन ने सोनिया-राहुल के लिए कहा था, "वे राजा हैं और हम (बच्चन परिवार) रंक। किसी भी स्थिति में राजा ही यह तय करता है कि वह किसके साथ कैसा संबंध रखेगा। रंक तय नहीं करता।" अमिताभ बच्चन भारत में रहने वाले सोनिया गांधी के भाई हैं।

यह रिश्ता सोनिया गांधी के वैवाहिक कर्मकांड की वजह से बना था। लेकिन चार दशक बाद जब अमिताभ बच्चन ने गांधी परिवार की सोच पर सवाल उठाया तब राजनीतिक रूप से बहुत विवाद हुआ था। क्या सोनिया गांधी विचार से उदारवादी हैं और पार्टी के भले के लिए वे प्रशांत किशोर की राय आसानी से मान लेंगी? क्या सोनिया-राहुल की राजा वाली सोच से कांग्रेस मुक्त हो पाएगी?

सोनिया-राहुल को सलाह दे पाएंगे प्रशांत किशोर?
चर्चा है कि प्रशांत किशोर को जो भी जवाबदेही मिलेगी उसकी रिपोर्ट वे सीधे सोनिया गांधी को करेंगे। क्या इस बात को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पचा लेंगे ? क्या सोनिया-राहुल को कोई सलाह दे सकता है ? क्या कांग्रेस में ऐसा कोई नेता है जो सोनिया-राहुल को सीधे सलाह देने की हिम्मत रखता है ? दो साल पहले जब कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी में संगठनात्मक बदलाव के लिए सुझाव दिये थे तब उन्हें विक्षुब्ध मान लिया गया था। उन्हें सोनिया विरोधी खेमा बता कर जी-23 का नाम दिया गया था। वे 2019 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद संगठन में आमूल चूल परिवर्तन चाहते थे। लेकिन उन्हें दरकिनार कर दिया गया।

पीके की एंट्री से जी-23 के नेताओं को रखा गया दूर
पिछले साल जब प्रशांत किशोर के कांग्रेस में आने की मुहिम चल रही थी तब जी-23 के कुछ नेताओं ने इसका विरोध किया था। उनका कहना था कि प्रशांत किशोर प्रोफेशनल हैं और उनका कांग्रेस की नीतियों से कुछ लेना देना नहीं है। वे कांग्रेस के निष्ठावान कार्यकर्ता भी नहीं रहे। उनकी आउटसोर्स सर्विस से कांग्रेस का भला नहीं होने वाला। वे अकेले काम नहीं करते। उनकी एक टीम है जो चुनावी रणनीति तैयार करती है। क्या उनकी कंपनी के सभी सदस्य कांग्रेसी हो जाएंगे ? पिछले साल का यह सवाल आज भी मौजूद है। वह इसलिए क्योंकि प्रशांत किशोर की एंट्री से जी-23 के नेताओं को दूर रखा गया है।

प्रशांत किशोर ने रखी पूर्णकालिक अध्यक्ष नियुक्त करने की शर्त
क्या कांग्रेस की लीडरशिप में बदलाव होगा ? प्रशांत किशोर का तर्क रहा है, "जिसके नेतृत्व में पार्टी पिछले 10 साल में 90 फीसदी चुनाव हार चुकी है उसे पद छोड़ देना चाहिए। पार्टी की बेहतरी के लिए नये लोगों को मौका दिया जाना चाहिए।" क्या प्रशांत किशोर की राय के मुताबिक सोनिया गांधी कार्यकारी अध्यक्ष का पद छोड़ देंगी ? क्या गांधी परिवार से बाहर के किसी नेता को यह पद मिल सकता है ? चर्चा है कि प्रशांत किशोर ने पूर्णकालिक अध्यक्ष नियुक्त करने की शर्त रखी है। अगर गांधी परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति अध्यक्ष बनता है तो क्या गारंटी है कि उसका हस्र सीताराम केसरी की तरह न हो ? कांग्रेस के कितने नेता किसी बाहरी को मन से अध्यक्ष मानेंगे ?

जिस पार्टी के संगठन में खामी है, उसे कैसे जीत दिलाएंगे पीके
कांग्रेस के कुछ फैसले उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे हैं। युवा कम्युनिस्ट नेता कन्हैया कुमार को कांग्रेस ने तोप समझा था। लेकिन वे तलवार भी नहीं निकले। कांग्रेस ने सोचा था कि कन्हैया के आने से बिहारी में उसकी स्थिति मजबूत हो जाएगी। इसी मुगालते में उसने राजद से लड़ाई भी कर ली। कुशेश्वर स्थान और तारापुर उपचुनाव में जब कांग्रेस की मिट्टी पलीद गयी तब उसे कन्हैया की हकीकत समझ में आई। कांग्रेस शॉर्टकट कामयाबी चाहती है। वह सोचती है कि कोई आये, जादू की छड़ी घुमाए और उसे जीत मिल जाए। जिस पार्टी के संगठन में खामी है उसे कैसे जीत दिलाएंगे ? प्रशांत किशोर ने कुछ दिनों पहले कहा था कि इस ग्रैंड ओल्ड पार्टी की जड़ों और संगठन में ही खामियां है, इसलिए तुरंत उसकी वापसी संभव नहीं है। अब वे कांग्रेस को जीत का फार्मूला बता रहे हैं। क्या एक झटके में वे 137 साल पुरानी कांग्रेस की खामियां दूर कर देंगे ? क्या यह इतना आसान काम है जितना वे बता रहे हैं ?

क्या बिहार में आरजेडी से अलग होगी कांग्रेस?
कांग्रेस केवल एक पार्टी नहीं बल्कि देश की राजनीति विरासत भी है। उसकी एक विशिष्ट परम्परा रही है। प्रशांत किशोर इस ऐतिहासिक परम्परा को अप्रासंगिक मान रहे हैं। उनका कहना है कि भाजपा को हराने के लिए भाजपा की ताकत को समझना होगा। उसके हिसाब से ही बदलाव करना होगा। खबरों के मुताबिक अब प्रशांत किशोर ही यह फैसला करेंगे कि कांग्रेस का किस पार्टी से गठबंधन हो या न हो। यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। जैसे उन्होंने राय दी है कि कांग्रेस को बिहार में अकेले लड़ना चाहिए। बिहार कांग्रेस के नेता तो पिछले सात-आठ साल से इस बात की मांग कर रहे हैं कि पार्टी को राजद की छत्रछाया से मुक्त हो जाना चाहिए। अकेले चुनाव लड़ना चाहिए। लेकिन राहुल गांधी ने उनकी बात कभी नहीं मानी। अब क्या वे प्रशांत किशोर की बात मान लेंगे ?
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